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RTI में खुलासा- भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव को अब तक नहीं मिला शहीद का दर्जा, सरकारी किताब में बताया गया ‘आतंकी’

आरटीआई से यह बात भी सामने आई है कि आईसीएचआर की ओर से नवंबर में रिलीज की गई किताब में भगत सिंह और बाकी दो शहीदों को 'कट्टर युवा' और 'आतंकी' करार दिया गया है।
भगत सिंह

स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को भारत सरकार ने अभी तक शहीद का दर्जा नहीं दिया है, एक आरटीआई में इस बात का खुलासा हुआ है। यह आरटीआई इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (ICHR) में दाखिल की गई थी। आरटीआई से यह बात भी सामने आई है कि आईसीएचआर की ओर से नवंबर में रिलीज की गई किताब में भगत सिंह और बाकी दो शहीदों को कट्टर युवा और आतंकी करार दिया गया है। बता दें कि आईसीएचआर मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला संगठन है। आईसीएचआर का चेयरमैन भारत सरकार की ओर से नियुक्त किया जाता है। अंग्रेजी वेबसाइट टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। आरटीआई में यह भी पता चला है कि पिछली सरकारें लगातार इन तीनों क्रांतिकारियों की शहादत को नजरअंदाज करती आई हैं। ये वे शहीद हैं, जिन्होंने कई पीढ़ियों को प्रेरणा दी है। आरटीआई के जरिए जम्मू के एक्टिविस्ट रोहित चौधरी ने पूछा था कि क्या तीनों शहीदों को शहीद का दर्जा दिया गया है?

बता दें कि ऐसा पहली बार नहीं है, जब भगत सिंह आतंकी बताने पर विवाद हुआ हो। पिछले साल दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल एक किताब, जिसमें भगत सिंह को क्रांतिकारी-आतंकवादी (रिवाल्यूशनरी टेररिस्ट) करार दिया गया था, के हिंदी अनुवाद की बिक्री और वितरण को रोकने का फैसला किया गया था। बिपन चंद्रा, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, सुचेता महाजन और केएन पणिकर की ओर से लिखी गई और डीयू की ओर से प्रकाशित किताब ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ के बिक्री और वितरण को रोक दिया गया था। अंग्रेजी में ‘इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस’ नाम की यह किताब पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से डीयू के पाठ्यक्रम का हिस्सा रही है। इस किताब के 20वें अध्याय में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सूर्य सेन और अन्य को क्रांतिकारी ‘रिवाल्यूशनरी टेररिस्ट’ बताया गया है। इस किताब में चटगांव आंदोलन को भी आतंकवादी कृत्य कहा गया है, जबकि ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सैंडर्स की हत्या को भी आतंकवादी कृत्य करार दिया गया है। इस किताब का हिंदी संस्करण भारत का स्वतंत्रता संघर्ष 1990 में डीयू के हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय की ओर से प्रकाशित किया गया था।

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