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चुनावी दंगल: जातिगत समीकरण से चढ़ा सियासी रंग

जातिगत समीकरण के लिहाज से बिहार की एक चौथाई सीटों पर अपनों के बीच महासमर है। 70 सीटों पर एक ही जाति के प्रत्याशी आमने-सामने हैं। सबसे ज्यादा यादव प्रत्याशी आपस में घमासान करेंगे।

bihar electionबिहार के चुनाव के लिए मतदान के दिन जैसे-जैसे पास आ रहे हैं, सियासी गतिविधियां का दौर भी तेज होता जा रहा है।

बिहार विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के चार गठबंधन मैदान में हैं। हालांकि, मुख्य मुकाबला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई वाले सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और राजद नेता तेजस्वी यादव की अगुआई वाले विपक्षी महागठबंधन के बीच है। राजनीतिक दलों ने विभिन्न इलाकों और क्षेत्रों में जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर गठबंधन का स्वरूप तय किया है।

तेजस्वी यादव जहां पिता लालू यादव के पारंपरिक वोट बैंक- ‘माय’ (मुसलिम-यादव) के अलावा नीतीश कुमार के ‘ईबीसी’ (अति पिछड़ी जातियों) में सेंधमारी कर नए सामाजिक समीकरण गढ़ने की कोशिश में हैं। दूसरी ओर, नीतीश कुमार राजद के ‘माय’ समीकरण में सेंधमारी की कोशिश में जुटे हैं। तेजस्वी की कोशिश है कि वह माय के अलावा नया वोट बैंक तैयार करें, जिसमें भाजपा के भी मतदाताओं में से कुछ को तोड़ा जा सके। इसके लिए उन्होंने युवाओं के भविष्य और रोजगार की बातें उठानी शुरू कर दी हैं। राजद ने कुल 144 सीटों में से 24 सीटों पर अति पिछड़ी जाति (ईबीसी) और एक दर्जन सीटों पर सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिया है।

पिछले चुनावों में राजद ने ईबीसी को चार और सवर्णों में दो उम्मीदवारों को ही टिकट दिया था। 30 महिलाओं के अलावा राजद ने अपने पारंपरिक वोट बैंक के दो वर्गों, यादवों और मुसलिमों को क्रमश: 58 और 17 टिकट दिए हैं। बिहार में कुशवाहा और कुर्मी पर नीतीश कुमार का प्रभाव माना जाता है। हालांकि, रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा प्रभाव का दावा करते हैं। अति पिछड़ी जाति के मतदाता पिछले चुनाव में अलग-अलग दलों को वोट करते रहे हैं, लेकिन 2005 के बाद से इनका बड़ा हिस्सा नीतीश के साथ रहा है। अब तेजस्वी इसे तोड़ने की कोशिश में जुटे हैं।

पासवान को छोड़कर अधिकांश महादलित जातियों का झुकाव 2010 के बाद से जद (एकी) की तरफ रहा। भाजपा ने सवर्णों पर ध्यान लगा रखा है। इस बार पहली बार राजद ने ज्यादा संख्या में सवर्णों को टिकट दिया है। हालांकि, जद (एकी) ने भी 10 भूमिहार, सात राजपूत और दो ब्राह्मणों को टिकट दिया है। उधर, भाजपा भी ईबीसी और यादवों को अधिक टिकट देकर रिझाने की कोशिशों में जुटी है।

जातिगत समीकरण के लिहाज से बिहार की एक चौथाई सीटों पर अपनों के बीच महासमर है। 70 सीटों पर एक ही जाति के प्रत्याशी आमने-सामने हैं। सबसे ज्यादा यादव प्रत्याशी आपस में घमासान करेंगे। बड़ी संख्या में राजपूत और भूमिहार प्रत्याशियों में भी आपसी संघर्ष होगा। सीमांचल की कई सीटों पर मुसलमान भी आपस में ही भिड़ेंगे। जाति बनाम जाति की लड़ाई वाली सबसे ज्यादा सीटें प्रथम चरण में हैं। ऐसी सीटों की संख्या 26 है, जबकि दूसरे चरण में 25 है।

