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भागलपुर शहरी सीट: बीजेपी ने रोहित पांडेय पर जताया भरोसा, शाहनवाज हुसैन के नाम पर अटकलों पर लगा विराम

इस दफा भागलपुर से रोहित पांडेय को टिकट देकर भाजपा आलाकमान ने गुटों में बंटे भाजपाइयों को सबक सिखाया है। शाहनवाज हुसैन के भागलपुर सीट से उम्मीदवार होने की अटकलें लगाई जा रही थीं। बाद में इनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इसका खंडन किया था।

भागलपुर शहरी सीट पर टिकट मिलने के बाद खुशी जताते पार्टी कार्यकर्ता।

आखिरकार भाजपा ने भागलपुर शहरी सीट पर उम्मीदवार का नाम तय कर दिया है। आपसी गुटबाजी की वजह से निर्गुट कहे जाने वाले रोहित पांडेय को भाजपा प्रत्याशी घोषित किया गया हैंं। वे अभी भाजपा के भागलपुर जिलाध्यक्ष हैंं। हालांकि चार दिन पहले ही उन्हें नामांकन दाखिल करने की तैयारी करने का  फोन आ  चुका था। उन्होंने बताया कि केवल आधिकारिक तौर पर घोषणा का इंतजार था। तैयारी तो मैंने कर ली थी। अब भाजपाई कहने लगे हैंं कि चौबे बाबा बक्सर में अड़े तो भागलपुर में फिसले।

भाजपा की तरफ से भागलपुर चुनाव प्रभारी अभय कुमार घोष उर्फ सोनू घोष कहते हैंं कि मुझे तो पार्टी का निर्देश का पालन करना है। भाजपा के कार्यकर्ता पार्टी के अनुशासित सिपाही हैंं। इससे पहले  शाहनवाज हुसैन के  भागलपुर सीट से उम्मीदवार होने की अटकलें लगाई जा रही थीं। बाद में इनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इसका खंडन किया था।

बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिस तरह बक्सर सीट को अपनी नाक का बाल मानकर जदयू को नहीं दी। उसी तरह भाजपा के लिए भागलपुर सीट भी प्रतिष्ठा की है। बक्सर सीट पर भाजपा ने अपना उम्मीदवार उतारा है। नतीजतन गुप्तेश्वर पांडे डीजीपी पद से इस्तीफा देकर गच्चा खा गए। इसी तरह बक्सर के सांसद व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे भागलपुर सीट से अपने बेटे अर्जित सारस्वत चौबे को टिकट दिलाने में नाकाम रहे। अर्जित 2015 का चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवार अजित शर्मा से करीब 11 हजार मतों से हार गए थे। अर्जित की हार की एक वजह यह भी रही कि पार्टी के ही सक्रिय कार्यकर्ता विजय साह बागी बन चुनाव में डटे हुए थे। जिन्हें 15 हजार से ज्यादा वोट आए थे।

दरअसल इस दफा भागलपुर से रोहित पांडे को टिकट देकर भाजपा आलाकमान ने गुटों में बंटे भाजपाइयों को सबक सिखाया है। भागलपुर में शाहनवाज हुसैन, अश्विनी चौबे, सुशील कुमार मोदी और निशिकांत दुबे का गुट सक्रिय है।  शाहनवाज हुसैन इसी गुटबाजी का शिकार 2014 में हुए थे।  2014 के चुनाव में ये महागठबंधन के राजद उम्मीदवार शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल से करीब 9 हजार वोट से पराजित हो गए थे, जबकि 11 हजार मत नोटा में पड़े थे।

सुशील कुमार मोदी भी भागलपुर के सांसद रह चुके हैंं। मगर चौबे और शाहनवाज का छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। हार का ठीकरा एक दूसरे के सिर पर फोड़ते रहते हैंं। मसलन शाहनवाज की 2014 लोकसभा चुनाव में हार की वजह चौबे गुट के द्वारा भितरघात को बताया गया। वहीं 2015 में अर्जित की पराजय का दोष शाहनवाज गुट पर मढ़ा गया। 2019 में शाहनवाज का टिकट कटने की वजह चौबे गुट का विरोध बताया जाता है। इस बार  विधानसभा चुनाव में अर्जित का पत्ता साफ कराने में शाहनवाज की भूमिका बताई जा रही है। शाहनवाज हुसैन केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य भी हैंं।

अर्जित के अलावा भी अभय वर्मन, रोहित पांडे, प्रीति शेखर सरीखे कई उम्मीदवार टिकट के लिए लाइन में थे। मगर भाजपा ने रोहित पांडे को निर्गुट माना।  प्रीति शेखर को तो दोहरा धक्का लगा है। बांका के अमरपुर सीट जदयू कोटे में जाने से इनके पति मृणाल शेखर के मंसूबे पर पानी फिर गया। 2015 के चुनाव में ये भाजपा के यहां से उम्मीदवार थे, और जदयू से पराजित हुए थे। इधर प्रीति को भागलपुर सीट भी नहीं मिली। हालांकि मृणाल ने लोजपा का दामन थाम अमरपुर सीट से नामंकन दाखिल किया है। लेकिन  भागलपुर सीट पर रोहित का नाम तय कर पार्टी ने अटकलों पर विराम लगा दिया है।

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