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राम लाल, मनोज सिन्‍हा या कोई और, यूपी की भाजपा सरकार का सीएम जो भी बने, कुर्सी पर बैठते ही सामने होंगी ये 6 बड़ी मुश्किलें

यूपी में ग्रामीण इलाकों के 51.8 प्रतिशत परिवारों तक बिजली नहीं पहुंची है। चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने भी राज्य में बिजली का मुद्दा उठाया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि पार्टी को युवा नेताओं को बढ़ावा देना चाहिए। (Express Photo by Gajendra Yadav)

उत्तर प्रदेश चुनाव में 14 साल से लंबे वनवास के बाद भाजपा ने जबरदस्त वापसी तो कर ली लेकिन अभी तक पार्टी ये नहीं तय कर पाई है कि राज्य का अगला सीएम कौन होगा। गृह मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा के राष्ट्रीय संगठन सचिव राम लाल, केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा, यूपी भाजपा के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा, लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा इत्यादि के नामों को लेकर मीडिया पिछले सात दिनों से अटकल लगा रहा है। वहीं गुरुवार (16 मार्च) को भाजपा संसदीय दल की बैठक के बाद पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इत्यादि ने ऐसे बयान दिए जिससे यूपी के अगले सीएम को लेकर धुंध छटने के बजाय बढ़ ही गयी है।

पीएम मोदी ने कहा कि पार्टी को भविष्य को देखते हुए युवा नेताओं को बढ़ावा देना चाहिए। गृह मंत्री राजनाथ ने अपने नाम को लेकर चल रही अटकलों को बकवास करार दिया। अमित शाह ने कहा कि सीएम केशव प्रसाद मौर्य की पसंद होगा। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि यूपी का सीएम बहुत ही योग्य होगा। जाहिर है इन सभी नेताओं के बयान से मिलने वाले संकेत को पकड़ने में मीडिया अभी तक नाकाम रहा है। आधिकारिक तौर पर भाजपा ने कहा है कि शनिवार (18 मार्च) को यूपी में जीतकर आए भाजपा विधायक ही सीएम का फैसला करेंगे। यूपी का अगला सीएम चाहे जो भी हम आपको बताते हैं कि कुर्सी संभालते ही कौन सी छह बड़ी चुनौतियां उसके सामने होंगी।

1- माताओं की मौत की दर, कुपोषित बच्चे- करीब 20 करोड़ आबादी वाला उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है। यूपी में स्वास्थ्य के मामले में प्रति व्यक्ति खर्च 452 रुपये है जो राष्ट्रीय औसत से 70 प्रतिशत कम है। राज्य के हर दो में एक बच्चे का टीकाकरण मानक स्तर का नहीं है। मातृत्व मृत्यु दर के मामले में यूपी देश में दूसरे नंबर पर है। यूपी में प्रति एक लाख प्रसव 258 माताओं की मृत्यु हो जाती है। नवजा शिशु मृत्यु दर पूरे देश में सबसे ज्यादा है। यूपी में प्रति एक हजार नवजात शिशुओं में 64 की जन्म या उसके कुछ समय बाद मौत हो जाती है।

2- शिक्षा में पिछड़ापन- साल 2015-16 के यू-डीआईएसई के आंकड़ों के अनुसार यूपी में प्राइमरी स्कूल में प्रवेश लेने वाले बच्चों का प्रतिशत (83.10) काफी अधिक है। लेकिन इन बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता और उनके उच्च शिक्षा प्राप्त करने की दर अच्छी नहीं है।

इंडिया स्पेंड के अनुसार एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) 2016 में पाया गया कि यूपी में प्राइमरी स्कूल के पहली कक्षा के 46 प्रतिशत छात्र साधारण अक्षरों को भी नहीं पढ़ पा रहे थे। ऐसे 44.30 प्रतिशत छात्र एक से लेकर नौ तक अंकों की पहचान नहीं कर पा रहे थे। यूपी में प्राइमरी में पढ़ने वाले बच्चों की बड़ी संख्या कक्षा पांच के आगे नहीं पढ़ पाती। इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 में केवल 60.50 प्रतिशत बच्चों ने ही पांचवी के बाद आगे पढ़ायी जारी रखी।

