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बजट सत्र: संसद में तीन तलाक कानून का विरोध करेगी नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू

कुछ दिनों पहले भी नीतीश कुमार ने खुले आम तीन तलाक बिल का विरोध किया था। इसके अलावा नीतीश ने यह भी साफ किया था कि उनकी पार्टी अनुच्छेद 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता लागू करने और अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए खुले तौर पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत या कोर्ट के फैसले के जरिए समाधान चाहती है।

Author पटना | June 13, 2019 6:32 PM
बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान। (पीटीआई फोटो)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता वाली पार्टी और एनडीए की सहयोगी जेडीयू ने संसद के आगामी बजट सत्र में तीन तलाक पर लाए जाने वाले बिल का विरोध करने का फैसला किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और नीतीश सरकार में हाल ही मंत्री बनाए गए श्याम रजक ने समाचार एजेंसी आईएनएस से कहा कि उनकी पार्टी तीन तलाक के खिलाफ कानून का विरोध करती रही है और आगे भी उनकी पार्टी का यही रुख कायम रहेगा। रजक ने कहा कि तीन तलाक का मुद्दा एक सामाजिक मुद्दा है और इसे उस समाज के लोगो द्वारा ही सुलझाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जेडीयू ने पहले भी तीन तलाक के खिलाफ लाए गए बिल का राज्यसभा में विरोध किया था।

बता दें कि कुछ दिनों पहले भी नीतीश कुमार ने खुले आम तीन तलाक बिल का विरोध किया था। इसके अलावा नीतीश ने यह भी साफ किया था कि उनकी पार्टी अनुच्छेद 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता लागू करने और अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए खुले तौर पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत या कोर्ट के फैसले के जरिए समाधान चाहती है। नीतीश जानते हैं कि राज्य सभा में सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है जिससे कि वह इस विधेयक को सदन सेपास करा सके। वहीं जेडीयू के कुल छह राज्य सभा सांसद हैं। दरअसल, नीतीश ऐसा कर न केवल मुस्लिमों के हितैषी बने रहना चाहते हैं बल्कि वो स्पष्ट संदेश भी जेना चाहते हैं कि बीजेपी की प्रचंड जीत के बावजूद उनका नजरिया नहीं बदला है।

केन्द्रीय कैबिनेट ने ‘तीन तलाक’ (तलाक-ए-बिद्दत) की प्रथा पर पाबंदी लगाने के लिए एक दिन पहले ही बुधवार (12 जून) को ही नए विधेयक को मंजूरी दी। यह विधेयक सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र में पेश किया जाएगा और यह पूर्ववर्ती भाजपा नीत राजग सरकार द्वारा फरवरी में जारी एक अध्यादेश का स्थान लेगा। पिछले महीने 16वीं लोकसभा के भंग होने के बाद पिछला विधेयक निष्प्रभावी हो गया था क्योंकि यह राज्यसभा में लंबित था। दरअसल, लोकसभा में किसी विधेयक के पारित हो जाने और राज्यसभा में उसके लंबित रहने की स्थिति में निचले सदन (लोकसभा) के भंग होने पर वह विधेयक निष्प्रभावी हो जाता है।

गौरतलब है कि मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) विधेयक को विपक्षी दलों के विरोध का सामना करना पड़ा था। वह विधेयक तलाक ए बिद्दत की प्रथा को दंडनीय अपराध बनाता था। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बिल पर कहा कि प्रस्तावित विधेयक लैंगिक समानता पर आधारित है और यह सरकार के दर्शन- सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास- का हिस्सा है। नया विधेयक अभी लागू अध्यादेश की प्रति (कॉपी) होगा। मंत्री ने आशा जताई कि राज्यसभा (जहां सरकार के पास जरूरी संख्या बल नहीं है) द्वारा इसे आमराय से पारित कर दिया जाएगा।

सरकार ने सितंबर 2018 और फरवरी 2019 में दो बार तीन तलाक अध्यादेश जारी किया था। इसका कारण यह है कि लोकसभा में इस विवादास्पद विधेयक के पारित होने के बाद वह राज्यसभा में लंबित रहा था। मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अध्यादेश, 2019 के तहत तीन तलाक के तहत तलाक अवैध, अमान्य है और पति को इसके लिए तीन साल की कैद की सजा होगी। सत्रहवीं लोकसभा के प्रथम सत्र में नयी सरकार की योजना तीन तलाक की प्रथा पर पाबंदी लगाने सहित 10 अध्यादेशों को कानून में तब्दील करने की है। दरअसल, इन अध्यादेशों को सत्र के शुरू होने के 45 दिनों के अंदर कानून में तब्दील करना है अन्यथा वे निष्प्रभावी हो जाएंगी।

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