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‘कांग्रेस को प्रासंगिक बनाए रखना राहुल के लिए सबसे बड़ी चुनौती’

कांग्रेस को प्रासंगिक बनाए रखना, उसमें फिर से प्राण फूंकना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। संगठन मजबूत होना इसलिए जरूरी है क्योंकि उसी से लोगों के असंतोष को वोट में तब्दील किया जा सकता है।

Author नई दिल्ली | December 4, 2017 2:56 AM
Rahul Gandhi in US Berkeley University: कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी

अगले कुछ दिनों में राहुल गांधी की ओर से कांग्रेस की कमान संभालना लगभग तय माने जाने के बीच राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को भारतीय राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखना है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल की ओर से संगठन को मजबूती देने और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों पर वैचारिक दुविधा को दूर किए बिना वह न तो मतदाताओं के असंतोष को वोट में तब्दील कर पाएंगे और न ही विपक्षी एकता को परवान चढ़ा पाएंगे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेश पंत ने कहा, ‘राहुल गांधी के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अपने को एक विश्वसनीय नेता के रूप में साबित करने की है जिसमें वह पिछले 15 सालों से विफल रहे हैं।’ वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने, ‘राहुल के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि पार्टी के चुनावी परिणामों में लगातार जो गिरावट आ रही है, उसे कैसे थामा जाए? साथ ही उनके सामने ऐसी बड़ी शख्सियत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं जो एक करिश्माई नेता हैं व प्रभावशाली वक्ता हैं।’

उन्होंने कहा कि आप यदि गुजरात जाएं तो देखेंगे कि भाजपा को लेकर लोगों में असंतोष तो है किंतु मोदी को लेकर नहीं है। ऐसे में कांग्रेस को प्रासंगिक बनाए रखना, उसमें फिर से प्राण फूंकना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। संगठन मजबूत होना इसलिए जरूरी है क्योंकि उसी से लोगों के असंतोष को वोट में तब्दील किया जा सकता है। नीरजा का मानना है कि राहुल की असली चुनौती गुजरात ही नहीं है। अगले साल कर्नाटक और हिन्दी भाषी तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने वाले हैं। नीरजा का मानना है कि कांग्रेस को एक ही सूरत में मजबूत स्थिति प्राप्त हो सकती है जब हर लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ विपक्ष का एक ही उम्मीदवार खड़ा हो। इस बार भाजपा को 31 प्रतिशत वोट ही मिले हैं। 69 प्रतिशत तो विपक्ष को ही गए किन्तु वे सब बंट गए। जब भी विपक्ष एकजुट रहा तो भाजपा को चुनौती मिली है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल की तुलना को राजनीतिक टिप्पणीकार व वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई सही नहीं मानते हैं। उनके अनुसार एक ही परिवार में भी दो व्यक्तियों के काम करने का ढंग अलग-अलग होता है। कांग्रेस का यदि इतिहास देखा जाए तो संगठन के भीतर नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य विफल नहीं हुआ है। राहुल के समक्ष यही चुनौती है कि वह खुद को साबित करें और वह भी बहुत जल्दी। सोनिया गांधी की जीवनी लिख चुके किदवई कहते हैं, ‘कांग्रेस के समक्ष एक और बड़ी चुनौती है कि उसके पास विचाराधारा के मामले में कोई स्पष्टता नहीं है। मिसाल के तौर पर धर्मनिरपेक्षता को लें। महात्मा गांधी व नेहरू ने इस मामले में दो अलग-अलग रास्ते दिखाए थे। एक का कहना था कि धर्म आस्था का विषय है और सरकार का इसमें घालमेल नहीं होना चाहिए। दूसरे मत का कहना था कि यदि हम अच्छे हिन्दू या अच्छे मुस्लिम हैं तभी हम सच्चे धर्मनिरपेक्ष हो सकते हैं। आर्थिक मुद्दों पर भी एक राय नहीं है। किसानों के मामले देखिए।

राजनीतिक विश्लेषक मोहन गुरुस्वामी ने बताया कि संगठन के भीतर राहुल की स्वीकार्यता को लेकर कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। भाजपा के एक के बाद एक कई राज्यों में जीतने के बावजूद गुरुस्वामी मानते हैं कि राजनीति में कांग्रेस के लिए ‘स्पेस’ की कमी नहीं है। किंतु उसे भरने के लिए कांग्रेस को अपने संगठन स्तर पर तैयारी करनी होगी और उसे मजबूती देनी होगी। राहुल के पास अपने संगठन को अंदर से मजबूत करने के अलावा कोई और चारा नहीं है। पार्टी के अंदर मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए विभिन्न प्लेटफार्म होने चाहिएं, पार्टी कार्यकारिणी की हर 15 दिन में बैठक होनी चाहिए। जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ना चाहिए।

कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का कार्यक्रम
– कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अधिसूचना जारी की जा चुकी है। चार दिसंबर को नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तिथि है। पांच दिसंबर को नामांकन-पत्रों की जांच होगी और मान्य नामांकन-पत्रों की सूची प्रकाशित होगी। 11 दिसंबर को चुनाव लड़ने जा रहे उम्मीदवारों की सूची जारी की जाएगी। 16 दिसंबर को जरूरत पड़ने पर कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए मतदान होगा और 19 दिसंबर को परिणाम घोषित किए जाएंगे। यदि राहुल के अलावा कोई और नामांकन-पत्र दाखिल नहीं करता है तो पांच दिसंबर को ही कांग्रेस उपाध्यक्ष की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी सुनिश्चित हो जाएगी।

 

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