Sonam Wangchuk News: संसद के मानसून सत्र से ठीक पहले आपसी फूट और नेताओं के पाला बदलने से जूझ रहे विपक्ष ने शनिवार को एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा। यह विरोध कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर पर चल रहे उनके प्रदर्शन स्थल से सफदरजंग अस्पताल ले जाए जाने को लेकर था। इससे संकेत पूरी तरह से साफ था कि सोमवार को जब सदन की कार्यवाही शुरू होगी, तो यह मुद्दा वहां पर भी गूंजेगा।

वांगचुक 28 जून से कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले भूख हड़ताल पर हैं। वे एग्जामिनेशन सिस्टम में बड़े सुधारों और बार-बार परीक्षा के पेपर लीक होने के कारण केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

संसद का सत्र बहुत अहम

यह सत्र बहुत अहम है। अजीब बात है कि अप्रैल में संसदीय सीटें बढ़ाने वाले संविधान संशोधन बिल को एकजुट होकर हराने के बाद से ही विपक्ष बिखरा हुआ है। तब से, बीजेपी-विरोधी चार पार्टियों के 37 लोकसभा और राज्यसभा सांसद सत्ता पक्ष में शामिल हो गए हैं। 1985 में दल-बदल विरोधी कानून लागू होने के बाद से संसद में विपक्ष से सत्ता पक्ष की ओर जाने वाले सांसदों की यह सबसे बड़ी संख्या है। इस हफ्ते की शुरुआत में तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद कोयल मल्लिक ने इस्तीफा दे दिया।

यह सब तब हो रहा है जब डीएमके ने उन अहम बिलों पर अपना रुख साफ नहीं किया है, जिनका उसने तीन महीने पहले जोरदार विरोध किया था। सरकार महिला आरक्षण कानून और परिसीमन बिल को लागू करने के लिए संविधान (131वां संशोधन बिल) को फिर से लाने की तैयारी करती दिख रही है, ऐसे में विपक्ष को उम्मीद है कि वांगचुक का मुद्दा कम से कम सभी पार्टियों को एक मंच पर ला सकता है।

अभिजीत दीपके ने शुरू की भूख हड़ताल

यह देखना होगा कि क्या सिर्फ इस मुद्दे में पार्टियों को एकजुट रखने और सरकार के खिलाफ उनके अभियान को जारी रखने का दम है, क्योंकि वांगचुक अब विरोध स्थल पर नहीं हैं और उनकी जगह सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने ले ली है।

कांग्रेस ने सीजेपी के विरोध प्रदर्शन पर कोई खास ध्यान नहीं दिया, क्योंकि विपक्ष के नेता राहुल गांधी कुछ समय से उन्हीं मुद्दों को उठाते रहे हैं और उन्होंने दो सार्वजनिक कार्यक्रम भी किए हैं। लेकिन जब सोनिया गांधी ने पार्टी से वांगचुक के साथ सार्वजनिक रूप से एकजुटता दिखाने को कहा और याद दिलाया कि 1984 में इंदिरा गांधी लेह जाकर वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल को ऐसी ही भूख हड़ताल खत्म करने के लिए मनाने गई थीं तो पार्टी ने अपना रुख बदल लिया।

पवन खेड़ा ने सोनम वांगचुक से की थी मुलाकात

सबसे पहले कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने बयान जारी किया और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा जंतर-मंतर जाकर वांगचुक से मिले। शनिवार को राहुल गांधी ने अपनी चुप्पी तोड़ी। इतने हफ्तों तक उन्होंने सीजेपी और जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन पर कोई टिप्पणी नहीं की थी। उनके करीबी लोगों का मानना ​​था और अब भी है कि सीजेपी आम आदमी पार्टी का ही एक मोर्चा है।

राहुल गांधी ने तोड़ी चुप्पी

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “मोदी सरकार के मुख्य सिद्धांत असत्य और हिंसा हैं। सोनम वांगचुक जी को जंतर-मंतर से हटाना, जबकि वे अहिंसक भूख हड़ताल पर थे, गलत है। पेपर लीक, शिक्षा की बढ़ती लागत और छात्रों की आत्महत्या भारत के भविष्य के लिए गंभीर मुद्दे हैं। कोई भी ताकत भारत के छात्रों को और हममें से जो लोग उनसे प्यार करते हैं और उनमें विश्वास रखते हैं। इन मुद्दों को उठाने से नहीं रोक सकती।”

उन्होंने यह पोस्ट छात्रों की गूंज हैशटैग के साथ किया। कांग्रेस पार्टी यह दिखाने की पूरी कोशिश कर रही है कि कैसे उसकी सरकारों ने 1984 में वांगचुक के पिता और 2011-12 में अन्ना हजारे के विरोध प्रदर्शनों को संभाला था, ताकि यह तर्क दिया जा सके कि बीजेपी सरकार असहमति और विरोध प्रदर्शनों से निपटने में अड़ियल रवैया अपना रही है।

एक गैर-राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अपनी छवि की वजह से वांगचुक के विरोध-प्रदर्शन वाली जगह पर विपक्षी नेताओं का तांता लगा रहा। शनिवार को उन सभी ने सरकार के कदम की कड़ी आलोचना की। हालांकि, सबसे दिलचस्प प्रतिक्रिया एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार की रही।

शरद पवार ने सरकार पर साधा निशाना

ऐसे समय में जब एनसीपी के दोनों गुटों के पीछे बीजेपी का अदृश्य हाथ होने के संकेत मिल रहे हैं, पवार ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि वांगचुक के आंदोलन को संभालने में सरकार का रवैया गैर-जिम्मेदाराना रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने छात्रों की जायज मांगों को पूरा करने के बजाय सिर्फ एक दर्शक की भूमिका निभाई।

