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उदित राज ने उठाया सांसदों का महत्व घटने का मुद्दा, बोले- मैं बिना सांसद रहे जितने काम करा लेता था, अब नहीं करा पाता

भाजपा सांसद उदित राज ने शून्य काल में सांदकों का प्रभाव कम होने के मुद्दे को उठाने का फैसला किया। यह मुद्दा तत्काल ही पार्टियों की सीमाओं को तोड़ते हुए पूरे संसद में गूंज उठा।

भाजपा सांसद उदित राज ने शून्य काल के दौरान उठाया सांसदों का प्रभाव कम होने का मुद्दा।

संसद में शून्य काल आम तौर पर सांसदों द्वारा उनके संसदीय क्षेत्रया जनता से संबंधित किसी समस्या को रखने के लिए प्रयुक्त होता है। लेकिन शुक्रवार (29 अप्रैल) को भाजपा सांसद उदित राज ने शून्य काल में सांसदों का प्रभाव कम होने का मुद्दा उठाया। यह मुद्दा तत्काल ही पार्टियों की सीमाओं को तोड़ते हुए पूरे संसद में गूंज उठा। इसके बाद बीजू जनता दल (बीजेडी) के सांसद बी. महताब ने कहा कि इस मुद्दे को प्रोटोकॉल कमेटी में उठाया जाए।

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इस बारे में जब उदित राज से ‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ ने यह मुद्दा उठाए जाने की वजह पूछी तो उनका कहना था- एक सांसद के तौर पर हम विभिन्न मंत्रालयों को जनता के सरोकार से संबंधित अनगिनत पत्र लिखते हैं। मैंने गौर किया है कि पिछले कुछ सालों में सांसदों द्वारा भेजे जाने वाले पत्रों की तुलना में किए जाने वाले काम में कमी आई है। उन्होंने कहा, “मैं अपने अनुभव से बता सकता हूं कि जनवरी 2016 से अब तक मैंने विभिन्न मंत्रालयों को 1940 पत्र लिखे हैं। लेकिन जवाब में मुझे सिर्फ 500 पत्र ही वापस मिले और उनमें से एक भी सकारात्मक जवाब वाला नहीं था। उनमें दो ही तरह के जवाब होते हैं। या तो यह कि मामले की जांच की जा रही है और या फिर यह कि इस काम को नहीं किया जा सकता।”

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उदित राज ने कहा, “सांसदों के कम होते प्रभाव को पिछले 15 साल से गौर कर रहा हूं। जब मैं सांसद नहीं था तब मैंने अपने पत्र लिखे जाने के बाद काम होते हुए ज्यादा देखा है।” राज ने कहा यह मेरा इकलौते का मामला नहीं है। अगर गौर किया जाए तो लोकसभा का लगभग हर एक सांसद यह झेल रहा है।

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यह स्थिति कैसे पैदा हुई, यह बताते हुए उन्होंने कहा कि अफसर अक्‍खड़ हो गए हैं क्योंकि नेता कमजोर हो गए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यूपीए सरकार ने सारी शक्तियां न्यायपालिका को दे दीं। इसका नतीजा यह निकला कि नौकरशाहों को लगता है कि राजनेता कमजोर हो गए हैं और न्यायपालिका ज्यादा मजबूत हो गई है। इससे लगता है कि सांसदों द्वारा भेजे गए पत्रों को नष्ट कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि यह ठीक वैसा ही है जैसा एक बार मोदीजी ने कहा था कि जब सांसद आपस में लड़ने लग जाएंगे तो अफसरशाही इसका फायदा उठाना शुरू कर देंगे।

इस समस्या का समाधान बताते हुए उन्होंने कहा कि सांसदों द्वारा भेजे गए पत्रों का एक केंद्रीय ऑनलाइन डाटाबेस तैयार किया जाना चाहिए, जिसे जनता द्वारा देखा जा सके। इस तरीके से सांसद यह भी देख सकेंगे कि उन्होंने किस मंत्रालय को कितने पत्र लिखे हैं।

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