पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पूर्व पहली पूरक मतदाता सूची प्रकाशित हुए 24 घंटे से भी ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन निर्वाचन आयोग अभी तक विशेष गहन पुनरीक्षण (एसएसआर) की ताजा प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची में जोड़े या हटाए गए नामों की कुल संख्या का खुलासा नहीं कर सका है। ऐसे में 60 लाख से ज्यादा ‘विचाराधीन’ (अंडर एडजूडिकेशन) मतदाताओं की किस्मत अधर में बताई जा रही है।
इस बीच, मंगलवार देर रात आयोग के सर्वर में गड़बड़ी को लेकर सवाल उठे हैं। मंगलवार रात को जब मतदाताओं ने अपने ईपीआईसी नंबरों का उपयोग कर आयोग की वेबसाइट पर अपनी जानकारी देखने की कोशिश की, तो उन लोगों के नाम भी विचाराधीन श्रेणी में दिखाए गए, जिनके नाम अंतिम मतदाता सूची में पहले से ही शामिल थे। इस खामी को लेकर आयोग ने बुधवार को कहा कि तकनीकी गड़बड़ी के कारणों की जांच की जा रही है।
एक अधिकारी ने बताया, ‘एक समय सिस्टम ने गलती से यह दिखाया कि राज्य के सभी मतदाता ‘विचाराधीन’ हैं। जबकि ऐसा नहीं था, यह केवल त्रुटि थी।’ इस घटनाक्रम पर राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और आरोप लगाया कि इस त्रुटि ने प्रभावी रूप से पूरे मतदाता वर्ग को संदेह के घेरे में डाल दिया है। पार्टी ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि वैध मतदाताओं को भी विचाराधीन दिखाया जा रहा है जबकि उनके मामले सुलझ चुके हैं या उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में मौजूद हैं।
राज्य में महीने भर बाद चुनाव हैं। पश्चिम बंगाल देश के उन कुछ राज्यों में शामिल है जहां गैर भाजपा सरकार है। बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसएसआर) के बाद, लगभग 60 लाख नामों को मतदाता के रूप में उनकी पात्रता की जांच के लिए अलग रखा गया है। ये राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 8.5% हिस्सा हैं।
मतदाता सूची में इन्हें ‘अंडर एडजूडिकेशन’ (विचाराधीन) के रूप में चिह्नित किया गया था। बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने सोमवार के देर रात कहा था कि लगभग 29 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। हालांकि, वे यह नहीं बता पाए कि कितने नाम मतदाता सूची में हैं और कितने बाहर किए गए हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, निपटारा होने का मतलब यह नहीं है कि नाम मतदाता सूची में जोड़ा ही जाएगा।
क्या है ‘विचाराधीन’
विचाराधीन या ‘अंडर एडजूडिकेशन’ वे नाम हैं, जिन पर चुनाव आयोग स्पष्ट फैसला नहीं ले पाया है। ये नाम मतदाता सूची में शामिल होंगे या नहीं, इसके निर्णय की जिम्मेदारी न्यायिक अधिकारियों को सौंपी गई है, जिन्हें तार्किक विसंगति या ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ पर गौर करना है- नामों के हिज्जे में अंतर (जैसे बंगाली से अंग्रेजी अनुवाद की गलतियां), मतदाता और माता-पिता के बीच उम्र का फासला कम होना, और 2002 की मतदाता सूची से माता-पिता के नाम या पारिवारिक संबंधों में अंतर। अधिकांश ये खामियां साफ्टवेयर के कारण हुई हैं।
आरजी कर पीड़िता की मां को टिकट
भारतीय जनता पार्टी ने बुधवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए 19 उम्मीदवारों की तीसरी सूची जारी कर दी। पार्टी ने आरजी कर अस्पताल में बलात्कार के बाद मार डाली गई डॉक्टर की मां रत्ना देबनाथ को पानीहाटी विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतारा है। पिछले साल आरजी कर अस्पताल में प्रशिक्षु महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद हत्या को लेकर देशभर में जगह-जगह प्रदर्शन हुए थे।
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी अजेय माने जाने वाले वामदल खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का पतन भारतीय राजनीति के सबसे बड़े बदलावों में से एक है। 34 वर्षों तक लगातार सत्ता में रहने वाला वाम मोर्चा 2011 में सत्ता से बेदखल हुआ, लेकिन उस समय भी उसका जनाधार मजबूत था। पूरी खबर पढ़ें…