3- युवाओं में भारी बेरोजगारी, रोजगार के लिए पलायन- यूपी में खराब शिक्षा व्यवस्था का अक्स राज्य की बेरोजगारी दर में साफ झलकता है। साल 2015-16 में यूपी में प्रति एक हजार लोगों पर बेरोजगारी दर 58 थी जो राष्ट्रीय औसत (37) से काफी अधिक है। 18 से 29 साल उम्र के युवाओं के बीच बेरोजगारी दर राज्य में और भी ज्यादा है। श्रम मंत्रालय के 2015-16 के डाटा के अनुसार राज्य के 18 साल से 29 साल उम्र के बीच के प्रति एक हजार युवाओं में से 148 बेरोजगार हैं।

यूपी की इस उच्च बेरोजगारी दर का सीधा परिणाम है यहां से रोगगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन। साल 2001 से 2011 के बीच 20 से 29 साल आयु वर्ग के 58 लाख युवाओं रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में गए। इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार यूपी चुनाव में करीब 20 प्रतिशत मतदाताओं ने बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा बताया था।

4- सबसे सुस्त औद्योगिक विकास- नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार औद्योगिक विकास के मामले में यूपी देश के सबसे नीचे के पांच प्रदेशों में है। साल 2013-14 में यूपी की सालाना औद्योगिक विकास दर 1.95 प्रतिशत और 2014-15 में 1.93 प्रतिशत थी। इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार यूपी के परंपरागत रूप से मजबूत उद्योग भी संकट में हैं। कानपुर की 400 चमड़ा फैक्ट्रियों में से 146 गंभीर संकट में हैं।

5- खेती और किसानी संकट में- साल 2012-13 के आंकड़ों के अनुसार यूपी में कुल 18.05 कृषक परिवार थे। यानी देश के कुल किसान परिवारों का 20 प्रतिशत यूपी में रहता है जो अपनी आजीविका के लिए खेती-किसानी पर निर्भर है। यूपी में हर चार में से एक परिवार जीविका के लिए खेती पर निर्भर है। साल 2004-05 से 2012-13 के बीच यूपी में कृषि और संबंधित क्षेत्र की मिश्रित वार्षिक विकास दर बीमारू (बिहार, एमपी, राजस्थान और यूपी) में सबसे कम (2.9 प्रतिशत) रही। जबकि इस दौरान कृषि और संबंधित क्षेत्र की मिश्रित वार्षिक विकास दर का राष्ट्रीय औसत 3.7 प्रतिशत रहा। 2004-05 के स्थिर मूल्यों के अनुसार साल 2014-15 में यूपी की कृषि और संबंधित क्षेत्रों में विकास दर 4.2 रही जो कि उत्तराखंड के 5.12 प्रतिशत से भी कम रही। जबकि इस दौरान इसी क्षेत्र में मध्य प्रदेश की विकास दर 18.85 प्रतिशत रही।

6- आधे से ज्यादा परिवारों के पास बिजली नहीं है- यूपी चुनाव के दौरान बिजली कटौती एक अहम मुद्दा थी। इंडिया स्पेंड के एक सर्वे में करीब एक तिहाई मतदाताओं ने कहा कि उनके लिए बिजली सबसे बड़ा मुद्दा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण में राज्य में बिजली की किल्लत का मुद्दा उठाया था। बिजली की कमी के मामले में यूपी देश के सबसे खस्ताहाल राज्यों में है। यूपी में ग्रामीण इलाकों के 51.8 प्रतिशत परिवारों तक बिजली नहीं पहुंची है। ये हालत तब है जब यूपी में कोयले से चलने वाला देश का तीसरा सबसे बड़ा बिजली संयंत्र है। यूपी में बिजली की दुर्दशा के लिए भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को जिम्मेदार बताया जा

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