यादव बनाम यादव का संघर्ष 23 सीटों पर है। राघोपुर में राजद के प्रत्याशी के रूप में तेजस्वी यादव हैं। जबकि, भाजपा ने इनके मुकाबले सतीश कुमार को उतारा है। यह वही सतीश हैं, जिन्होंने 2010 के विधानसभा चुनाव में राबड़ी देवी को हराया था। तब सतीश जद (एकी) से थे। हालांकि 2015 के चुनाव में तेजस्वी यादव ने इन्हें हरा दिया था।

सतीश पहले राजद के ही कार्यकर्ता और चुनावों में राबड़ी देवी के सहयोगी हुआ करते थे। हसनपुर से राजद के टिकट पर विधायक तेजप्रताप यादव ने पहली बार मोर्चा संभाला है। दूसरी तरफ हैं जद (एकी) के राजकुमार राय। 1967 के बाद से इस क्षेत्र से दूसरी जाति का कोई उम्मीदवार नहीं जीत सका है। मधेपुरा से जद (एकी) ने अपने प्रवक्ता एवं मंडल आयोग के मसीहा वीपी मंडल के पोते निखिल मंडल को उतारा है। उनके सामने हैं राजद के चंद्रशेखर। परसा में जद (एकी) ने लालू के समधी चंद्रिका राय को उतारा है। उनके मुकाबले के लिए राजद ने छोटेलाल राय पर दांव लगाया है।

भूमिहार बनाम भूमिहार की स्थिति 13 सीटों पर है। मोकामा में राजद ने बाहुबली अनंत सिंह को टिकट थमा कर लड़ाई को खास बना दिया है। राजपूत बनाम राजपूत की स्थिति छह सीटों पर है। सीमांचल की चार सीटों पर मुसलिम बनाम मुसलिम संघर्ष होना है। पासवान प्रत्याशी भी पांच सीटों पर स्वजातीयों से ही टकराएंगे। ब्राह्मणों का आपसी संघर्ष पांच सीटों पर है।

नेताओं के बोल
“यदि बिहार में फिर अपहरण, सामूहिक नरसंहार चाहते हैं तो ही हमें वोट मत दीजिएगा। अगर फिर से बिहार से बाहर जाना चाहते हों, तभी हमें वोट मत देना। अगर बिहार में अमन-चैन चाहते हैं तो एनडीए उम्मीदवार को वोट दीजिए। अगर फिर से वो लोग सत्ता में आएंगे तो अपहरण का उद्योग लगेगा।”
नीतीश कुमार, डुमरांव की एक चुनावी सभा में

नीतीश कुमार का पहला और आखिरी प्यार केवल अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिके रहना है। वह बेरोजगारी कैसे खत्म करेंगे? वह पलायन, गरीबी, भुखमरी पर क्यों नहीं बोलते? युवाओं को पता है कि अगर एनडीए की हार नहीं हुई, तो बेरोजगार लोगों के लिए ऐसी बेकार सरकार कुछ नहीं करेगी।
– तेजस्वी यादव, राजद नेता, पटना की एक सभा में

मतदाताओं का गुणा-भाग
1- सवर्ण मतदाता 15 फीसद है।
– बिहार में 26 फीसद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और 26 फीसद ईबीसी मतदाता हैं।
2- ओबीसी में 14 फीसद यादव, आठ फीसद कुशवाहा और चार फीसद कुर्मी मतदाता हैं।
3- 16 फीसद वोट मुसलमानों के हैं।
– अति पिछड़े 26 फीसद हैं, जिसमें लोहार, कहार, सुनार, कुम्हार, ततवा, बढ़ई, केवट, मलाह, धानुक, माली, नोनी आदि जातियां आती हैं।
4- दलित मतदाता 16 फीसद हैं। इनमें पांच फीसद पासवान हैं। बाकी महादलित जातियों (पासी, रविदास, धोबी, चमार, राजवंशी, मुसहर, डोम आदि) का है।

क्या है जातीय गणित
नीतीश कुमार की पार्टी जद (एकीकृत) के लिए 2005 और 2010 के चुनावों से ही ईबीसी और महादलित पारंपरिक वोट बैंक रहे हैं। जद (एकी) ने इस बार 19 ईबीसी, 15 कुशवाहा और 12 कुर्मी उम्मीदवारों को टिकट दिया है। नीतीश कुमार ने 17 अनुसूचित जाति के लोगों को भी चुनावी टिकट दिया हैं। जद (एकी) ने 11 मुसलिमों और 18 यादवों को टिकट देकर माय समीकरण में घुसपैठ की कोशिश की है।

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