पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद से ममता बनर्जी की पार्टी बिखरती जा रही है। ममता के करीबी नेता जो कभी उनके हमदर्द हुआ करते थे, अब बगावत का बिगुल फूंक चुके हैं। ऐसे में टीएमसी के कई नेता ममता बनर्जी से मुंह मोड़ चुके हैं। हालांकि, जो अभी भी टीएमसी में शामिल हैं तो उनके भी बोल बदल चुके हैं।

टीएमसी के इस पतन से भाजपा को कई फायदे हुए हैं। इनमें सबसे प्रमुख फायदा यह है कि संसद में तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के विखंडन से उसे बढ़त मिलेगी, जिससे सत्तारूढ़ दल के कुछ प्रमुख विधायी एजेंडों को पारित कराने की संभावना बढ़ जाएगी।

हालांकि, कोलकाता में टीएमसी की विधायक दल और दिल्ली में संसदीय दल का तेजी से विघटन और इसमें भाजपा की भूमिका ने कई भाजपा नेताओं के बीच बेचैनी की भावना पैदा कर दी है, जो इसे लंबे समय में एक रणनीतिक बोझ के रूप में देखते हैं।

मुख्य रूप से दो तरह की चिंताएं हैं। पहली, एक वर्ग ने इस विभाजन को बढ़ावा देने में भाजपा की भूमिका की “खराब छवि” की ओर इशारा किया। 8 जून को, जब कई टीएमसी के बागी सांसद केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पश्चिम बंगाल चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास पर बैठक के लिए एकत्रित हुए, तो पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी उनसे मिलने पहुंचे। बाद में उसी रात उन्होंने टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय के घर पर उनमें से कुछ से दोबारा मुलाकात की।

टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि बागी सांसद, जिनका दावा है कि उनकी संख्या 20 है। उन्होंने फिलहाल एनडीए के साथ रहने और उसे पूरा समर्थन देने का फैसला किया है। उन्होंने आगे कहा, “बाद में हम (बागी सांसद) एक साथ बैठकर तय करेंगे कि किस तरह का समर्थन देना चाहिए।”

भाजपा सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी की स्थिति उनके भतीजे और उत्तराधिकारी अभिषेक को दरकिनार करने की मांग को लेकर नाजुक बनी हुई है, ऐसे में और भी टीएमसी सांसदों के दल बदलने की आशंका है। यह मांग संकट से गुजर रही टीएमसी प्रमुख के वफादारों की ओर से भी उठी है।

चूंकि मतदाताओं ने भाजपा पर भरोसा जताया है और टीएमसी के कथित “अहंकार”, भ्रष्टाचार और मनमानी को नकार दिया है, इसलिए सत्ताधारी पार्टी के कई नेताओं का मानना ​​है कि तृणमूल नेताओं के अलग हुए गुटों से किसी भी तरह का संबंध दीर्घकाल में नुकसानदायक साबित होगा। आशंका यह है कि भाजपा शासन को पूर्ववर्ती शासन का विस्तार माना जा सकता है और इससे यह धारणा बन सकती है कि परिवर्तन केवल दिखावटी है।

सांसदों के विद्रोह से पहले टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन किया था, जिन्हें संगठन के नेतृत्व ने निष्कासित कर दिया था। ऋतब्रत बनर्जी राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) बने थे। यह विपक्ष के नेता के रूप में नेतृत्व द्वारा ममता बनर्जी के पुराने करीबी शोवनदेब चट्टोपाध्याय के चयन के सीधे विरोध में था। ऋतब्रत अब कम से कम 64 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं और उन्होंने कहा है कि वे अगले सप्ताह सदन परीक्षण के लिए तैयार हैं।

भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि इस मामले में, राज्य सरकार ने विपक्ष को चुना है और वही तय कर सकती है कि उसे कहां रखा जाए। जब ​​तक वे एक अलग पार्टी हैं और भाजपा को सत्ता में हिस्सेदारी नहीं करनी पड़ती, तब तक शुरुआती दौर में तो सब ठीक रहेगा। लेकिन लंबे समय में यह पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित होगा।

राज्य में भाजपा पदाधिकारियों ने टीएमसी नेताओं को पार्टी में शामिल करने पर सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त की है। नव नियुक्त वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने ऋतब्रत के विद्रोह के एक दिन बाद 4 जून को फेसबुक पर पोस्ट किया था, “टीएमसी के इस आत्म-विनाश पर मुझे कोई दुख नहीं है। मेरी एकमात्र आशा यही है कि इन उपद्रवियों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल भाजपा को दूषित न करे। भाजपा में हमें उन झूठे मित्रों से हमेशा सावधान रहना होगा जो आज अपने अतीत के पापों को धोने के लिए हमारे करीब आ रहे हैं। बंगाल का शुद्धिकरण अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता।”

जब टीएमसी विधायकों ने पहली बार बगावत का झंडा उठाया तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने भी इस बात पर जोर दिया कि उनकी पार्टी के दरवाजे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए बंद हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा का तृणमूलकरण कभी नहीं होगा। टीएमसी के लिए हमारे दरवाजे बंद हैं। हमने बिना किसी को बाहर से लाए 208 सीटें हासिल कीं। लोगों ने टीएमसी नेताओं के खिलाफ वोट दिया। इस बार हमारी रणनीति जमीनी स्तर से शुरू हुई। दागी लोगों को हम कैसे शामिल कर सकते हैं?

