West Bengal Elections Results: पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की अभूतपूर्व जीत में वैसे तो कई कारक रहे हैं, लेकिन एक अहम बिंदु RSS का है। बीजेपी के लिए आरएसएस ने पिछले एक दशक में शांत तरीके से जमीन पर उतरकर काम किया। संगठन में विस्तार की पुरजोर कोशिशें कीं। उसी का नतीजा है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता तक पहुंच गई।
बीजेपी ने बंगाल के इस बार के विधानसभा चुनाव में हिंदुत्व का मुद्दा मुखरता के साथ उठाया था लेकिन ऐसा नहीं हैं, कि ये बीजेपी के लिए कोई नया मुद्दा नहीं बल्कि यहां हिंदू पहचान की राजनीति का इतिहास एक सदी पुराना है। इसके बावजूद आरएसएस और बीजेपी के पूर्ववर्ती संगठन यानी जनसंघ बंगाल में अपनी जड़े जमाने में कामयाब नहीं हो पाया।
बंगाल में लंबा रहा है बीजेपी का संघर्ष
साल 1951 के बंगाल चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 9 विधानसभा सीटें जीती थीं, और 12.57 वोट प्रतिशत का वोट भी हासिल किया था लेकिन उसके बाद यहां से जनसंघ का नामोनिशान मिटता चला गया। इसके बाद जनसंघ का स्वरूप बदला और वो भारतीय जनता पार्टी बन गई। यह लंबा सूखा 2014 में तब समाप्त हुआ, जब बीजेपी ने उपचुनाव में अपनी पहली विधानसभा सीट जीती। बीजेपी ने साल 2016 में 3, 2021 में 77 सीटें जीती थीं। वह मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई थी। इस बार के चुनाव में 207 सीटों के साथ प्रचंड जीत के साथ सरकार बना ली।
वरिष्ठ आरएसएस पदाधिकारियों ने बताया कि चुनावी लिहाज से निर्णायक मोड़ 2021 के विधानसभा चुनाव में आयास क्योंकि RSS को यह समझ आ गया था कि अब ममता बनर्जी के खिलाफ चुनावी लड़ाई जीती जा सकती है। पिछले दो वर्षों में संघ ने भाजपा के जमीनी स्तर के तंत्र में मौजूद कमियों को पूरा करने के लिए अन्य राज्यों से 2,000 पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को जुटाया था।
संघ ने जमीन पर उतारे थे कार्यकर्ता
ये कार्यकर्ता संघ और पार्टी के कैडर से लिए गए थे। इन कार्यकर्ताओं के सभी खर्चों का वहन पार्टी द्वारा किया गया था और उन्हें एक ही लक्ष्य दिया गया था। जमीन स्तर पर गांवों, बस्तियों विशिष्ट समुदायों के बीच काम करने के लिए आरएसएस ने पूरी ताकत झोंकी थी। संघ की भूमिका बीजेपी की राजनीतिक सफलता का मार्ग प्रशस्त करने वाली सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ बनाने की थी।
2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बंगाल में काफी बड़ा झटका लगा था। इसका काफी हद तक कारण ये माना गया था, कि संघ और बीजेपी के बीच किसी भी तरह का समन्वय स्थापित न हो पाना था।। तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में यह संकेत दिया था कि पार्टी को अब आरएसएस की जरूरत नहीं है। उनके इस बयान के बाद आरएसएस ने कथित तौर पर अपनी सक्रियता जमीन पर काफी कम कर दी थी।
इस बार के चुनाव में बेहतर था समन्वय
आरएसएस की मध्य बंगाल इकाई के एक पदाधिकारी ने इस बार के चुनाव को लेकर कहा, “लगातार समन्वय बना रहा। बीजेपी कार्यकर्ता राजनीतिक लड़ाई में सबसे आगे थे, हमारे कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को निडर होकर मतदान करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। बता दें कि राज्य में आरएसएस की संगठनात्मक संरचना उत्तर, मध्य और दक्षिण बंगाल के तीन क्षेत्रों में विभाजित है।
राज्य के बाहर से आए 2,000 कार्यकर्ता बारी-बारी से काम करते थे जिनकी न्यूनतम तैनाती तीन महीने की होती थी। 150 से अधिक वरिष्ठ नेता, अन्य राज्यों के विधायक और चुनाव प्रबंधन के अनुभवी लोग भी लगभग दो वर्षों तक राज्य में डेरा डाले रहे। इन नेताओं ने विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी के रूप में कार्य किया और उनकी भूमिका पारंपरिक चुनाव प्रचार से कहीं अधिक व्यापक थी।
