कांग्रेस नेतृत्व ने काफी आसानी से कर्नाटक में मुख्यमंत्री का चेहरा चुना है। डोड्डालहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार (डीके शिवकुमार) को मुख्यमंत्री बनाया है। कांग्रेस के नए फैसले से एनडीए और बीजेपी को अपनी रणनीति जरूर बदलनी पड़ेगी। कांग्रेस में हो रहे डेवलपमेंट की वजह से ऐसा लगता है कि बीजेपी को नए राज्य पार्टी अध्यक्ष की घोषणा टालनी पड़ी। गुरुवार को बीजेपी ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और त्रिपुरा के लिए नए अध्यक्षों की घोषणा की लेकिन कर्नाटक का नाम नहीं था।

बीजेपी के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि डीके शिवकुमार ने अभी तक खुद को एक काबिल प्रशासक के तौर पर साबित नहीं किया है। लेकिन अगर वह अगले कुछ सालों में ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं, तो बीजेपी के लिए चीजें मुश्किल हो सकती हैं। सूत्र ने कहा, “राज्य के वोटरों के बीच उन्हें (डीके) एक काबिल प्रशासक के तौर पर नहीं जाना जाता जो अच्छा शासन दे सके। डीके की कर्नाटक में पैसे और ताकत के दम पर काम करने वाले की इमेज है, उन्हें बस अपना शासन सही करना है। फिर उन्हें कोई और चीज रोक नहीं सकती। अगर वह अच्छा शासन देते हैं, तो एनडीए को एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर पर निर्भर रहने से आगे बढ़ना होगा।”

शिवकुमार ने दिखाया संयम

सिद्धारमैया की जगह लेने के बाद से शिवकुमार ने अब तक संयम से फैसला लिया है। कांग्रेस ने ढाई-ढाई साल का सीएम फार्मूला तय किया था। हालांकि ढाई साल बीत जाने के 6 महीने बाद तक भी शिवकुमार ने पार्टी के खिलाफ बयान नहीं दिया। वहीं सिद्धारमैया ने भी सत्ता सौंप दी। डीके शिवकुमार ने ऐसा दिखाया है कि वह सिद्धारमैया के आशीर्वाद से CM का पद संभाल रहे हैं। गुरुवार को सिद्धारमैया के इस्तीफे की घोषणा के बाद, शिवकुमार की उनके पैर छूते हुए तस्वीरें सामने आईं।

शिवकुमार के बीजेपी नेताओं से अच्छे रिश्ते

शपथ ग्रहण समारोह में कुछ ही दिन बचे हैं, ऐसे में चुने गए सीएम शिवकुमार यह पक्का करना चाहेंगे कि उनका ताकतवर वोक्कालिगा समुदाय (आबादी का लगभग 10% है) 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के साथ खड़ा हो जाए। बीजेपी नेताओं ने कहा कि शिवकुमार एक सफल बिजनेसमैन हैं जिनका बेंगलुरु में बेस है और इस इलाके के कई बीजेपी नेताओं (जिनमें विधायक भी शामिल हैं) से उनके मज़बूत रिश्ते हैं।

बीजेपी के एक सांसद ने कहा, “शिवकुमार के साथ पार्टी टॉप पर कैसे डील करेगी, यह अभी देखना बाकी है, क्योंकि इनमें से कई नेताओं का उनसे पुराना नाता है। एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) ने शिवकुमार के खिलाफ (मनी लॉन्ड्रिंग) जांच शुरू की थी। पार्टी का आइडिया हो सकता है कि वह अपने कैंपेन को सरकार की करप्ट इमेज पर फोकस करे। हमें देखना होगा कि यह कैसे होता है।”

लिंगायत वोट बैंक पर निर्भर बीजेपी

बीजेपी लिंगायत वोट बैंक पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, जो आबादी का लगभग 11.1% है। उसे इस सपोर्ट बेस को बनाए रखना एक चुनौती है क्योंकि पार्टी के पास कई लिंगायत नेता हैं, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा जितना मज़बूत कोई नहीं है। जबकि उनके बेटे और मौजूदा राज्य बीजेपी अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र अभी भी अपनी औपचारिक नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं। एक और लिंगायत नेता बसनगौड़ा पाटिल यतनाल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए छह साल के लिए निकाल दिया गया है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व राज्य पार्टी प्रमुख अनंत कुमार एक ब्राह्मण नेता थे, जिनकी 2018 में मृत्यु हो गई। ऐसे में येदियुरप्पा के बाद बीजेपी के पास बड़े पैमाने पर समर्थन वाला कोई लोकप्रिय नेता नहीं रहा है। पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि कांग्रेस में वोक्कालिगा नेता होने से विजयेंद्र के कर्नाटक में बीजेपी को लीड करने की उम्मीदें मज़बूत हुई हैं, क्योंकि पार्टी लिंगायतों के बीच अपना सपोर्ट मज़बूत करना चाहती है। लेकिन एक लिंगायत नेता को राज्य चीफ बनाने से पार्टी को केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे को भी मैनेज करना होगा, जो एक साफ बोलने वाली और लोकप्रिय वोक्कालिगा नेता हैं।