बारामती में उन्होंने कहा, “जब हालात सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गए, तो उसने कार्यकर्ता को अस्पताल पहुंचा दिया। इसके बावजूद विरोध-प्रदर्शन जारी रहेगा।” उन्होंने कहा कि छात्रों की मांगें जायज थीं, लेकिन कार्यकर्ता के 20 दिनों तक उपवास पर रहने के बावजूद सरकार का कोई भी नेता उनसे मिलने नहीं आया।

आम आदमी पार्टी से लेकर शिवसेना (यूबीटी), तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और लेफ्ट तक, विपक्ष की दूसरी पार्टियों ने कहा कि जंतर-मंतर से वांगचुक को हटाना लोकतंत्र पर हमला है। सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष रविवार को सरकार की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में यह मुद्दा उठा सकता है।

सोनम वांगचुक से बात करनी चाहिए थी- केजरीवाल

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा, “इस तरह का अहंकार ठीक नहीं है। मोदी सरकार को सोनम वांगचुक को जबरदस्ती हटाने के बजाय उनसे बात करनी चाहिए थी। ‘कॉकरोच आंदोलन’ को कुचलने और देश की शिक्षा व परीक्षा प्रणाली में सुधार करने के बजाय, सोनम वांगचुक के साथ जबरदस्ती पेश आना मोदी सरकार की हार है।”

ममता बनर्जी ने बोला हमला

टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने कहा कि वांगचुक ने सिर्फ बातचीत की मांग की थी, फिर भी हफ्तों से उनकी अपील पर कोई जवाब नहीं मिला है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असहमति पर बातचीत होनी चाहिए, न कि चुप्पी साधी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा, “उनकी आवाज को नजर अंदाज किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे अनगिनत युवा भारतीयों की आवाज को नजर अंदाज किया जाता रहा है। जनता का भरोसा पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों के सम्मान से ही बनता है, जो सरकार असहमति को लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के बजाय खतरा मानती है, वह जवाबदेही से बचते हुए भरोसे की उम्मीद नहीं कर सकती।”

छात्रों के विरोध प्रदर्शन को बर्दाश्त नहीं किया जा रहा – आदित्य ठाकरे

शिवसेना यूबीटी नेता आदित्य ठाकरे ने वांगचुक को हटाए जाने को शर्मनाक बताया और आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस का यह कदम लोकतंत्र पर हमला है। उन्होंने कहा, “कितनी शर्म की बात है! दुनिया देख रही है कि भारत में लोकतंत्र को जबरदस्ती और बेशर्मी से तोड़ा जा रहा है। अब तो एक अयोग्य मंत्री के खिलाफ छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध को भी बर्दाश्त नहीं किया जाता।”

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस तानाशाह सरकार की ओर इशारा करते हुए कई उदाहरण दिए, जैसे मां गंगा को बचाने के लिए प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल का 111 दिन का आमरण अनशन, जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना और तीन रद्द कानूनों के खिलाफ किसानों का विरोध प्रदर्शन। उन्होंने कहा कि सरकार की नजर में जो कोई भी आवाज उठाता है, वह ‘राष्ट्र-विरोधी परजीवी’ होता है।

अखिलेश यादव ने क्या मांग की

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने मांग की कि वांगचुक का इलाज न्यायिक निगरानी में हो। साथ ही, उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह कभी भी महात्मा गांधी या शांतिपूर्ण विरोध के उनके तरीकों में विश्वास नहीं करती। यादव ने मांग की कि उन्हें हटाने के लिए सादे कपड़ों में चुपके से आए सुरक्षाकर्मियों की पहचान सार्वजनिक की जाए। उन्होंने बीजेपी पर दमनकारी राजनीति करने का आरोप भी लगाया।

बीजेपी ने विपक्षी पार्टियों पर किया पलटवार

विपक्ष पर भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित ने पलटवार किया है। उन्होंने कहा, “विपक्ष के मौकापरस्त लोग आज सुबह आराम से सोने और भरपेट नाश्ता करने के बाद अचानक जागे हैं और सवाल उठा रहे हैं कि सोनम वांगचुक की सेहत बिगड़ने और दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों के बावजूद उन्हें दूसरी जगह क्यों भेजा गया।”

मालवीय ने कहा कि असलियत उतनी नाटकीय नहीं थी। उन्होंने आगे कहा कि जब अधिकारियों ने दखल दिया, तो उनमें से कई लोग कहीं नजर नहीं आए जिन्होंने वांगचुक के अनशन को राजनीतिक तमाशा बना दिया था।

उन्होंने आरोप लगाया, “जब सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब वे मौजूद नहीं थे। विपक्ष के पास इस विरोध प्रदर्शन के लिए कभी कोई रचनात्मक सोच नहीं थी। उनका मकसद समाधान निकालना नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदे के लिए संकट को बनाए रखना था। अब उन्हें वह मौका नहीं मिला।”

यह भी पढ़ें: ‘अगर धर्मेंद्र प्रधान को पीएम मोदी बर्खास्त नहीं करते तो…’, अभिजीत दीपके ने CJP के संसद तक मार्च को लेकर क्या कहा?

सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर से ले जाकर सफदरजंग हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार को कथित परीक्षा पेपर लीक को लेकर अपना आंदोलन तेज़ कर दिया। सीजेपी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रही है लेकिन अब पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस्तीफे की मांग कर रही। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…