भय के बीच कार्यकर्ताओं ने किया काम
एक बीजेपी नेता ने कहा, “कई जगहों पर तो हमारे आरएसएस-भाजपा कार्यकर्ता भी डरे हुए थे और कई जगहों पर उन्होंने शिकायत की कि टीएमसी के लोगों ने उन्हें धमकाया है। डर के मारे हमारे कुछ कार्यकर्ताओं ने काम करना भी बंद कर दिया, लेकिन हमने उन्हें समझाया कि चिंता न करें। हमने उन्हें टीएमसी कार्यकर्ताओं से झड़पों से बचने और घर-घर जाकर संपर्क साधने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया।”
जाति, समुदाय, महिला और छात्र समूहों के साथ-साथ शिक्षक और पेशेवर नेटवर्क में तैनात इन कार्यकर्ताओं ने 15-20 लोगों की अनेकों सभाएं कीं। इनमेंमें बंगाली गौरव, महिलाओं की सुरक्षा, बेरोजगारी और आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार और हत्या मामले और सांप्रदायिक विभाजन जैसे भावनात्मक मुद्दों पर सावधानीपूर्वक तैयार किए गए चर्चा बिंदु शामिल थे।
सुनील बंसल का डेटा मैनेंजमेंट
जमीनी स्तर की ताकत के अलावा, बीजेपी-आरएसएस ने ऐसी नियुक्तियां भी कीं, जिनसे अंततः अच्छे परिणाम मिले। 2016 के चुनावों में भूपेंद्र यादव और कैलाश विजयवर्गीय की जोड़ी सत्ता में थी। 2021 तक पार्टी ने अपने संयुक्त महासचिव (संगठन) शिव प्रकाश और राष्ट्रीय सचिव अरविंद मेनन को तैनात कर दिया था। शिव प्रकाश ने आरएसएस की तर्ज पर लगभग पांच साल जमीनी स्तर पर काम किया।
बंगाल के प्रभारी वर्तमान भाजपा महासचिव सुनील बंसल ने अपने पूर्ववर्तियों द्वारा स्थापित मॉडल को और बारीकी से लागू किया। उत्तर प्रदेश के एक नेता ने बंगाल चुनाव में 6 महीने बिताए थे। उन्होंने बताया कि सुनील बंसल और पार्टी द्वारा इस चुनाव में डेटा-आधारित सटीकता के साथ किए गए कार्य की सराहना की।
उन्होंने कहा, “डेटा के मामले में रिसर्च इतनी गहरी थी कि अन्य राज्यों से नियुक्त किए गए 294 विधानसभा क्षेत्रों के सभी प्रभारियों को उनके निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित 20-25 पृष्ठों की एक फ़ोल्डर दी गई थी। इसमें स्थानीय मुद्दे, पिछले कुछ चुनावों का मतदान पैटर्न, क्षेत्र के प्रमुख कार्यकर्ता, विभिन्न दलों के प्रमुख पदाधिकारियों के विवरण और संपर्क, साथ ही उनकी कमजोरियां और ताकतें जैसी जानकारियां भी शामिल थीं।
2016 से डेटा तैयार कर रही थी टीम
पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर बीजेपी संगठन के नेताओं ने जिस डेटा का इस्तेमाल किया था। वह 20216 से बीजेपी के लिए काम करने वाली राजनीतिक रणनीति बनाने वाली एक कंपनी ने जुटाया था। कंपनी के डेटा को देख स्थानीय स्तर के नेता भी काफी चौंक गए थे। उत्तर प्रदेश के एक नेता ने कहा, “हम विधानसभा क्षेत्रों में सभी आवश्यक आंकड़ों से लैस थे। स्थानीय नेता और कार्यकर्ता अक्सर जमीनी स्तर की जानकारी और अन्य दलों के नेताओं के बारे में हमारे ज्ञान और समझ से आश्चर्यचकित रह जाते थे। सूची में यह भी शामिल था कि हमारे क्षेत्र में टीएमसी के कौन से नेता अप्रत्यक्ष रूप से हमारे लिए काम कर सकते हैं और उनसे संपर्क किया जा सकता है।”
टीएमसी ने भी दिया मौका
संघ के नेताओं ने कहा कि टीएमसी की वजह से आरएसएस और बीजेपी का विकास हो सकता है। चुनाव के दौरान राज्य भर में तैनात रहे कोलकाता के संघ एक वरिष्ठ प्रचारक ने कहा, “अगर टीएमसी सरकार नहीं होती, तो पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत संभव नहीं होती। राज्य में हमारा काम टीएमसी के उदय और मजबूती के साथ बढ़ा और ममता बनर्जी के नेतृत्व में उनकी मुस्लिम तुष्टीकरण नीतियों के कारण राज्य में सांप्रदायिक विभाजन और भी गहरा गया। 2011 से पहले हमारे पास बहुत कम बंगाली प्रचारक थे। ये वैसी ही स्थिति थी, जैसी पंजाब में बीजेपी की है, जहां उसके पास बेहद कम प्रचारक थे। अब हमारे पास बंगाली प्रचारकों की एक लंबी सूची है, जिनमें न केवल पश्चिम बंगाल मूल के लोग हैं, बल्कि बांग्ला भाषी लोग भी शामिल हैं।”