शोभा करंदलाजे का भी रखना होगा ध्यान

शोभा करंदलाजे की निडरता के लिए पहचान है और उन्हें ‘येदियुरप्पा कैंप’ का नेता नहीं माना जाता। हालांकि बीजेपी की 2023 के विधानसभा चुनाव में हार के लिए उन्हें बड़े पैमाने पर दोषी ठहराया जाता है। उन्होंने चुनाव मैनेजमेंट कमेटी की कन्वीनर के तौर पर काम किया है लेकिन उनका राजनीतिक दबदबा यह पक्का करता है कि उन्हें आसानी से साइडलाइन नहीं किया जा सकता। उडुपी-चिकमगलूर लोकसभा सीट से बैंगलोर नॉर्थ में शिफ्ट होने के बाद (जो उनके पहले के ग्रामीण गढ़ से ज़्यादा नेताओं से भरा हुआ है) करंदलाजे को पूर्व डिप्टी सीएम सी एन अश्वथ नारायण और चार बार के विधायक एस आर विश्वनाथ जैसे दूसरे वोक्कालिगा नेताओं के बीच अपनी पहचान बनाए रखने के लिए लगातार लड़ना होगा।

बीजेपी के लिए एक और चुनौती नॉर्थ कर्नाटक होगी, जो पार्टी के पुराने मज़बूत नेता बेल्लारी भाइयों का घर है। वहीं हैदराबाद-कर्नाटक बेल्ट कांग्रेस पारंपरिक रूप से मज़बूत रही है। अगर पार्टी राज्य में किसी युवा नेता को नियुक्त करती है, तो पुराने नेताओं के साथ संघर्ष होगा जो शायद कमज़ोर हो रहे हैं लेकिन फिर भी असरदार हैं।

खतरे में JDS?

शिवकुमार के सीएम बनने से जनता दल (सेक्युलर) के नेता और पूर्व सीएम एच डी कुमारस्वामी के सपनों को भी झटका लगा है। केंद्रीय मंत्री कुमारस्वामी के बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ अच्छे रिश्ते हैं, लेकिन राज्य बीजेपी में उनके कई विरोधी हैं। उन्हें फिर से सीएम बनने की उम्मीद थी। पता चला है कि उन्होंने बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व NDA के सीएम कैंडिडेट के तौर पर उनका साथ देने के लिए मनाने की कोशिश शुरू कर दी है। लेकिन शिवकुमार के सीएम बनने से कुमारस्वामी (वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं) को वोक्कालिगा कम्युनिटी का सपोर्ट पाने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और इस वजह से अब दिल्ली में बीजेपी लीडरशिप को मनाने में उन्हें मुश्किल हो सकती है।

पिछले साल कर्नाटक सरकार को सौंपी गई सोशियो-इकोनॉमिक और एजुकेशनल सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक वोक्कालिगा और लिंगायत, दो बड़ी जातियां आबादी का 21.3% हिस्सा हैं। हालांकि सर्वे दोबारा करना पड़ा क्योंकि दोनों जातियों ने दावा किया कि 2015 में किए गए सर्वे का डेटा पुराना हो गया है और डेटा में खामियां हैं। BJP के एक सूत्र ने कहा कि शिवकुमार के CM बनने से JDS के टूटने का चांस है क्योंकि DK यह पक्का करेंगे कि देवेगौड़ा की पार्टी से कांग्रेस में नेताओं और कैडर का फ्लो हो। पार्टी के अंदर के सूत्र ने आगे कहा, “JDS लीडरशिप का अब सबसे बड़ा काम अपने लोगों को एक साथ रखना होगा।” एक सूत्र ने कहा कि शिवकुमार के सत्ता में आने के साथ ही राज्य में एनडीए की चुनौतियां चार गुना बढ़ गई हैं, जिससे पार्टी के सामने चुनौती की हद का पता चलता है।

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डीके का शपथग्रहण 3 जून 2026 को होगा। डीके लंबे वक्त से सीएम बनने के लिए मशक्कत कर रहे थे लेकिन अब जब सीएम बनने का मौका आया है, तो कहा ये गया है कि उनका शपथ ग्रहण बेहद साधारण तरीके से होगा। पढ़ें पूरी खबर