भाजपा के एक पदाधिकारी ने कहा कि यह भाजपा के लिए अखिल भारतीय समस्या है। हम कांग्रेस-मुक्त भारत चाहते थे, लेकिन अब भाजपा कांग्रेस या विपक्षी नेताओं को शामिल करने वाली पार्टी बनती जा रही है। ऐसे नेताओं को चिंता है कि अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए विपक्षी दलों को तोड़कर और उनके नेताओं को शामिल करके उन्हें कमजोर करने से दीर्घकाल में गहरी कमजोरियां पैदा हो सकती हैं और भाजपा की मूलभूत संस्कृति में बदलाव आ सकता है, जो अनुशासन पर जोर देने वाली एक कैडर-आधारित पार्टी है।

वामपंथ के पुनरुत्थान का प्रश्न

टीएमसी के पतन को लेकर दूसरी चिंता यह है कि इससे पैदा हुआ शून्य वामपंथियों के पुनरुत्थान के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान कर सकता है। भाजपा नेतृत्व ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी के मौजूदा समर्थन से अवगत है। उसका वोट शेयर 40.8% था, जो सत्ताधारी पार्टी से लगभग 5 प्रतिशत अंक पीछे है और अगर यह पार्टी बिखर जाती है, तो इसका एक बड़ा हिस्सा सीपीआई (एम) की ओर जा सकता है, जिससे उसे नई ऊर्जा मिल सकती है। इस चुनाव में सीपीआई (एम) को मात्र 4.45% वोट मिले।

राज्य के एक सांसद और एक विधायक समेत कम से कम तीन नेताओं ने कहा कि टीएमसी को खत्म नहीं होना चाहिए, क्योंकि भाजपा के लिए मजबूत वामपंथी दलों की तुलना में इसे संभालना आसान होगा। एक नेता ने कहा कि टीएमसी एक विचारधाराविहीन पार्टी है। भाजपा के लिए ऐसी पार्टियों से निपटना आसान होता है। लेकिन विपक्ष में पैदा हुआ शून्य वामपंथी दलों को पुनर्जीवित कर सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर टीएमसी के अधिकांश नेता भाजपा में शामिल हो जाते हैं, तो शुभेंदु अधिकारी सरकार टीएमसी के समय के “भ्रष्ट और अपराधियों” के खिलाफ कैसे कार्रवाई करेगी।

हालांकि, एक अन्य नेता ने वामपंथ के पुनरुत्थान की संभावना को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वामपंथ का विकल्प बनना संभव नहीं है क्योंकि आज की राजनीति में इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है।

भले ही ऐसा न हो पाए, लेकिन भाजपा का एक वर्ग ममता बनर्जी के इंडिया गठबंधन को एकजुट करने और विपक्षी दलों के समर्थन से अपनी पार्टी को फिर से मजबूत करने के प्रयासों पर कड़ी नजर रखे हुए है। सैद्धांतिक रूप से, ममता के नेतृत्व वाली टीएमसी, कांग्रेस और वामपंथी दलों का एक साथ आना भविष्य में भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है, लेकिन बंगाल में विपक्षी दलों के बीच मौजूद गहरी फूट को देखते हुए फिलहाल यह संभव नहीं लगता। जहां कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं ने ममता और अभिषेक दोनों का समर्थन किया है। वहीं वामपंथी नेताओं ने राज्य में चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम पर ‘देखते रहो’ का रुख अपनाया है। एक वामपंथी नेता ने कहा कि फिलहाल टीएमसी के प्रति नरम रुख अपनाने की कोई योजना नहीं है।

अभिषेक बनर्जी के घर पर 4 घंटे तक ED की छापेमारी, मदन मित्रा के आवास पर भी दबिश

पश्चिम बंगाल की राजनीति शनिवार को पूरी तरह गरमा गई। एक तरफ कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के आवास पर पुलिस और केंद्रीय बलों की बड़ी टीम ने छापेमारी की, तो दूसरी तरफ नगर पालिका भर्ती घोटाले में ईडी ने टीएमसी विधायक मदन मित्रा के कई ठिकानों पर एक साथ दबिश दी। इन दोनों घटनाओं ने राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। पढ़ें पूरी खबर।