एक अन्य आरएसएस पदाधिकारी ने कहा, “वामपंथी शासन के दौरान सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करना मुश्किल था। टीएमसी के शासनकाल में यह बहुत आसान हो गया।” टीएमसी के शासनकाल में संघ के विस्तार की ओर इशारा करते हुए अंदरूनी सूत्रों ने दावा किया कि राज्य भर में आरएसएस की 1,500 से अधिक दैनिक शाखाएं संचालित होती थीं। अगर यदि साप्ताहिक और मासिक सभाओं का जिक्र करें तो ये संख्या और ज्यादा प्रभावशाली भी नजर आएगी।
किसी राज्य में RSS को नहीं हुई बंगाल जैसी दिक्कतें
आरएसएस नेता ने कहा, “समय बीतने के साथ हमने महसूस किया कि बंगाली हिंदुओं के बीच टीएमसी और उसके नेतृत्व के प्रति एक प्रकार की नफरत बढ़ रही थी। हमने पाया कि जिन महिलाओं से हम संपर्क कर रहे थे, उनमें से बड़ी संख्या में महिलाएं ममता बनर्जी के खिलाफ हो गई थीं। आरएसएस के नेताओं ने कहा कि शाखाएं आयोजित करना संघ के लिए काफी मुश्किल हो गया था। इसको लेकर एक पदाधिकारी ने कहा कि शायद और कोई राज्य ऐसा नहीं था, जहां हमारे लिए संघ की शाखा का आयोजन करना काफी मुश्किल था।
टीएमसी के प्रभुत्व वाले स्थानीय निकायों ने अक्सर आयोजन स्थलों को बंद कर दिया, शौचालयों को रोक दिया और सभाओं में बाधा डाली। यह स्थिति केरल में आरएसएस के प्रति वामपंथियों के प्रतिरोध से कहीं अधिक व्यापक थी। संघ के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार ये हमले विशेष रूप से दक्षिण बंगाल में तीव्र थे। राष्ट्रीय स्तर पर आरएसएस से संबद्ध एक संगठन के लिए काम करने वाले पश्चिम बंगाल के एक प्रचारक ने बताया, “हमने महसूस किया कि बंगाली हिंदू ममता बनर्जी के नेतृत्व और नीतियों से तेजी से असहज महसूस करने लगे थे। समाजवादी पार्टी की सरकारों विशेष रूप से 2012-17 वाली सरकार ने हमें उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर दिया।
शिक्षा शाखा से जुड़े स्कूलों पर पड़ते थे छापे
आरएसएस की शिक्षा शाखा, विद्या भारती, राज्य में लगभग 300 शारदा शिशु तीर्थ स्कूल चलाती है, जिनमें 1.5 लाख छात्र पढ़ते हैं और लगभग 3,000 शिक्षक कार्यरत हैं। शिक्षा शाखा से जुड़े एक प्रचारक ने बताया कि इन संस्थानों को बार-बार कानूनी मामलों, छापों और मान्यता रद्द होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। संघ के एक प्रचारक ने बताया, “हमारे स्कूलों पर बार-बार छापे मारे गए और आरएसएस की गतिविधियों पर रोक लगा दी गई।”
उन्होंने कहा, “जब भी टीएमसी को स्कूलों में किसी सभा या शिविर के होने का आभास होता, छापे मारे जाते और मान्यता रद्द कर दी जाती। हम इतने भयभीत थे कि एक समय तो हमने इन स्कूलों के नाम बदलकर ‘पब्लिक स्कूल’ जैसा कोई प्रत्यय जोड़ने की सोची थी ताकि ऐसी कार्रवाइयों से बचा जा सके। सीबीएसई से संबद्ध तीन स्कूलों में से एक में हमें अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ही अनिवार्य अनापत्ति प्रमाण पत्र मिला।”
बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम से देंगे इस्तीफा, भवानीपुर सीट रखी अपने पास, यहां ममता बनर्जी को दी थी मात
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि वह भवानीपुर विधानसभा सीट अपने पास रखेंगे और नंदीग्राम विधानसभा सीट से इस्तीफा देंगे। शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर विधानसभा सीट पर ममता बनर्जी को 15000 से ज्यादा वोटों से हराया था। पढ़िए पूरी खबर…
