पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। टीएमसी ममता बनर्जी के नेतृत्व में जीत का ‘चौका’ लगाने की उम्मीद कर रही है, तो वहीं बीजेपी पहली बार सत्ता पाने की कोशिश में है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उत्तर बंगाल वह इलाका है जहां से पश्चिम बंगाल की राजनीतिक दिशा तय होती है। उत्तर बंगाल कभी सीपीएम का गढ़ हुआ करता था, लेकिन 2011 के विधान सभा चुनाव में पासा पलटा और जनता ने ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी पर ज्यादा भरोसा जताया।

2011 में टीएमसी ने मारी थी बाजी

उत्तर बंगाल में 54 विधानसभा सीटें आती हैं और 8 लोकसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें से आधे से अधिक पर 2011 में टीएमसी ने कब्जा जमाया था। 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी पहली बार सत्ता में आई थी और उत्तर बंगाल की 54 में से 28 सीटों पर उसे जीत मिली थी। ममता बनर्जी को इस बढ़त की अहमियत पता थी, इसीलिए उन्होंने सरकार में आने के तुरंत बाद सिलीगुड़ी में मिनी सचिवालय बनाने का ऐलान कर दिया। यही नहीं उत्तरी बंगाल के लिए एक अलग से मंत्रालय बना दिया गया। उत्तर बंगाल में चाय बगान सैकड़ो एकड़ में फैले हुए हैं। यहां के ज्यादातर लोग चाय की खेती पर ही निर्भर है, जबकि गोरखा समुदाय के भी अपने अलग मुद्दे हैं।

2009 के लोकसभा चुनाव में हुई बीजेपी की एंट्री

उत्तर बंगाल में बीजेपी की एंट्री पहली बार 2009 के लोकसभा चुनाव में हुई, जब उसने आठ लोकसभा में से एक दार्जिलिंग में जीत हासिल की थी। 2014 में भी बीजेपी को केवल दार्जिलिंग में ही जीत मिली। 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर बंगाल की सात विधानसभा सीटों पर जीत हासिल कर ली। हालांकि टीएमसी सबसे अधिक 23 सीटों पर चुनाव जीती थी।

2016 के बाद बदले समीकरण

हालांकि 2016 के चुनाव के बाद से ही समीकरण बदलते हैं। बीजेपी पूरे बंगाल में संगठन विस्तार करती है और उत्तरी बंगाल पर उसका पूरा फोकस होता है। इसका नतीजा 2019 के लोकसभा चुनाव में दिखता है, जब बीजेपी बंगाल में 42 में से 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर लेती है। वहीं उत्तर बंगाल एक तरीके से बीजेपी गढ़ बन जाता है और वह 8 में से 7 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर लेती है।

उत्तर बंगाल बना बीजेपी का गढ़

2021 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा पूरे बंगाल में जीत का दावा कर रही थी और जोर-जोर से प्रचार कर रही थी, हालांकि उसे हार नसीब हुई। फिर भी बीजेपी 77 विधानसभा सीटों तक पहुंच गई और उत्तर बंगाल में उसने शानदार प्रदर्शन किया। यह पहली बार था जब उत्तर बंगाल में किसी पार्टी ने बढ़त बनाई हो और उसके हाथ सत्ता ना लगी हो। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उत्तर बंगाल की 54 में से 30 सीटों पर जीत हासिल कर लेती है, जबकि टीएमसी 23 सीटों तक ही पहुंच पाती है। यानी भाजपा उत्तर बंगाल में लोकसभा के बाद विधानसभा में भी सबसे बड़ी पार्टी बन जाती है। यह पहली बार था जब किसी दल ने उत्तर बंगाल में बढ़त बनाई हो और उसे सत्ता न हासिल हुई हो। हालांकि इसके बाद 2024 का लोकसभा चुनाव आता है। इस चुनाव में बीजेपी को एक सीट का नुकसान होता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर बंगाल में बीजेपी को 8 में से 6 सीटों पर जीत हासिल होती है।

दो विभागों में बंटा है उत्तर बंगाल

अगर हम चुनावी दृष्टि से देखें तो उत्तर बंगाल दो विभाग में बंटा हुआ है। एक सिलीगुड़ी विभाग है और दूसरा मालदा विभाग है। सिलीगुड़ी विभाग में अलीपुरद्वार, कूचबिहार दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी लोकसभा सीटें आती है। जबकि मालदा विभाग में रायगंज, बालूरघाट, मालदा दक्षिण और मालदा उत्तर सीटें आती है। सिलीगुड़ी विभाग में चारों लोकसभा सीटें बीजेपी के पास है जबकि मालदा विभाग में दो सीट बीजेपी, एक टीएमसी और एक कांग्रेस के पास है।

क्या है जातीय समीकरण?

उत्तरी बंगाल में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, गोरखा समुदाय और अल्पसंख्यक मतदाता अधिक संख्या में हैं। अनुसूचित जाति में राजबंशी और मतुआ जाती प्रमुख है, जो राजनीतिक रूप से भी काफी अहम है। वहीं पहाड़ी इलाकों में गोरखा समुदाय अच्छी संख्या में है, जो लंबे समय से बीजेपी के साथ भी है। वहीं 2019 से मतुआ समुदाय ने भी खुलकर भाजपा को वोट किया।

गोरखालैंड का मुद्दा क्या है?

विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही गोरखालैंड का मुद्दा एक बार फिर से चर्चा में आ गया है। गोरखा समुदाय के नेता 1980 के दशक से गोरखालैंड नाम के अलग राज्य की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग है कि दार्जिलिंग और आसपास के पहाड़ी इलाकों को मिलाकर एक अलग राज्य बनाया जाए। इसको लेकर कई आंदोलन भी किए गए हैं। 2007 में भी आंदोलन हुआ था और इसके बाद गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) का गठन किया गया था। इसका उद्देश्य स्थानीय समस्याओं का समाधान करना था। हालांकि गोरखा प्रतिनिधियों का आरोप है कि उनकी समस्याएं वैसी ही हैं। बीजेपी के पास गोरखा समुदाय के सबसे बड़े नेता दार्जिलिंग से सांसद राजू बिष्ट हैं। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जीत हासिल की थी। हाल ही में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन से गोरखा समुदाय के नेताओं ने मुलाकात भी की थी। अब बड़ा सवाल उठता है कि क्या आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा उत्तरी बंगाल में अपनी बढ़त बनाए रख पाएगी या फिर टीएमसी वापसी करेगी?

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बंगाल विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और इस बार भवानीपुर बंगाल चुनाव का मुख्य केंद्र बन चुका है। टीएमसी ममता बनर्जी की बड़ी जीत का दावा कर रही है तो वहीं सुवेंदु भी कह चुके हैं पिछली बार नंदीग्राम से हराया था, इस बार भवानीपुर से हराएंगे। पढ़ें पूरी खबर