Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पार्टी ने 284 सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया है, जिसमें एक नाम पूर्व सांसद और नेता विपक्ष रहे अधीर रंजन चौधरी का भी है। 1991 में अधीर ने अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा था। उस वक्त पी.वी.नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे और बंगाल में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ज्योति बसु काबिज थे।

अधीर रंजन चौधरी ने 1991 में नबग्राम सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि वे चुनाव हार गए थे। इसके साढ़े तीन दशक बाद सांसद के तौर पर पांच कार्यकाल पूरे करने और लोकसभा चुनाव में अपनी सीट से हारने के चलते अब अधीर रंजन चौधरी राज्य की सियासत में लौटे हैं। कांग्रेस ने उन्हें बहरामपुर सीट से टिकट दिया है। इस सीट पर 23 अप्रैल को मतदान होगा।

अधीर ने बहरामपुर से चुनाव लड़ने पर क्या कहा?

बहरामपुर से टिकट मिलने के बाद अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “मैंने अपना पहला विधानसभा चुनाव नबग्राम से लड़ा, जो मेरे शहर से कुछ ही दूरी पर है। वहां वामपंथियों का इतना दबदबा था कि उसे गर्व से ‘मुर्शिदाबाद का वियतनाम’ तक कहा जाता था। बड़े पैमाने पर बूथों में धांधली के बावजूद मैं केवल 1,300 वोटों से हारा था।” उन्होंने बताया कि इसके 5 साल बाद बहरामपुर सीट से मतदाताओं ने उन्हें जिताया था।

विधानसभा चुनाव क्यों लड़ रहे अधीर?

ऐसे में जब अधीर बाबू से ये पूछा गया कि लंबे संसदीय कार्यकाल के बाद वे विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए सहमत क्यों हो गए? तो उन्होंने कहा, “मैं 2024 के लोकसभा चुनावों में बहरामपुर सीट हार गया था। तब पार्टी नेतृत्व ने मुझसे पश्चिम बंगाल चुनाव लड़ने के लिए कहा। कांग्रेस का सिपाही होने के नाते, मैंने स्वीकार कर लिया। अब मैं नए सिरे से शुरुआत कर रहा हूं।” खास बात यह भी है कि उनके समर्थक पहले से ही उनकी उम्मीदवारी के लिए तैयार थे, और उनके दफ्तर में कट आउट बैनर, झालर और पोस्टर रखे गए थे।

रविवार को जब कांग्रेस ने उनकी उम्मीदवारी की आधिकारिक घोषणा के बाद गोरा बाजार क्षेत्र में उनके आवास के साथ-साथ पार्टी कार्यालय में हलचल तेज हो गई। उनके कार्यालय को अक्सर “अधीर दा का कार्यालय” कहा जाता है और जो उनकी तस्वीरों से सजा हुआ है। एक उत्साहित युवा कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा कि दादा के नाम की आधिकारिक घोषणा से पहले ही वे तैयार थे। यह उनके लिए करो या मरो की लड़ाई है।

अधीर की उम्मीदवारी पर उत्साहित कार्यकर्ता

चौधरी के करीबी सहयोगी भी उनकी उम्मीदवारी को लेकर उत्साहित नजर आ रहे हैं। मुर्शिदाबाद जिला परिषद में विपक्ष के नेता मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफ़ी ने कहा, “कोई चाहे टीएमसी का समर्थन करे या भाजपा का, बहरामपुर में हर कोई हमारे अधीर दा को ही वोट देगा। वे पिछले चार दशकों से जिले की सेवा कर रहे हैं और लोगों को उन पर अपार विश्वास है।”

अधीर रंजन चौधरी के दो पुराने सहयोगी अशोक कुमार सरकार और सुनील बिस्वास ने भी इसी तरह की भावनाएं व्यक्त कीं। सरकार ने कहा, “कई TMC उम्मीदवारों ने अधीर दा के नेतृत्व में अपना राजनीतिक करियर शुरू किया। यहां तक ​​कि मौजूदा BJP विधायक (सुब्रता मैत्रा) भी कभी उस वार्ड से कांग्रेस पार्षद थे जिसमें अधीर दा का घर आता है।”

