Muslim OBC Reservation: ओबीसी कोटे में मुस्लिमों के आरक्षण का मुद्दा हमेशा से ही ज्वलंत रहा है और सोमवार को ये मुद्दा राज्यसभा में एक बार फिर उठा। बीजेपी सांसद के. लक्ष्मण ने शून्यकाल के दौरान कहा कि मुस्लिम समाज के लोगों को ओबीसी श्रेणी से बाहर किया जाए, और उन्हें ओबीसी का आरक्षण के लाभ से बाहर किया जाए। इसको लेकर संसद के अंदर और बाहर काफी बवाल हुआ।
दरअसल, राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान शून्यकाल में के. लक्ष्मण ने कहा कि ओबीसी आरक्षण का लाभ केवल सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मिलना चाहिए और इसे धर्म के आधार पर नहीं दिया जाना चाहिए। इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध जताया। विवाद बढ़ने के बाद विपक्ष ने सरकार के रुख के खिलाफ विरोध करते हुए सदन से ही वॉकआउट कर दिया।
‘धर्म के आधार पर आरक्षण संविधान के खिलाफ’
बीजेपी सांसद के. लक्ष्मण ने कहा कि सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए बनाए गए आरक्षण का कुछ राज्यों में धर्म के आधार पर दुरुपयोग किया जा रहा है, जो संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि आरक्षण का मूल उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करना है, लेकिन कुछ राज्य सरकारें इसे धार्मिक पहचान से जोड़कर लागू कर रही हैं। उन्होंने विभिन्न राज्यों का उल्लेख किया और कई राज्यों के उदाहरण भी दिए।
केरल कर्नाटक में मुस्लिम आरक्षण का जिक्र
उन्होंने कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय को ओबीसी सूची में एक कैटेगरी के तौर पर शामिल करके लगभग 4 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का विरोध किया। इतना ही नहीं, उन्होंने पश्चिम बंगाल का जिक्र भी किया और कहा कि बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय को ओबीसी श्रेणी में शामिल किया गया है, जिससे वास्तविक पिछड़े वर्गों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
इसके अलावा के लक्ष्मण ने ऐसे ही तमिलनाडु में भी मुस्लिम समुदाय के लिए अलग से आरक्षण व्यवस्था का भी उल्लेख किया। वहीं केरल में भी मुस्लिम समुदाय को ओबीसी सूची में शामिल कर आरक्षण प्रतिशत बढ़ाने की बात कही गई।
हाईकोर्ट की आपत्तियों का उल्लेख
बीजेपी के राज्यसभा सदस्य के. लक्ष्मण ने तेलंगाना में भी मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष आरक्षण का मुद्दा उठाया। बीजेपी सांसद ने कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कुछ मामलों में न्यायालयों (हाईकोर्ट) ने इस प्रकार की व्यवस्थाओं पर आपत्ति जताई है।
अपने बयान में के.लक्ष्मण ने बीआर अंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होना चाहिए। उन्होंने सरकार से अपील की कि धर्म आधारित आरक्षण की व्यापक समीक्षा कराई जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि आरक्षण का लाभ वास्तव में जरूरतमंद और पिछड़े वर्गों तक पहुंचे। सामाजिक न्याय की मूल भावना को बनाए रखा जाए। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय की भावना को बचाना जरूरी है।
डीएमके ने पीएम मोदी से पूछे सवाल
के. लक्ष्मण के वक्तव्य के बाद राज्यसभा से विपक्षी सांसदों के वॉकआउट पर डीएमके सांसद पी. विल्सन ने कहा, “आज बीजेपी कह रही है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कोटे के तहत किसी भी मुसलमान को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। किसी धर्म को ओबीसी समुदाय से बाहर रखना अभूतपूर्व है। क्या प्रधानमंत्री मोदी ओबीसी से मुसलमानों को बाहर करने की इस मांग को स्वीकार करेंगे, उन्हें इसका जवाब देना होगा। हम इसका विरोध और निंदा करते हैं।”
सपा-टीएमसी और RJD ने उठाए सवाल
कुछ इसी तरह इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी ने भी विरोध दर्ज किया है। सपा के सांसद जावेद अली खान ने कहा कि बीजेपी द्वारा ओबीसी सूची से मुसलमानों को बाहर रखने का मुद्दा उठाया गया, जिसके बाद पूरा विपक्ष एकजुट हो गया और विरोध स्वरूप सदन से बाहर चला गया। तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 पर सीधा हमला बताया। उनका कहना था कि संविधान धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करता है। उन्होंने बीजेपी पर संविधान के मूल सिद्धांतों के उल्लंघन का आरोप लगाया।
वहीं राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि बीजेपी न तो संविधान की बुनियादी समझ है और न ही पिछड़ा वर्ग आयोग की। उन्होंने मंडल आयोग का उदाहरण देते हुए कहा कि ओबीसी सूची में शामिल समुदायों की पहचान उनके पारंपरिक पेशों के आधार पर होती है, न कि धर्म के आधार पर।
रामदास अठावले ने विवाद पर क्या कहा?
इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले का भी बयान आया है। उन्होंने कहा कि 80% मुसलमानों को आरक्षण मिलता है। बच्चों को भी ईडब्ल्यूएस श्रेणी के तहत 10% आरक्षण मिलता है। इस आरक्षण से मुसलमानों को लाभ होता है। आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं दिया जाता है। इसलिए, सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर कोई आरक्षण नहीं है।
क्या कहता है संविधान?
संविधान के अनुच्छेद 15(1) और 16(2) स्पष्ट कहते हैं कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। इसका सीधा सा अर्थ है कि भारत में सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को अधिकार देते हैं कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों की तरक्की के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। यही वो प्रवाधान हैं जिसके तहत वह आरक्षण भी दे सकता है। स्पष्ट है कि संविधान में आरक्षण का आधार धर्म नहीं है।
इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ स्टेट केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला
ओबीसी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का 9 जजों की संविधान पीठ का एक फैसला नजीर है। यह केस ‘इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ स्टेट का है। इसी से यह तय हुआ था कि मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण मिल सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कई बातें साफ की था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, क्लास यानी वर्ग का मतलब सिर्फ हिंदू जाति नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 16(4) में जिस पिछड़े वर्ग की बात की गई है, वह केवल हिंदू धर्म की जातियों तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि मुसलमान, ईसाई और सिख जैसे समुदायों में भी सामाजिक व्यवस्थाएं और पेशे के आधार पर ऐसे कई समूह हैं, जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं।
कोर्ट ने कहा था कि अगर मुसलमानों के भीतर कोई ऐसा समूह है जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है, तो उसे ओबीसी की सूची में शामिल किया जा सकता है। यह आरक्षण उन्हें मुसलमान होने के कारण नहीं, बल्कि उनके पिछड़ेपन के कारण मिलेगा। हालांकि कोर्ट ने धर्म के सभी लोगों को आरक्षण देने के मुद्दे को सिरे से नकार दिया था।
आंध्र प्रदेश सबसे बड़ा उदाहरण
दरअसल, मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण मिलने के मामले में सबसे ज्यादा उल्लेख आंध्र प्रदेश का आता है। साल 2004 में आंध्र प्रदेश की सरकार ने राज्य के सभी मुसलमानों को 5 फीसदी आरक्षण दिया था। यह मामला जब हाईकोर्ट ने पहुंचा तो कोर्ट ने इसे डस्टबिन में डाल दिया, और सरकार के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता है। यह संविधान के अनुच्छेद 15(1) और 16(2) का सीधा उल्लंघन है।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने इसका तोड़ निकाला थाा। राज्य सरकार ने एक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया। इसके बाद आयोग ने मुसलमानों के भीतर कुछ विशिष्ट पिछड़े ग्रुप की सूची बनाई। फिर राज्य सरकार ने 2007 में एक नया कानून बनाया और मुसलमानों के कुछ खास समूहों को ओबीसी आरक्षण उपलब्ध कराया। इसे ‘ई’ कैटेगरी नाम दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी थी आंध्र में मुस्लिम आरक्षण को मंजूरी
हालांकि, सरकार के इस आरक्षण के कदम के बावजूद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और इसे धर्म के आधार पर आरक्षण बताकर विरोध किया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को राहत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा मुसलमान समाज की कुछ विशिष्ट जातियों को आरक्षण दिया जा रहा है, जो कि धर्म के आधार पर नहीं बल्कि उनके पिछड़ेपन के आधार पर है। इसके चलते ही सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र सरकार के उस प्रावधान को मंजूरी दे दी थी।
किन राज्यों में मिल रहा है मुस्लिमों को ओबीसी आरक्षण?
बता दें कि इसी के सहारे देश के कई राज्यों में मुसलमान समाज के लोगों को आरक्षण दिया जा रहा है। इसमें आंध्र प्रदेश के अलावा कर्नाटक, केरल, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, तेलंगाना, तमिलनाडु, झारखंड जैसे प्रमुख राज्य शामिल हैं। हालांकि, सभी जगहों पर धर्म के आधार पर नहीं बल्कि मुसलमानों की कुछ विशिष्ट पिछड़ी जातियों को ही आरक्षण दिया जा रहा है।
बंगाल में ममता सरकार ने निकाला नया तरीका
बंगाल में यह मामला पेचीदा इसलिए है क्योंकि साल 2011 के बाद राज्य सरकार ने कई मुस्लिम समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल किया, जिससे कुल पिछड़ी जातियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी 118 से अधिक हो गई। हाल ही में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2010 के बाद जोड़े गए 77 नई जातियों (ज्यादातर मुस्लिम) के ओबीसी दर्जे को रद्द कर दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिससे ये प्रमाण पत्र अभी मान्य हैं। इसके चलते राज्य सरकार मुसलमान समाज के एक बड़े वर्ग को आरक्षण का लाभ दे रही है।
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देश में आरक्षण एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसका राजनीतिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिए से इस्तेमाल किया है। आरक्षण को लेकर देश में कई तरह की मांगें भी वक्त-वक्त पर उठती रहीं। इतना ही नहीं, यह मामला इतना पेचींदा हो गया कि कई बार यह संसद की दहलीज पर तो पहुंचा ही, यहां तक की सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर भी गया। पढ़िए पूरी खबर…
