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कृषि लोन के नाम पर बड़ा ‘खेल’? 615 खातों में गए 59 हजार करोड़, यानी एक किसान को 95 करोड़!

सूत्र बताते हैं कि आरबीआई के आंकड़ों से साफ है कि ये कृषि कर्ज किसानों के खातों में नहीं बल्कि एग्रो बिजनेस कंपनियों के खाते में गई हैं।

एक तरफ जहां पाटीदार नेता हार्दिक पटेल किसान कर्ज माफी के लिए पिछले 13 दिनों से अनशन पर हैं तो दूसरी तरफ भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सूचना का अधिकार के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिजर्व बैंक के मुताबिक नरेंद्र मोदी की सरकार में सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने साल 2016 में कुल 615 खातों में कुल 58 हजार 561 करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर लोन ट्रांसफर किया है। यानी औसतन हरेक खाताधारक को लगभग 95 करोड़ रुपये का कृषि लोन मिला है। बता दें कि कृषि लोन अन्य लोन के मुकाबले बहुत कम ब्याज दर पर किसानों को दिया जाता है ताकि वो खेतीबारी कर सकें। इसके अलावा इस लोन में कुछ पूर्व निर्धारित शर्तें भी होती हैं। फिलहाल किसानों को 4 फीसदी ब्याज पर कृषि लोन मुहैया कराया जा रहा है।

जानकार सूत्र बताते हैं कि आरबीआई के आंकड़ों से साफ है कि ये कृषि कर्ज किसानों के खातों में नहीं बल्कि एग्रो बिजनेस कंपनियों के खाते में गई हैं। ‘द वायर’ से बातचीत में कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने कहा कि किसानों के नाम पर बड़ी-बड़ी एग्रो कंपनियां लोन ले रही हैं। उन्होंने कहा, “ये कहां के किसान हैं जिन्हें 100 करोड़ के लोन दिए जा रहे हैं। ये सारा दिखावा है। हकीकत में किसानों के नाम पर एग्रो इंडस्ट्री को लोन दिया जा रहा है।” बता दें कि मोदी सरकार ने साल 2014-15 में 8.5 लाख करोड़ का कृषि लोन देने का लक्ष्य निर्धारित किया था। इसे साल 2018-19 के लिए बढ़ाकर 11 लाख करोड़ कर दिया गया है।

आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि साल 2016 से पहले भी कृषि लोन के नाम पर बड़ी मात्रा में लोगों को कर्ज दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में मात्र 604 खातों में 52 हजार 143 करोड़ का लोन दिया गया जो कि हरेक खाते में 86.33 करोड़ रुपये हुआ। मोदी सरकार से पहले यूपीए सरकार में भी यही सिलसिला जारी था। साल 2014 में भी 659 खातों में 91.28 करोड़ के हिसाब से कुल 60 हजार 156 करोड़ रुपये का कृषि लोन दिया गया। आंकड़े बताते हैं कि यह खेल पुराना है जो साल दर साल बढ़ता जा रहा है। साल 2007 में जहां कुल 464 किसानों को प्रति खाते 74.7 करोड़ रुपये का कुल 43 हजार 664 करोड़ रुपये का कृषि लोन बांटा गया था जो नौ साल बाद 2016 में बढ़कर प्रति किसान 95.2 करोड़ और कुल रकम करीब 59000 करोड़ हो गया। यानी औसतन हर साल करीब डेढ़ हजार करोड़ का लोन बढ़ता गया जबकि देश में किसानों की दशा सुधरती हुई नहीं दिख रही है।

दरअसल, कृषि लोन के तहत तीन सब कैटगरी यानी कृषि ऋण, कृषि बुनियादी ढांचे और सहायक गतिविधियां के लिए लोन देने का प्रावधान है। बुनियादी ढांचा के तहत गोदाम, कोल्ड स्टोरेज जैसी चीजें आती हैं। इनके लिए 100 करोड़ तक लोन देने की सीमा है। वहीं सहायक गतिविधियां के अंतर्गत एग्री क्लिनिक और एग्री बिजनेस सेंटर की स्थापना जैसी चीजें आती हैं। इसके लिए भी 100 करोड़ रुपये के लोन की सीमा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब कोई सीमांत किसान करोड़ों का लोन नहीं ले सकता है तो फिर क्या किसानों के नाम पर सरकारें एग्री कॉरपोरेट का हित साध रही हैं क्योंकि अधिकांश भारतीय किसान आज भी 50 हजार से एक लाख तक का कृषि लोन पाने के लिए बैंकों का चक्कर लगाते नजर आते हैं, जबकि सरकारी आंकड़ों में उन्हें कम ब्याज पर हजारों करोड़ रुपये मिलता दिखाया जा रहा है।

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