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Bihar Polls 2015: हार के बाद बिहार

इस बार जीत से ज्यादा हार पर नजर है। दिल्ली में हार से दो-चार होने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी ने किरण बेदी को आगे कर दिया था। चुनाव बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ा था।

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इस बार जीत से ज्यादा हार पर नजर है। दिल्ली में हार से दो-चार होने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी ने किरण बेदी को आगे कर दिया था। चुनाव बेशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ा था। लेकिन पार्टी के लिए यह आसान नहीं था कि वह हार की आंच प्रधानमंत्री तक पहुंचने दे। वैसे भी दिल्ली में जिस तरह से लड़ाई मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी के बीच में सिमट गई थी, उसका और आगे विस्तार मोदी की छवि को धूमिल कर सकता था। लेकिन हाल-फिलहाल बिहार में किरण बेदी जैसा कोई बचाव का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा। यहां तो हार-जीत का सारा दारोमदार नरेंद्र मोदी और बिहार के क्षत्रपों के बीच में ही सिमटा हुआ है।

भाजपा का दांव राज्य में प्रतिपक्ष के उसके नेता सुशील कुमार मोदी पर ही खेला जा रहा दिखाई देता है। लेकिन उनके सामने जो धुरंधर हैं उनसे राजनीतिक रूप से अपने दम पर निपटना शायद उनके लिए उतना आसान नहीं है। बिहार के ज्यादातर कद्दावर नेता राष्टीय स्तर पर अपनी धाक जमा चुके हैं, जबकि सुशील मोदी का दायरा कभी भी राज्य की सीमाओं को लांघ कर देश तो क्या राजधानी दिल्ली तक भी अच्छे से फैल नहीं पाया। कभी नीतीश कुमार के साथ उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रहे मोदी और कुमार के बीच अब एक गहरी खाई दिखाई दे रही है। राजनीति में दोस्ती के दुश्मनी में बदलने को वक्त ही कितना लगता है। यही दोनों नेताओं के साथ भी हुआ है।

बहरहाल, भाजपा के खिलाफ जो साझा मोर्चा खड़ा किया गया था उसमें तो पहले ही फूट पड़ चुकी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव उससे पहले ही किनारा कर चुके हैं। बिहार में कांग्रेस की हालत तो एक अरसे से खस्ता है। देश में सत्ता पर काबिज होने का दम भरने वाली कांग्रेस बिहार में अपना आधार कब का खो चुकी है। यहां पार्टी को भाजपा के खिलाफ बनाए गए महागठबंधन में तीसरे स्थान पर नाममात्र सीटों के साथ ही संतोष करना पड़ा है। इस बार भी 243 की विधानसभा में कांग्रेस को लड़ने के लिए 41 सीटें दी गई हैं।

इन पर जीत के लिए उसे लालू-नीतीश का ही मुंह देखना पड़ता है। बिहार में ऐसा पहली बार है कि लालू और नीतीश ने राजनीतिक रूप से एक मारक गठबंधन तैयार किया है। बिहार में सर्वाधिक 11 फीसद यादवों का वोट बैंक है जिस पर पार्टियों की जीत का दारोमदार रहता है। यादवों के राज्य में वर्चस्व का अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि इस बार प्रांत में 90 के करीब यादव उम्मीदवार मैदान में हैं। यहां यादव समुदाय के प्रभाव का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1995 में विधानसभा में 86 यादव विधायक चुन कर आए थे। हालांकि यह आंकड़ा उत्तरोत्तर सिकुड़ता ही गया है। मौजूदा विधानसभा में यादव विधायकों की संख्या सिमट कर 39 रह गई है।

लेकिन इसका कारण यादव वोट बैंक का बिखर जाना रहा। इस बार नीतीश कुमार के साथ हाथ मिला कर लालू यादव इस वोट बैंक को महागठबंधन के पक्ष में भुनाने की आस लगाए बैठे हैं। महागठबंधन को आस है कि पिछड़ों पर नीतीश कुमार और यादवों पर लालू के प्रभाव और कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक के कारण वे बिहार में दिल्ली को दुहरा देंगे और तेजी से दौड़ रहे नरेंद्र मोदी के रथ का एक और पहिया अलग कर देंगे। लेकिन यह कितना संभव होगा, यह देखने की बात है।

