दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में बीजेपी को लेकर इन दिनों काफी चर्चा हो रही है। चर्चा की वजह यह है कि पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अन्नामलाई को लेकर कहा जा रहा है कि वह नाराज हैं और पार्टी छोड़ सकते हैं हालांकि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें मनाने की कोशिश की है।
तमिलनाडु में बीजेपी के लिए अपने संगठन का विस्तार करना और जीत हासिल करना बेहद मुश्किल रहा है। उत्तर भारत, पश्चिम भारत में अच्छी कामयाबी हासिल करने वाली बीजेपी के लिए तमिलनाडु में अपना आधार बनाना बड़ी चुनौती है। बावजूद इसके कि पिछले कुछ सालों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह समेत पार्टी संगठन और बीजेपी से जुड़े फ्रंटल संगठनों ने भी तमिलनाडु में पार्टी का विस्तार करने की कोशिश की है।
2026 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन के सहयोगी के तौर पर लड़ने के बाद भी पार्टी को सिर्फ एक ही सीट पर जीत नसीब हुई।
आइए, समझने की कोशिश करते हैं कि तमिलनाडु में बीजेपी का सफर कैसा रहा, पार्टी को राज्य में कब-कब कामयाबी मिली और उसके सामने क्या चुनौतियां हैं?
हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर फोकस
तमिलनाडु में जहां द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व रहा है और वहां पर डीएमके और एआईएडीएमके ने अपने गठन के बाद से ही सामाजिक न्याय, तमिलों की अलग पहचान को आगे रखा जबकि बीजेपी ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर फोकस किया। अपने शुरुआती सालों में, तमिलनाडु में बीजेपी की मौजूदगी लगभग शून्य थी। तमिलनाडु में बीजेपी को लगातार उत्तर भारतीयों की पार्टी या बाहर की पार्टी बताने की कोशिश की गई।
कन्याकुमारी में हिंदुत्व की राजनीति
1982 में कन्याकुमारी जिले के मंडाइकडू में हुई सांप्रदायिक झड़प के बाद राज्य में हिंदुत्व की राजनीति को बल मिला। 1984 के विधानसभा चुनाव में हिंदू मुन्नानी संगठन द्वारा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार वी. बालाचंद्रन ने पद्मनाभपुरम सीट पर 28,465 वोटों से जीत दर्ज की थी। उस विधानसभा चुनाव में बीजेपी के अधिकतर उम्मीदवारों को कोई खास कामयाबी नहीं मिली लेकिन कोलाचेल सीट से चुनाव लड़े एम.आर. गांधी ने 32,000 से ज्यादा वोट हासिल किए। गांधी को सिर्फ 589 वोटों से हार मिली थी। इस नतीजे से यह सामने आया था कि कन्याकुमारी में हिंदुत्व की राजनीति शुरुआती कदम बढ़ा चुकी थी। कन्याकुमारी जिला केरल से सटा हुआ है।
1996 में पहली बार कोई नेता पहुंचा विधानसभा में
तमिलनाडु में बीजेपी को 1996 में उल्लेखनीय कामयाबी मिली थी और यहां पहली बार उसका कोई नेता विधानसभा में पहुंचा था। सी. वेलायुथन इस दक्षिण भारतीय राज्य में पार्टी के पहले विधायक बने थे। उन्होंने उस वक्त डीएमके की लहर के बावजूद 4,540 वोटों से जीत दर्ज की थी। यह पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण साल था, जब कन्याकुमारी जिले की नागरकोइल, कोलाचेल और किल्लूर की सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही थी।
इसके बाद बीजेपी ने गठबंधन की राजनीति का सहारा लिया। उसने एआईएडीएमके और डीएमके के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। 1998 में वह एआईएडीएमके जबकि 1999 में डीएमके के साथ चुनाव मैदान में उतरी।
2001 में चार नेता बने विधायक
साल 2001 पार्टी के लिए बहुत अच्छा रहा, जब उसके चार नेता जीत कर तमिलनाडु की विधानसभा में पहुंचे। तब पार्टी ने डीएमके के साथ मिलकर तमिलनाडु में 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 3.19% वोट हासिल हुए थे।
