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संसदीय समिति कर रही थी पीएम केयर फंड की समीक्षा, बीजेपी सांसदों ने बोल दिया हल्ला- जब संसद पैसा नहीं दे रही तो जांच क्यो?

कोरोना संकट से निपटने के लिए उठाए गए केंद्र सरकार के कदमों और पीएम केयर्स फंड की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई थी लेकिन ये बैठक बीजेपी सांसदों के हंगामें की भेंट चढ़ गई।

Author Edited By प्रमोद प्रवीण नई दिल्ली | Published on: July 11, 2020 9:20 AM
PM Narendra Modi, PM cares fundपीएम केयर्स फंड को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। (फाइल फोटो)

लॉकडाउन की वजह से संसदीय समितियों की बैठक नहीं बुलाई जा रही थी लेकिन अनलॉक शुरू होने के बाद सोशल डिस्टेंसिंग के साथ अब इसकी इजाजत दे दी गई है। इसी क्रम में संसद की लोक लेखा समिति, जिसे पब्लिक अकाउंट कमेटी भी कहा जाता है, ने शुक्रवार (10 जुलाई) को कोरोना संकट से निपटने के लिए उठाए गए केंद्र सरकार के कदमों और पीएम केयर्स फंड की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई थी लेकिन ये बैठक बीजेपी सांसदों के हंगामें की भेंट चढ़ गई।

लोक लेखा समिति (पीएसी) संसद की एक एक ताकतवर समिति होती है, जो सीएजी द्वारा दिए गए रिपोर्ट की समीक्षा करती है। अधीर रंजन चौधरी मौजूदा वक्त में इस कमेटी के अध्यक्ष हैं। वह लोकसभा में कांग्रेस के नेता भी हैं। चौधरी ने पीएसी की बैठक में सदस्यों से अंतरात्मा की आवाज सुनने और उसके आधार पर राष्ट्रहित में काम करने की अपील की लेकिन पूरी संख्या में पहुंचे बीजेपी सांसदों ने कमेटी के अध्यक्ष के प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया और पीएम केयर्स फंड की समीक्षा पर सहमति नहीं बनने दी।

समिति में बीजेपी को बहुमत हासिल है। उसकी तरफ से पार्टी के सीनियर लीडर भूपेंद्र यादव ने चौधरी के प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया और कहा कि जब संसद ने पीएम केयर्स फंड में पैसा नहीं दिया तो संसदीय समिति इसकी जांच क्यों करेगी?

इस क्रम में बीजेपी को सबसे बड़ा साथ ओडिशा की सत्ताधारी बीजू जनता दल के सांसद भर्तुहरि महतानी का मिला। विपक्षी सदस्यों में डीएमके नेता टी आर बालू ने अध्यक्ष के प्रस्ताव का समर्थन किया।

कुछ विपक्षी नेताओं ने दावा किया कि COVID-19 महामारी की जांच से बीजेपी इसलिए डरती है क्योंकि पीएम केयर्स फंड और महामारी में घनिष्ठ संबंध है और यह फंड भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) के ऑडिट के तहत नहीं आता है।

बता दें कि पीएसी की बैठकों में पहले विभिन्न मुद्दों पर सहमति बनती है, उसके बाद उस पर चर्चा होती है। अगर पीएम केयर्स फंड पर चर्चा को सहमति बनती तो केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी के लिए यह मुश्किलें खड़ी कर सकती थीं। संभवत: इसलिए बीजेपी ने पूरी ताकत से इसका विरोध किया।

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