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सत्ता समर: चुनावी दंगल में वही पुराने दांव-पेच

सभी दल चुनाव प्रचार में तरह-तरह के दावे कर रहे हैं। बिहार को सबसे आगे तेज आने के दावों के अलावा युवाओं को रोजगार देने, उद्योग धंधे लगाने, कानून व्यवस्था में सुधार करने की बजाय प्रभाव वाली जातियों के हिसाब और स्थानीय स्तर पर उसी हिसाब से जोड़-तोड़ के आधार पर चुनाव हो रहे हैं। कहने के लिए जो कहा जाए लेकिन चुनाव तो वहीं पहुंच रहा है जहां सालों से बिहार के चुनावों की पहुंचने की नियति रही है।

Bihar Electionपटना की एक सभी मे बोलते सीएम नीतीश कुमार।

मनोज कुमार मिश्र

बिहार विधानसभा चुनाव के दंगल में सभी राजनीतिक दलों में अपने दिग्गज उतार दिए हैं। 28 अक्तूबर से 3 चरणों में होने वाले 243 सीटों के चुनाव नतीजे 10 नवंबर को आएंगे। राजग अपने काम के आधार पर सरकार फिर से बनाने के प्रयास में लगा है। मुख्य विपक्षी राजद (राष्ट्रीय जनता दल) कांग्रेस और वामदलों के साथ फिर से महागठबंधन बनाकर सत्ता पाने के प्रयास में लगा हुआ है। इन दोनों गठबंधनों के अलावा कई और गठबंधन चुनाव मैदान में हैं। सभी बिहार के विकास को मुद्दा बनाने का दावा कर रहे हैं लेकिन वास्तव में चुनाव तो जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दों पर ही लड़ा जाता दिख रहा है।

इस चुनाव में बिहार में नए राजनीतिक समीकरण बने हैं और चुनाव के बाद उसमें भी बदलाव की चर्चा है। पिछले महागठबंधन में शामिल जनता दल (एकी) ने सरकार बनने के बाद महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ सरकार बना लिया। इसे विपक्षी दलों ने भाजपा और जनता दल के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाया था। इस बार इस गठबंधन का विरोध करने वाले यह भी कह रहे हैं कि भाजपा पर ही कुछ नेताओं ने इशारे पर राजग के सहयोगी लोजपा (लोक जनशक्ति पार्टी) के नेता चिराग पासवान अलग से चुनाव लड़ कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निशाना बना रहे हैं। इस बारे में भाजपा के नेता हर स्तर पर सफाई दे रहे हैं।

बिहार चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर सभा को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साझा करने वाले हैं। भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर, रविशंकर प्रसाद से लेकर बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी तक ने चिराग पासवान की आलोचना और नीतीश कुमार को फिर से राजद का मुख्यमंत्री बनाने का दावा किया है।

इस चुनाव में भाजपा को समझौते में मिली 121 सीटों में से उसने 11 सीटें मुकेश साहनी की वीआइपी को दे दी। उसी तरह जनता दल ने अपने हिस्से की 122 सीटों में से 60 सीटें हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (हम) को दे दीं। वीआइपी पहले महागठबंधन में थी लेकिन समझौता ना होने का आरोप लगाकर उसके नेता मुकेश साहनी उसे अलग हो गए। बाद में भाजपा ने 11 सीटें उन्हें दी।

लोजपा पिछले चुनाव में 42 सीटें लड़कर केवल 2 सीटें जीत पाई थी। राजद और महागठबंधन के अलावा पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने डेमोक्रेटिक सेकुलर रिलायंस, पूर्व सांसद पप्पू यादव ने प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन बनाया है। बिहार उन राज्यों में शामिल है, जहां हर चुनाव में मुद्दे तो कई उठते रहे हैं लेकिन सारा चुनाव जाति के हिसाब से होता है। इसी का परिणाम हुआ कि सालों बिहार पर राज करने वाली कांग्रेस को आज राजद का सहयोगी बनकर चुनाव लड़ना पड़ रहा है। जातिगत राजनीति के बूते लंबे समय तक लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी और बाद में नीतीश कुमार और भाजपा गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब हो पाए।

नीतीश कुमार ने इस बार भाजपा के साथ सरकार बनाने पर कड़ाई से शराबबंदी को लागू किया। हर गांव को सड़क से जोड़ने और हर गांव में बिजली पहुंचाने का काम कराने के अलावा अनेक पुरानी परियोजनाओं को पूरा कराया। बिहार देश के पिछड़े राज्यों में शामिल है और मजदूरों से लेकर हर वर्ग के लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन होना आज भी जारी है। नए उद्योग कुछ शुरू तो हुए लेकिन उनकी संख्या इतनी नहीं है कि बिहार के लोगों को अपने राज्य में रोजगार मिल जाए।

शराबबंदी को एक वर्ग खास मसलन महिलाओं से बड़ा समर्थन मिला। इससे पहले स्कूल जाने वाली बच्चियों को साइकिल देने की योजना की भी की खूब सराहना की गई लेकिन शराबबंदी से होने वाले राजस्व के नुकसान की भरपाई अभी भी एक समस्या बनी हुई है। कोरोना विषाणु में बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविकता उजागर किया है। इसे भले सरकार न स्वीकारे लेकिन बिहार की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ध्वस्त जैसी हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार के लिए बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है। रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की चुनौती अपने आप में महत्त्वपूर्ण है।

सालों बाद बिहार के चुनाव में दो बड़े चेहरे नहीं दिख रहे हैं। लोजपा नेता रामविलास पासवान का निधन पिछले दिनों हुआ और लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में मंत्री रहे लालू यादव जेल में बंद होने के कारण चुनाव प्रचार से दूर हैं। उनकी पार्टी के एक और बड़े नेता रघुवंश प्रसाद सिंह का भी पिछले दिनों निधन हुआ।

वामपंथी दल सालों बिहार में कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर की पार्टी होते थे। वे पिछले कई चुनावों से हाशिए पर जा रहे हैं। इस चुनाव में भी वामदल गिनती के सीटों पर चुनाव लड़ रहा है। सभी दल चुनाव प्रचार में तरह-तरह के दावे कर रहे हैं। बिहार को सबसे आगे तेज आने के दावों के अलावा युवाओं को रोजगार देने, उद्योग धंधे लगाने, कानून व्यवस्था में सुधार करने की बजाय प्रभाव वाली जातियों के हिसाब और स्थानीय स्तर पर उसी हिसाब से जोड़-तोड़ के आधार पर चुनाव हो रहे हैं। कहने के लिए जो कहा जाए लेकिन चुनाव तो वहीं पहुंच रहा है जहां सालों से बिहार के चुनावों की पहुंचने की नियति रही है।

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