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‘हमेशा नीतीश को वोट दिया, लेकिन लालू हमारे लिए ठीक नहीं रहे’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हो सकता है कि एक मजबूत पिछड़ा वर्ग गुट बनाने के लिए राजद प्रमुख लालू प्रसाद के साथ गठबंधन किया हो जो विधानसभा चुनाव..

Author पटना | October 8, 2015 7:16 PM
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद (बाएं) और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (दाएं)। (फाइल फोटो)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हो सकता है कि एक मजबूत पिछड़ा वर्ग गुट बनाने के लिए राजद प्रमुख लालू प्रसाद के साथ गठबंधन किया हो जो विधानसभा चुनाव जीतने के लिए मजबूत आधार प्रदान करे लेकिन यह भी प्रतीत होता है कि इसकी कीमत उन्हें एक मजबूत वोट आधार गंवाकर चुकानी पड़े जिसमें कई पारंपरिक समर्थक भी शामिल हैं।

राजद प्रमुख की ओर से मंडल समर्थक बयानबाजी और उनके द्वारा चुनाव को ‘‘सवर्ण बनाम पिछड़ों’’ के बीच लड़ाई करार देने से कुछ सीमा तक उनके मूल मतदाताओं यादव को एकजुट किया है लेकिन चुनाव पर बारीक नजर रखने वालों का कहना है कि इसने अंतिम क्षण में हालात देखकर फैसला करने वालों को निर्णायक रुख अपनाने को प्रेरित किया है और कुछ नीतीश समर्थकों को भाजपा नीत राजग के नजदीक ला दिया है।

महादलित समूह से ताल्लुक रखने वाले एक रिक्शावाले सुखदेव महतो ने कहा, ‘‘मैंने हमेशा ही नीतीश कुमार को वोट दिया है। लेकिन लालू प्रसाद हमारे लिए ठीक नहीं रहे हैं।’’

चुनाव में राजग का चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपनी पसंद स्पष्ट करते हुए उसने कहा, ‘‘मैं मोदी सरकार के लिए वोट करूंगा।’’ उल्लेखनीय है कि राजग ने मुख्यमंत्री पद के लिए अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है और यह चुनाव मोदी के नाम पर लड़ रहा है।

भाजपा ने अपने इस संदेश के प्रभाव को बढ़ाने के लिए लालू द्वारा जाति पर जोर दिये जाने का इस्तेमाल किया कि नीतीश कुमार को वोट करने का मतलब होगा ‘जंगलराज’ की वापसी। यह अत्यंत पिछड़ा वर्ग जैसे समुदाय के मतदाताओं को एकजुट करने में कारगर है जिन्होंने नीतीश को समर्थन करने के लिए लालू का साथ छोड़ा लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया था।

कुल मतदाताओं में अत्यंत पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की संख्या करीब 30 से 35 प्रतिशत है और इसमें दर्जनों जातियां आती हैं। इन्हें अस्थायी मतदाता समूह के तौर पर देखा जाता है। इस राज्य में इन्हें दोनों ही गठबंधनों द्वारा पूरे जोरों से आकर्षित किया जा रहा है जहां की चुनावी राजनीति में जाति संभवत: अकेला सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

नीतीश जहां यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे मुख्यमंत्री के रूप में उनके तीसरे कार्यकाल का समर्थन करेंगे। भाजपा यह सुनिश्चित करने का पूरा प्रयास कर रही है कि वे उनके पक्ष में ही रहें। नीतीश 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी के विकास के एजेंडा के बहाव में टिक नहीं पाये थे।

यादव क्षत्रप नीतीश नीत महागठबंधन के खिलाफ राजग के प्रचार अभियान के केंद्र में हैं जिसमें जदयू, राजद और कांग्रेस शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और राजग के बड़े नेता लालू पर हमले कर रहे हैं। शाह ने नीतीश को मात्र लालू के लिए ‘‘मुखौटा’’ भी बताया है।

लालू के इस बयान …‘‘हिंदू भी गोमांस खाते हैं’’… ने भाजपा को फिर से महागठबंधन पर इस साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील मुद्दे पर हमले की मुद्रा में आने का मौका दे दिया है जो कि संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान के बाद बचाव की मुद्रा में आ गई थी कि आरक्षण नीति की समीक्षा होनी चाहिए। मोदी ने आज की अपनी रैलियों में इसका इस्तेमाल यादवों को आकर्षित करने के लिए किया जो पारंपरिक रूप से डेयरी व्यवसाय में रहे हैं।

नीतीश विकास को लेकर अपने पिछले रिकॉर्ड पर भाजपा द्वारा किये जाने वाले हमले का जवाब देने में व्यस्त हैं और दावा कर रहे हैं कि बिहार ने भाजपा शासित कई राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है, चुनावी बहस में लालू प्रमुख रूप से छाये हुए हैं।

यद्यपि जदयू के कई नेता नीतीश के लालू से हाथ मिलाने को अपने लिए लाभकारी बता रहे हैं। जदयू के नेता सुनील सरन ने पार्टी मुख्यालय में सवाल किया, ‘‘लालूजी यदि जाति की बात करते हैं तो इसमें नुकसान क्या है? वह सवर्ण बनाम पिछड़ों की राजनीति की उपज हैं। यदि सभी पिछड़े एकजुट हो जाएं तो क्या कोई भी नीतीश जी को (फिर से मुख्यमंत्री बनने से) रोक सकता है।’’

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