West Bengal Politics: बंगाल चुनाव को लेकर केंद्रीय बीजेपी इस बार पूरी ताकत झोंक रही है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के अनुसार, बीजेपी और NDA गठबंधन वर्तमान में 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सत्ता में हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए इतना काफी नहीं है। पिछले हफ्ते राज्य में एक रैली के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि उनके चेहरों पर मुस्कान तब आएगी जब पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार होगी।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) को बेदखल करना पार्टी के लिए एक कठिन या यूं कहें कि अब तक की सबसे कठिन चुनौती है, जो लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है। वाम मोर्चा और कांग्रेस के लगभग सफाए के साथ बंगाल की राजनीति अब एक द्विध्रुवीय (bipolar) संघर्ष बन गई है।

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बीजेपी-टीएमसी के बीच सीधा मुकाबला

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक तरफ ममता बनर्जी का करिश्मा और उनकी सरकार की लोकलुभावन कल्याणकारी योजनाएं हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी के बड़ा दांव हैं । इसमें अखिल बंगाल हिंदू एकीकरण, सत्ता-विरोधी लहर और TMC भ्रष्टाचारी है, के नैरेटिव पर टिका है।

एक तरफ जहां अनुमानित 30% से अधिक मुस्लिम आबादी के हमेशा की तरह TMC का साथ देने की उम्मीद है, वहीं मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जिलों के कुछ हिस्सों को छोड़कर, हिंदू भाजपा को समर्थन देने के मामले में विभाजित नजर आ रहे हैं। बीजेपी द्वारा सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकीय असंतुलन और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के दावों के बीच, बंगाल चुनाव एक विस्फोटक राजनीतिक स्थिति प्रतीत होता है।

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क्या TMC को मिल रही है बढ़त?

ममता बनर्जी का तीसरा कार्यकाल आसान नहीं रहा है। बीजेपी के प्राथमिक विपक्षी दल के रूप में उभरने के बाद संदेशखली हिंसा, आरजी कर बलात्कार-हत्या मामला, शिक्षक भर्ती घोटाला और भ्रष्टाचार के अन्य आरोपों ने TMC को झकझोर कर रख दिया था। हालाँकि बनर्जी ने राजनीतिक कौशल के साथ वापसी की है।

उन्होंने पिछले हफ्ते मतदाता सूची के ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खुद अपना पक्ष रखा और पिछले महीने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के दौरान अपनी पार्टी के रणनीति दस्तावेज छीनकर अपनी आक्रामक शैली का प्रदर्शन किया।

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ममता, बीजेपी पर लगा रहीं बाहरी का ठप्पा

इसके साथ ही उन्होंने बंगाली ‘अस्मिता’ (गर्व) का सहारा लिया और भाजपा को “बाहरी लोगों” की पार्टी बताया। रोजगार सृजन न कर पाने के आरोपों के बीच, TMC प्रमुख ने महिलाओं, युवाओं और आशा एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को नकद हस्तांतरण (cash transfers) का सहारा लिया है, जो उनका मुख्य आधार हैं।

मुस्लिम समुदाय ममता बनर्जी की सत्ता का एक और स्तंभ है। ओबीसी सूची से कुछ समूहों को हटाने या पुनर्वर्गीकृत किए जाने से असंतुष्ट दिखा है, वहीं SIR के दौरान मतदाता सूची से बाहर होने का डर और भाजपा के सत्ता में आने की संभावना उन्हें TMC के साथ बनाए रख सकती है।

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BJP के लिए क्या हैं चुनौतियां?

बीजेपी पिछले डेढ़ साल में महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार में मिली जीत और ‘नरेंद्र मोदी फैक्टर’ से उत्साह हासिल कर रही है, लेकिन संगठनात्मक रूप से यह अभी भी TMC का मुकाबला नहीं कर सकती। केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को पिछले सितंबर में राज्य का प्रभार दिया गया था और सूत्रों का कहना है कि उन्होंने पार्टी के जमीनी नेटवर्क को मजबूत करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं।

बीजेपी के पास एक और समस्या चेहरे को लेकर है। पार्टी के पास राज्य की राजनीति में ममता बनर्जी जैसा कोई बड़ा चेहरा नहीं है। हालांकि शुभेंदु अधिकारी सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन कई पुराने नेता उनके खिलाफ हैं। समीर भट्टाचार्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाना इन गुटों के बीच सुलह की कोशिश माना जा रहा है। BJP ओबीसी और ‘मतुआ’ समुदाय को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, जिन्होंने 2019 में पार्टी को 18 सीटें जिताने में मदद की थी।

अन्य दो प्रमुख दलों की बात करें तो कांग्रेस और वाम दलों का प्रभाव पिछले दशक में तेजी से कम हुआ है। 2016 के बाद पहली बार वे बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उनके पास बड़े प्रभाव की संभावना कम है। दूसरी ओर, इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) और हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी की बढ़ती सक्रियता ने TMC की चिंता बढ़ा दी है। हुमायूं कबीर द्वारा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति (replica) की आधारशिला रखना ध्रुवीकरण का कारण बन सकता है, जो भाजपा से ज्यादा TMC को नुकसान पहुंचा सकता है। SIR मामले में सीएम ममता बनर्जी की सुप्रीम कोर्ट में उपस्थिति के खिलाफ अर्जी दायर