Bengal Elections: पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा ‘ना खेला होबे’ की रणनीति के तहत काम कर रही है। पार्टी स्थानीय इकाई ने फैसला लिया है कि इस चुनाव में ऐसे कोई कारण न बनने दिए जाएं जो पिछली बार हार के कारण बने थे। साल 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) व राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ‘खेला होबे’ राजनीतिक नारे में भाजपा फंस गई थी। उक्त चुनाव में अच्छा माहौल बनने के बाद भी पार्टी 38 फीसदी वोट लेकर केवल 77 सीट हासिल कर पाई थी, जबकि पार्टी को राज्य में सरकार बनने की उम्मीद थी।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा पिछले डेढ़ साल से विभिन्न स्तर पर जांच अभियान चला रही है। बीते कुछ माह में पार्टी ने बंगाल की सभी 292 सीट (एक सीट थी सहयोगी के पास) पर हार-जीत को लेकर मूल्यांकन करवाया है। इस दौरान दिल्ली सहित दूसरे राज्यों से आई टीम ने जमीनी स्तर पर घूम-घूम कर कमजोर कड़ी की पहचान की। साथ ही जीते हुए विधानसभा में भाजपा विधायक की कमी, हारे विधानसभा में टीएमसी के विधायक की मजबूत कड़ी की पहचान की। टीम ने पूरी जांच के बाद पश्चिम बंगाल के संगठन प्रभारी सुनील बंसल के माध्यम से रिपोर्ट दिल्ली आला कमान तक पहुंचा दी है।

टिकट बंटवारे को लेकर क्या है प्लान

सूत्रों की मानें तो इस बार टिकट देने के लिए जमीनी पकड़ को प्राथमिकता दी जाएगी। साथ ही ऐसे लोगों पर विश्वास कम किया जाएगा जो चुनाव से कुछ माह पूर्व या किसी रणनीति के तहत भाजपा में आए हैं। पार्टी का मानना है कि बंगाल में टीएमसी का कैडर काफी मजबूत है और यह भाजपा में आकर पिछली बार की तरह नुकसान पहुंचा सकता है। यही कारण है कि बंगाल की समझ रखने वाले नेताओं को एक साल पहले ही अलग-अलग विधानसभा में भेज कर जमीन तैयार की जा रही है।

सूत्रों का कहना है कि मूल्यांकन करने वाली टीम ने सुझाव दिए हैं कि टिकट देने में स्थानीय नेताओं की भागीदारी बढ़े। महिलाओं व मतदाताओं को लेकर विशेष घोषणाएं हों। राज्य में उद्योग व दूसरे पहलुओं को बड़े स्तर पर उठाया जाए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत राज्य में बड़ी संख्या में फर्जी वोट कट गए हैं जो टीएमसी को सीधा फायदा पहुंचाते थे। इसका असर भी चुनाव में देखने को मिलेगा।

क्षेत्र के आधार पर अलग नीति

सूत्रों की मानें तो राज्य की राजनीति क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक समीकरणों को देखते हुए अलग-अलग भौगोलिक हिस्सों के आधार पर काम किया जा रहा है। पार्टी ने उत्तर बंगाल, राढ़ क्षेत्र, दक्षिण बंगाल, मुस्लिमबहुल व माला बेल्ट सहित अन्य क्षेत्रों के लिए विशेष नीति तैयार की है। पिछले चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक सफलता उत्तर बंगाल और जंगल महल क्षेत्र में मिली थी। इन सीटों पर फिर से जीत के लिए स्थानीय नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है। वहीं दक्षिण बंगाल और कोलकाता महानगर क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के दबदबे को कमजोर करने के लिए जाति व जनसंख्या आधारित टिकट बंटवारे पर काम किया जाएगा।

कम वोट से हार-जीत पर विशेष नजर

भाजपा पिछले चुनाव में कम वोट से हुई हार-जीत वाली सीट पर विशेष नजर बनाए हुए है। पार्टी का मानना है कि समय के साथ स्थिति बदली है। ऐसे में (50 से अधिक) जिसमें पिछली बार हार हुई थी, उसमें जीतने की संभावना है। पिछले चुनाव में हिंदू वोट खुलकर पार्टी के पक्ष में आए थे।

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Bengal Politics: बीजेपी का दांव बनाम टीएमसी की चुनौती (Photo Source: Indian Express)

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद मतुआ समुदाय बहुल इलाकों में घबराहट, गुस्सा और संदेह का माहौल बन गया है। इस मुद्दे ने भाजपा को अपने गढ़ में रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस को राजनीतिक अवसर नजर आने लगे हैं। पढ़िए पूरी खबर…