सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में नागरिकता से जुड़े कानून की स्थिति स्पष्ट कर चुका है। उनके मुताबिक, नागरिकता का निर्धारण गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।

जस्टिस धूलिया ने शुक्रवार को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के ‘आइडिया एक्सचेंज’ कार्यक्रम में यह बात कही। उनसे जुलाई 2025 में बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की सुनवाई के दौरान की गई उनकी टिप्पणी के बारे में पूछा गया था। उस समय उन्होंने कहा था कि नागरिकता का मुद्दा चुनाव आयोग के बजाय गृह मंत्रालय द्वारा तय किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मतदाता का भारतीय नागरिक होना जरूरी है। लेकिन इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि उस समय उनके सामने आधार और वोटर कार्ड को स्वीकार करने का मुद्दा आया था। उन्होंने कहा कि किसी ने SIR पर रोक लगाने की मांग नहीं की थी। इसलिए उन्होंने रोक लगाने का आदेश नहीं दिया।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर भी बोले

जस्टिस धूलिया से द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बारे में भी पूछा गया जिसमें बताया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन, मतदाता सूची नें नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटा से जुड़े कुछ फैसले शामिल थे।

इस पर जस्टिस धूलिया ने कहा कि अगर चुनाव आयोग के फैसले केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर लिए जा रहे थे- जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है तो यह गंभीर मामला है। हालांकि उन्होंने साथ ही कहा कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी और पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

गोवा के 97 मतदाताओं का मामला

गोवा के उन 97 मतदाताओं के मामले पर भी जस्टिस धूलिया से सवाल पूछा गया जिनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए गए थे। इस मामले में गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था।

जस्टिस धूलिया ने कहा कि किसी अदालत के आदेश की अवमानना तभी मानी जाती है जब यह साबित हो कि आदेश का जानबूझकर और स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया गया है। उन्होंने कहा कि यह भी संभव है कि चुनाव आयोग की ओर से निर्देश दिए गए हों, लेकिन निचले स्तर के किसी अधिकारी ने उनका पालन नहीं किया हो। इसलिए इस मामले में अवमानना की कार्रवाई करना आसान रास्ता नहीं है।

बिहार SIR की सुनवाई में क्या हुआ था?

जुलाई 2025 में जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने बिहार में मतदाता सूची के SIR पर रोक लगाने से इनकार किया था। हालांकि बेंच ने चुनाव आयोग से आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों पर भी विचार करने को कहा था। उसी सुनवाई के दौरान नागरिकता तय करने के अधिकार को लेकर भी सवाल उठा था।

शुक्रवार को जस्टिस धूलिया ने अपने उस आदेश के संदर्भ में कहा कि वह उस समय केवल एक-दो दिन के लिए वैकेशन जज थे। उन्होंने कहा कि उनके सामने मुख्य रूप से यह सवाल था कि छुट्टी के दौरान मामले की सुनवाई कैसे की जाए। उन्होंने अगले दिन सुनवाई की और आधार कार्ड समेत दूसरे दस्तावेजों को लेकर अंतरिम आदेश दिया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि SIR मामले पर पूरी दलीलें उनके सामने नहीं हुई थीं। इसलिए मामले के अंतिम फैसले से जुड़े सवाल उन जजों से पूछे जाने चाहिए जिनके सामने पूरी सुनवाई हुई थी और जिन्होंने अंतिम फैसला लिया।