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बिहार: 17 साल की लड़ाई के बाद भी नहीं मिला बकाया पैसा, एडमिशन न होने से बेटा दे चुका है जान; जूझ रहा परिवार

चंदन भट्टाचार्य ग्रेजुएशन के दूसरे वर्ष की फीस नहीं जमा कर सका था। 2002 में पटना हाईकोर्ट कैंपस में खुद को आग लगा ली थी। चार दिन तक जीवन और मौत से जूझने के बाद उसने दम तोड़ दिया था। 

पटना हाईकोर्ट (फाइल फोटो)

बिहार के पटना में 17 साल से संघर्ष कर रहा एक परिवार दो लोगों को खोने के बाद भी बकाया वेतन नहीं पा सका है। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट से पक्ष में फैसला आने के बाद भी अभी तक उसको पैसा नहीं मिल सका। इससे घर चलाना भी मुश्किल हो गया है। 9 साल से पिता की सेलरी नहीं मिलने से एक छात्र ग्रेजुएशन के दूसरे वर्ष में प्रवेश नहीं ले पाया तो आग लगाकर जान दे दी थी।

फीस नहीं होने से परेशान था बेटा : बिहार स्टेट एग्रो इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (जो अब बंद हो चुका है) में काम करने वाले पारिजात भट्टाचार्य को 9 वर्ष से सेलरी नहीं मिली थी। इससे उनका 22 साल का बेटा चंदन भट्टाचार्य ग्रेजुएशन के दूसरे वर्ष की फीस नहीं जमा कर सका था। परेशान होकर उसने 15 अगस्त 2002 को पटना हाईकोर्ट कैंपस में खुद को आग लगा ली थी। चार दिन तक जीवन और मौत से जूझने के बाद पटना मेडिकल कॉलेज में उसने दम तोड़ दिया था। 2005 में पिता पारिजात की भी कैंसर से मृत्यु हो गई।

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इंडियन एक्सप्रेस ने उठाया था मामला : इस मामले में इंडियन एक्सप्रेस के कई बार खबरें प्रकाशित करने के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता कपिला हिंगोरानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की थी। कोर्ट ने फरवरी 2003 में आदेश जारी कर बिहार और झारखंड के विभिन्न हिस्सों में काम करने वाले 35 हजार कर्मचारियों को अंतरिम पेमेंट करने को कहा। 2017 में हिंगोरानी की बेटी प्रिया हिंगोरानी, जो स्वयं एक अधिवक्ता हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में एक ताज़ा आवेदन दायर किया था। इसमें बिहार कृषि निगम के 753 कर्मचारियों के लिए बकाया वेतन के अंतिम निपटान की मांग की गई थी। मई 2018 में अदालत ने बिहार सरकार को इन कर्मचारियों को पूर्ण भुगतान करने का आदेश दिया था। 11 दिसंबर 2019 को राज्य सरकार ने वेतन देने के लिए कृषि विभाग को 126 करोड़ रुपए आवंटित किए।

परिवार सीएम और मंत्रियों से लगा चुका है गुहार : पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे चंदन के छोटे भाई अमर इस मामले की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “इतने वर्षों से मैं एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय का चक्कर लगा रहा हूं। मेरे भाई पिता की गरीबी की वजह से खुद को मार डाला। मैं पिछले वर्षों में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और कृषि मंत्री से मिला हूं। अब जब अंत में आवंटन किया गया, तो मेरे पिता के बकाया राशि को मंजूरी नहीं दी जा रही है।”

गरीबी से पूरा परिवार परेशान : अमर अब कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में काम करके किसी तरह घर चला रहा है। उसने बताया कि इस मामले में देरी से पूरा परिवार बर्बाद हो गया। “मेरी 40 वर्षीय बहन प्रतिमा आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण शादी नहीं कर सकी। उसे अनुकंपा के आधार पर भी नौकरी नहीं मिली। हमारे संघर्ष का सबसे बुरा हिस्सा सिस्टम की उदासीनता और असंवेदनशीलता रहा। मेरे पिता की मेहनत की कमाई नहीं मिलने से वह स्वयं भी इस दुनिया से चले गए।”

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