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Bihar Polls 2015: राजग के चेहरों पर मोदी का मुखौटा

भाजपा और राजग के नेता नरेंद्र मोदी जब सिलिकॉन की मंडी में खुद को भारत के ब्रांड अंबेसडर की तरह पेश कर रहे थे तो बिहार में लालू प्रसाद यादव उन पर कटाक्ष कर रहे थे कि क्या मोदी अमेरिका से एनआरआइ मुख्यमंत्री लाने के लिए गए हैं। वैसे, लालू का यह कटाक्ष भाजपा की जमीनी हकीकत है।

Author नई दिल्ली | October 10, 2015 2:04 PM
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भाजपा और राजग के नेता नरेंद्र मोदी जब सिलिकॉन की मंडी में खुद को भारत के ब्रांड अंबेसडर की तरह पेश कर रहे थे तो बिहार में लालू प्रसाद यादव उन पर कटाक्ष कर रहे थे कि क्या मोदी अमेरिका से एनआरआइ मुख्यमंत्री लाने के लिए गए हैं। वैसे, लालू का यह कटाक्ष भाजपा की जमीनी हकीकत है। लोकसभा चुनावों के बाद देश में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए वह मोदी के चेहरे पर लड़ा गया। हां, दिल्ली में हार की रपट मिलते ही ब्रांड अंबेसडर के बाजार को बचाने के लिए किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का रेडीमेड उम्मीदवार बनाकर पेश कर दिया गया।

दिल्ली में मोदी के इश्तहार पर आप का झाड़ू लगने के बाद किरण बेदी मन मसोस कर मीडिया से कहती रहीं कि हार की जिम्मेदार मैं हूं। लेकिन यह तेजतर्रार पूर्व आइपीएस अफसर जब अपना चिरपरिचित जुबानी डंडा छोड़ भाजपा का झंडा उठा रही थीं तो राजनीतिक विद्वानों की तो तो छोड़ें आम भाजपाई को भी यकीन हो गया था कि दिल्ली दूर है। हरियाणा, महाराष्ट, झारखंड सभी जगह मोदी के नाम पर वोट मिलने के बाद ही संघ के पिटारे से मुख्यमंत्री का चेहरा निकला।

राजग को कमतर मान रहे लोग बांका में मोदी के बाकपन को देख यह कहने से गुरेज नहीं कर रहे कि मोदी बढ़त ले आएंगे। बांका से मोदी ने बिहार के लिए विकासवाद का लुभावना नारा दिया है। राजग के अन्य चेहरों को देखें तो कोई भी दूर-दूर तक राजग के मुख्यमंत्री पद का समावेशी चेहरा नहीं दिखता है। इसलिए 40 से ज्यादा रैलियां कर प्रचार की कमान मोदी ही संभालेंगे।

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पैकेज वार के निशाने

सवाल सत्ता का है, इसलिए बिहार का चेहरा बदल देने के दावों की होड़ है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के लिए सवा लाख करोड़ रुपए के विशेष पैकेज की घोषणा की तो सुशील कुमार मोदी ने दावा किया कि इससे राज्य का चेहरा बदल जाएगा। लेकिन अगले कुछ दिनों में जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिख कर बताया कि विशेष पैकेज दरअसल लोगों को भ्रमित करने की कोशिश है तो सुशील कुमार मोदी ने इसे पैकेज के खिलाफ ‘लेटर वार’ चलाने का आरोप लगाया।

लेकिन यहां दोनों तरफ मसला जितना राज्य के विकास का है, उससे ज्यादा अगली बार सत्ता पर कब्जे की होड़ का। इसलिए जनता को भ्रमित करने का मुद्दा पीछे चला गया। इसके जवाब में नीतीश कुमार ने भी अगले पांच साल के लिए दो करोड़ सत्तर लाख करोड़ रुपए की राज्य में विकास योजनाओं की घोषणा कर दी। अब देखना यह है कि दोनों पैकेजों को मिला कर राज्य को जितना बड़ा तोहफा मिला है, वह चुनाव के बाद राज्य की सूरत को कितना चमका पाता है। जाहिर है, इस पैकेज वार के निशाने पर मौजूदा चुनाव में किसी तरह जीत हासिल करना है, लेकिन तय है कि नतीजों के बाद इसका ठीकरा एक बार फिर सत्ता की कमान संभालने वाली पार्टी के सिर फूटेगा, राज्य के लोगों को कितना और क्या देखने को मिलेगा, यह वक्त बताएगा…!