सुनील बिस्वास 1988 से अधीर रंजन चौधरी के साथ जुड़े हुए हैं और वर्तमान में भाकुरी-II क्षेत्र के कांग्रेस अध्यक्ष हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे कई नेताओं ने दल बदल लिए जबकि अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस के प्रति वफादार रहे। उन्होंने कहा, “मुर्शिदाबाद में वे कभी अकेले नहीं होते और उनके समर्थकों की कभी कमी नहीं होती। बंगाल में पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए हमें ऐसे ही नेताओं की जरूरत है। मैं हमेशा उनके साथ खड़ा रहूंगा।”

पूर्व सहयोगियों के साथ ही है जंग

अधीर रंजन चौधरी की वापसी से उनका मुकाबला पूर्व पार्टी सहयोगियों नरुगोपाल मुखर्जी से भी हो रहा है। वे बहरामपुर नगरपालिका के अध्यक्ष और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेता हैं, और मौजूदा भाजपा विधायक सुब्रता मैत्रा से होगा। हालांकि सीपीआई (एम) ने पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ा था लेकिन चुनाव से पहले अलग हो गई है। सीपीआईएम ने अभी तक उनके खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है।

सीपीआईएम केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने कहा, “हमने अभी तक सभी सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। हम टीएमसी और भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं और धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताकतों को एकजुट करने के लिए काम कर रहे हैं। कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। आगे क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा।

बहरामपुर सीट पर क्या है लेफ्ट का रुख?

मुर्शिदाबाद के एक वरिष्ठ सीपीआई (एम) नेता ने कहा कि पार्टी में कई लोग अधीर रंजन चौधरी की जीत चाहते हैं। उन्होंने कहा, “वाम मोर्चे के साथ गठबंधन न करने के कांग्रेस के फैसले से उनकी संभावनाओं पर असर पड़ेगा। हालांकि, विधानसभा चुनावों में उनके जैसे नेता की हार दुर्भाग्यपूर्ण होगी।” सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने अब्दुल कासिम शेख को बहरामपुर से अपना उम्मीदवार नामित किया है। अहम बात यह भी है कि सीपीआई (एम) सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने उनसे नामांकन पत्र दाखिल न करने का अनुरोध किया था।

अधीर रंजन चौधरी 2024 के लोकसभा चुनाव में बहरामपुर से हार गए जिसका मुख्य कारण मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में ध्रुवीकरण को माना जा रहा है। हालांकि, उन्होंने बहरामपुर विधानसभा क्षेत्र में 7,000 से अधिक वोटों की बढ़त हासिल कर ली। यह सीट लोकसभा क्षेत्र के सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। हालांकि कांग्रेस ने 2006 से 2016 तक इस सीट पर कब्जा बनाए रखा लेकिन उसके पूर्व विधायक मनोज चक्रवर्ती 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा और सीपीआई (एम) के बाद तीसरे स्थान पर रहे।

बहरामपुर चुनाव में चौधरी के प्रवेश पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी प्रत्याशी मैत्रा ने दावा किया कि उन पर कोई दायित्व नहीं है। दूसरी ओर टीएमसी का कहना है कि अब अधीर रंजन चौधरी का कोई राजनीतिक महत्व ही नही है। हालांकि, अधीर ने बहरामपुर से अपने गहरे जुड़ाव पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जहां बीजेपी उम्मीदवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के आशीर्वाद की बात करते हैं। वहीं टीएमसी उम्मीदवार ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के आशीर्वाद की बात करते हैं, वहीं मुझे ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त है। बहरामपुर की जनता ने मुझे कभी खाली हाथ नहीं लौटने दिया।

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टीएमसी वापसी की जुगुत में लगी है। (Image Source: PTI)

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