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बिहार चुनाव: मांझी के अड़ने से अटका सीटों का बंटवारा

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ओर से सीटों का एलान पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी अवाम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी के अड़ जाने के कारण..

माना जाता है कि पासवान के साथ मतभेदों के बाद मांझी किसी तरह से अपनी मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। (पीटीआई फाइल फोटो)

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ओर से सीटों का एलान पूर्व मुख्यमंत्री और हिंदुस्तानी अवाम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी के अड़ जाने के कारण शनिवार को टल गया। मांझी के अड़ने के कारण ज्यादा सीटों की मांग माना जा रहा है।

शनिवार की शाम भाजपा सहित एनडीए में शामिल पार्टियों में से किसको बंटवारे में कितनी सीटें मिलेंगी, यह ऐलान होने की संभावना थी। इसके लिए शाम साढ़े छह बजे प्रेस कांफ्रेंस रखी गई थी। पहले प्रेस कांफ्रेंस डेढ़ घंटे बाद रात आठ बजे तक टाली गई लेकिन बाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इसे रविवार तक के लिए टाल दिया। संभावना है कि माझी के साथ फिर से बातचीत के बाद रविवार को भाजपा सीटों के बंटवारे का एलान कर दे।

इससे पहले शाम को अमित शाह के साथ उनके निवास पर बिहार के भाजपा नेताओं ने मुलाकात की। बाद में शाह और मांझी के बीच बातचीत हुई, जो बेनतीजा रही। सूत्रों के मुताबिक भाजपा मांझी की पार्टी को पंद्रह सीटें देने पर राजी हुई है और उनके पांच अन्य लोगों को अपने चुनाव चिह्न से यानी भाजपा उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ाना चाहती है। लेकिन मांझी इसके लिए राजी नहीं हुए। वे ज्यादा सीटों की मांग से साथ ही बाकी पांच को भी हिंदुस्तानी अवाम पार्टी के उम्मीदवार के रूप में टिकट दिए जाने पर अड़े रहे। सूत्रों ने बताया कि मांझी के नहीं मानने के बाद सीटों का एलान टाल देना पड़ा।

समझा जाता है कि रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को बिहार के आगामी चुनावों में 40 सीटें दिए जाने का फैसला हो चुका है। इसी तरह, सूत्रों का कहना है कि 25 से 27 सीटों की मांग कर रही उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को सीटें दिए जाने के मामले में भी फैसला कर लिया गया है। केवल मांझी के अड़ जाने से भाजपा को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है और इसी कारण शनिवार को सीटों की घोषणा टल गई। माना जाता है कि पासवान के साथ मतभेदों के बाद मांझी किसी तरह से अपनी मांग से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। सीटों के बंटवारे में देरी से छोटी पार्टियां के लिए परेशानी बढ़ रही है क्योंकि उन्हें भाजपा की तुलना में तैयारी के लिए ज्यादा समय की दरकार है।

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