क्योंकि, पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक को अगर भूल जाएं तो पिछले एक अरसे में नीतीश कुमार ने एक के बाद एक अपने विश्वासपात्र नेताओं को खो दिया है। और यही विश्वासपात्र अब उनके और विधानसभा के बीच दीवार बन कर खड़े हो गए हैं। सुशील मोदी उनके दोस्त थे, लेकिन उनकी राजनीति सदा अलग रही और वे उनके साथ उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बनने के बाद ही उनके और करीब आए। लेकिन उनके लिए राजनीतिक खतरा बन कर खड़े होने वाले तो रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा और हम के जीतन राम मांझी हैं। दोनों कभी कुमार के खासमखास थे और आज वे उनकी कट्टर विरोधी भारतीय जनता पार्टी के साथ जाकर खड़े हो गए हैं। ऐसे में कुमार को लालू का सहारा ही बड़ी भूमिका निभा सकता है और जिस पर उनकी नजर भी है।

अगर राजनीतिक गणित के हिसाब से देखा जाए तो एनडीए इस समय कुमार पर सहज ही भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। बिहार के बाहर नीतीश कुमार बेशक विकास की दुहाई दें लेकिन राज्य के अंदर तो उन्हें अपनी राजनीतिक लड़ाई जाति के दम पर ही लड़नी होगी। ऐसे भी भाजपा के अमित शाह की राजनीति किसी चक्रव्यूह से कम नहीं। अगर कुमार की निर्भरता यादव, पिछड़ों और मुसलिम समुदाय के बल पर है तो उसमें सेंध लगाने के लिए शाह ने भूमिहार, अगड़ों, पिछड़ों, दलितों और महादलित का एक घातक राजनीतिक गठजोड़ खड़ा किया है। राज्य के ताकतवर कुशवाहा के वोट बैंक को कब्जाने के लिए शाह ने रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा के साथ हाथ मिलाया है।

दरअसल भाजपा ने बिहार की राजनीति में कुशवाहा की पैठ को बहुत पहले ही पहचान लिया था। लिहाजा उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार के बीच में तकरार और फिर दरार पैदा हुई तो भाजपा ने उसे लपक लिया। कुमार को इस वोट बैंक के छिटकने का भारी मूल्य चुकाना पड़ सकता है। अभी इससे निपटने के लिए उनकी कोई ठोस रणनीति दिखाई नहीं दी है। कुशवाहा का जहां प्रदेश के कुर्मी और कोइरी जातियों में रुतबा है वहीं उनका दावा है कि भूमिहारों का एक बड़ा वर्ग भी उनके साथ है। यों भाजपा का कहना है कि भूमिहारों में तो उनका वोट बैंक स्वाभाविक ही है। इसके अलावा भाजपा का प्रदेश की सवर्ण जातियों में शुरू से ही प्रभाव रहा है।

प्रदेश में अनुसूचित जातियों व जनजातियों के खाते में 25 फीसद से भी ज्यादा वोट हैं और लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान और हम के जीतन राम मांझी के बूते पर भाजपा ने इन जातियों के वोट हासिल करने की जुगत भिड़ाई है। पासवान तो शुरू से ही नीतीश कुमार के विरोधी रहे हैं जबकि मांझी तो कभी कुमार के ही वफादार थे। मांझी तो कभी इतने बड़े विश्वासपात्र थे कि अपनी गैरहाजिरी में कुमार ने उन्हें ही मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी। यह अलग बात है कि बाद में उन्होंने इसे ही अपनी सबसे बड़ी भूल भी कबूल किया। मांझी के छिटकने का कुमार के राजनीतिक भविष्य पर कितना असर पड़ेगा, यह देखने की बात होगी।