 

चुनावी जमीन पर नहीं उतरे 

आसमान के सितारे

इस बार बिहार के चुनावी मैदान की खास बात यह है कि प्रचार के सभी प्रमुख चेहरे अपने लिए सीधे वोट नहीं मांग रहे। राजग के हर चेहरे पर नरेंद्र मोदी का मुखौटा है, और जाहिर है कि मोदी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे और ना ही वे सूबे के मुखिया की कुर्सी संभालेंगे। महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार और मौजूदा समय में विधान परिषद के सदस्य नीतीश कुमार भी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे।

वहीं चारा घोटाले में दोषी करार लालू यादव खुद चुनाव नहीं लड़ सकते, लेकिन वे अपने दोनों बेटों का राजनीतिक भविष्य तय करने के लिए पूरे दम-खम से मैदान में हैं। यही हाल राजग खेमे का भी है। बिहार में राजग का प्रमुख चेहरा सुशील कुमार मोदी जनता से सीधी टक्कर लेने से बचते ही रहे हैं और खुद को विधान परिषद में ही महफूज महसूस करते हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे भी चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। लोजपा सुप्रीमो पासवान और उनके चिराग भी लोकसभा सांसद हैं और वे विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। वहीं रालोसपा के नेता उपेंद्र कुशवाहा का नाम गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उछाला जा रहा है, लेकिन वे बतौर केंद्रीय मंत्री बिहार के मैदान से दूर हैं।

मैदान में मुग्ध मांझी

बिहार के मैदान में इस बार एक हीरोनुमा ऐसा नेता भी है जो अपनी पार्टी का सुप्रीमो होने के साथ चुनावी मैदान में उतरा है और ताल ठोक कर खुद को मुख्यमंत्री का दावेदार बता रहा है। खास बात यह है कि मांझी दो जगहों से चुनाव लड़ रहे हैं। गया के इमामगंज इलाके में सात अक्तूबर को मांझी की रैली में जुटी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ रही थी।

मांझी ने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को और सीटें देनी चाहिए थीं क्योंकि हर जगह लोग उन्हें देखना चाहते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर उनकी पार्टी को 40 सीटें दी जातीं तो पार्टी 35 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज करती। उन्होंने कहा कि यह समय ही बताएगा कि उनकी पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) को मात्र 21 सीट देने के फैसले पर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को पछतावा होगा या नहीं।

मांझी ने दावा किया कि गरीब लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख राम विलास पासवान ने उनसे अनुरोध किया कि वे अलौली में टेलीफोन के माध्यम से एक चुनावी सभा को संबोधित करें। अलौली से पासवान के भाई और लोजपा के प्रदेशाध्यक्ष पशुपति पारस चुनाव लड़ रहे हैं। आत्मविश्वास से लबरेज मांझी ने कहा, मेरा प्रदर्शन (चुनावों में) भाजपा समेत अन्य सभी दलों से बेहतर रहेगा।

भाजपा को कुछ और सीटें देनी चाहिए थीं। लेकिन मैंने उनके इस (21 सीटों) प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया क्योंकि मैं पहले ही उन्हें बिना शर्त समर्थन देने की बात कह चुका था। मेरी एक ‘अपील’ है। उनके खुद के नेता कह रहे हैं कि यदि मैं सभी 243 सीटों पर चला जाऊं और सिर्फ अपना चेहरा दिखा दूं तो उन्हें चुनाव में फायदा मिलेगा। तो मैं उनसे पूछता हूं कि सीटें देते वक्त आपने इस बारे में क्यों नहीं सोचा और आज मुझे परेशान कर रहे हैं। आखिर मुझे अपनी पार्टी और सभी घटक दलों के लिए भी प्रचार करना है। लोग हर जगह मेरा चेहरा देखना चाहते हैं। बड़े नेता आ रहे हैं, तो अभिनेता भी आ रहे हैं। जहां तक मेरा विचार है गरीब लोगों के बीच मेरी मांग ज्यादा है और इस बात को वे (भाजपा एवं घटक) दल भी समझते हैं’।

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