साल 2006 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी अकेले तमिलनाडु के सियासी मैदान में उतरी और उसने 225 सीटों पर चुनाव लड़ा। हालांकि पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा, उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली और 221 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई। इसके बाद पार्टी ने अकेले चलने का फैसला किया लेकिन 2011 और 2016 के चुनाव में भी वह अपना खाता भी नहीं खोल सकी।
2021 में फिर से मिली चार सीटों पर जीत
2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने फिर से गठबंधन का सहारा लिया और एआईएडीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। उसने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और इस बार फिर से उसके चार नेताओं को विधायक बनने का मौका मिला। इन नेताओं में बीजेपी के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन तिरुनेलवेली से, एम.आर. गांधी, वनथी श्रीनिवासन और सी. सरस्वती ने क्रमशः नागरकोइल, कोयंबटूर (दक्षिण) और मोदकुरिची से जीत दर्ज की। तब बीजेपी को 2.62% वोट मिले थे।
कांग्रेस को छोड़ा पीछे, तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी बीजेपी
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने तमिलनाडु में तीसरा मोर्चा बनाया। इस मोर्चे में पीएमके और एएमएमके को भी शामिल किया गया। इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस से ज्यादा वोट हासिल किए थे। कांग्रेस को 10.67% वोट मिले थे जबकि बीजेपी 11.24 प्रतिशत वोट लाने में कामयाब रही थी और तब वह राज्य में तीसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। हालांकि उसे किसी भी संसदीय सीट पर जीत नहीं मिली थी।
2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एनडीए के सहयोगी दलों- एआईएडीएमके, जी.के. वासन की तमिल मनिला कांग्रेस (मूपानार) और बी. जॉन पांडियन की तमिलगा मक्कल मुन्नेत्र कषगम के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। पार्टी ने कुल 33 सीटों पर चुनाव लड़ा। बीजेपी को 2.97% वोट मिले और उसे सिर्फ एक सीट पर जीत मिली।
अन्नामलाई ने बहाया पसीना
तमिलनाडु बीजेपी के कुछ पिछले अध्यक्षों- तमिलिसाई सौंदरराजन, एल. मुरुगन और के. अन्नामलाई ने भी पार्टी की आम लोगों तक पहुंच बढ़ाने के लिए काम किया। खासतौर पर अन्नामलाई के अध्यक्ष रहते हुए बीजेपी ने जमीन पर काफी सक्रियता दिखाई और सोशल मीडिया पर भी अन्नामलाई पार्टी के बड़े चेहरे के रूप में उभरे। उन्होंने पूरे तमिलनाडु में यात्रा निकाली और राज्य की तत्कालीन डीएमके सरकार को घेरा।
यह समझ में आता है कि बीजेपी ने तमिलनाडु में अपना आधार बढ़ाने के लिए लगातार मेहनत की है लेकिन अभी उसे राज्य की राजनीति में लंबा सफर तय करना है। बीजेपी ने शहरी और अर्ध शहरी इलाकों में अपना संगठन मजबूत करने की दिशा में लगातार काम किया है। बीजेपी ने पश्चिम तमिलनाडु में गौंडर और दक्षिण में थेवर समुदायों के बीच अपनी पहुंच बढ़ने की कोशिश की है।
बीजेपी के सामने क्या हैं चुनौतियां?
बीजेपी पर आरोप लगता है कि वह तमिलनाडु में हिंदी भाषा को थोपने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा तमिलनाडु में अपना स्वतंत्र आधार बनाने के लिए वह गठबंधन के सहयोगियों पर निर्भर रहने को मजबूर है। हिंदी बनाम तमिल का सवाल तमिलनाडु में हमेशा गूंजता रहा है। नई शिक्षा नीति, हिंदी भाषा थोपने, केंद्र द्वारा तमिलनाडु के साथ भेदभाव का आरोप लगाकर विरोधी दल बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं। हालांकि बीजेपी के सामने चुनौतियां काफी हैं लेकिन वह धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ाने में जुटी है।
क्या बीजेपी छोड़ेंगे अन्नामलाई?
तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई पार्टी को अलविदा कह सकते हैं। इस तरह की चर्चा है कि अन्नामलाई बीजेपी को छोड़ने और नई पार्टी बनाने पर विचार कर रहे हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