देश की सत्ता पर काबिज पार्टी के लिए एक बड़ी मुश्किल उसके अपने ही काडर ने खड़ी की है। पार्टी इस बार जबर्दस्त फूट का शिकार है जिससे निपटना इतना भी आसान दिखाई नहीं दे रहा। उस पर लालू और नीतीश के मिल जाने से स्थिति बदतर है। कांग्रेस का आलम तो यह है कि उसे लालू यादव के साथ तालमेल बिठाना ही मुश्किल हो रहा है। समूचे देश की तरह यहां भी कांग्रेस में जबर्दस्त विभाजन है। पार्टी के मुट्ठी भर उम्मीदवारों को अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ-साथ अपने साथियों से भी निपटना पड़ रहा है। मौजूदा हालात में तो कांग्रेस एनडीए की कमजोर कड़ी ही जान पड़ती है। रही-सही कसर चुनाव सर्वेक्षणों ने पूरी कर दी है।

बिहार चुनाव के ऐन मौके पर दादरी में हुई अखलाक की मौत ने भी भाजपा के लिए संकट खड़ा किया है। लालू यादव तो खुल कर गोमांस विवाद में कूद पड़े। बिहार में महागठबंधन से बाहर हो चुके समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने दादरी विवाद पर जो रवैया रखा उसका सीधा मकसद भी वोट बैंक पर ही नजर रखना था। भाजपा नेता भी इस विवाद में खुल कर कूद पड़े और मतों का ध्रुवीकरण करने के विरोधियों के प्रयास को अपनी तरफ से भी कट्टर प्रतिक्रिया देकर ही निपटने की कोशिश की।

यह सच है कि बिहार में भाजपा को मारने का विरोधियों के पास प्रभावशाली हथियार है कि पार्टी अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तो बताए। सुशील मोदी ने पिछले एक अरसे से राज्य में अपनी धाक जमाई है लेकिन पार्टी उन्हें प्रचारित करने से बच ही रही है। इसका कितना नफा-नुकसान होगा, यह देखने की बात होगी। अभी तक के हालात में भाजपा यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ रही है। जाहिर है कि राज्य में एक ओर जहां स्थानीय क्षत्रप अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए यह चुनाव प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा से जुड़ता जा रहा है।

अपनी इस चिंता से भाजपा भी बेखबर नहीं, इसलिए पार्टी ने बेशक 50 स्टार प्रचारकों की सूची तैयार की हो। लेकिन, असल में प्रचार की धुरी में नरेंद्र मोदी ही हैं जिनके इर्दगिर्द यह सारा तानाबाना बुना जा रहा है। सुशील मोदी ने प्रदेश में चाहे जो भूमिका निभाई हो और ख्याति अर्जित की हो, लेकिन नीतीश कुमार, लालू यादव और रामविलास पासवान के सामने वे छोटे पड़ते ही दिखाई देते हैं। इसलिए भी भाजपा को उन्हें आगे करने में कोई खास राजनीतिक लाभ दिखाई नहीं देता। बिहार के पैकेज की घोषणा भी मोदी से ही कराई गई और उन्हीं को इसका समूचा श्रेय भी दिया जा रहा है।

बहरहाल, मौजूदा स्थिति यह है कि प्रदेश में चुनाव के लिए राजनीतिक शतरंज बिछ चुकी है और इस खेल के मुख्य खिलाड़ी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। जिस तरह से उन्होंने बिहार के लिए 40-50-60-100 की आवाज देकर और खालिस बोली लगाने के अंदाज से सवा लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज की घोषणा की उससे तय है कि यह चुनाव उनके लिए व्यक्तिगत परीक्षा व प्रतिष्ठा का सवाल है। दिल्ली की पराजय के बाद यह माना जा रहा है कि मोदी का जादू टूट रहा है। अपने विदेश दौरों के कारण वे अंतरराष्टीय मीडिया में चाहे जितनी सुर्खियां बटोर लें लेकिन असल परीक्षा का नतीजा तो बिहार के नतीजों से ही सामने आएगा।

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