पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र की 76 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। इनमें उत्तर दिनाजपुर, अलीपुर द्वार, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, मुर्शिदाबाद, मालदा, न्यू जलपाईगुड़ी सहित अन्य सीटें हैं। चाय बगानों के साढ़े तीन लाख परिवारों को भूमि का मालिकाना हक का पट्टा, एसआईआर समेत अन्य मुद्दों पर भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है तो गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को भुनाने में तृणमूल कांग्रेस भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है।
उत्तरी बंगाल में बीजेपी मजबूत
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए पहले चरण में 152 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होंगे। जानकारों का कहना है कि इस क्षेत्र में भाजपा की पैठ है। महिला आरक्षण सहित अन्य मुद्दों पर भाजपा लगातार तृणमूल समेत तमाम विपक्षी दलों पर हमलावर है। बंगाल की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले सेवानिवृत्त प्रो. उद्वन बंदोपाध्याय ने कहा कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर है और इसमें किसी भी दल को फायदा मिल सकता है।
काफी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, जिसका बड़े पैमाने पर विरोध है। एसआईआर का मुद्दा सामने आने के बाद तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर काफी कम हो गई है। महिला आरक्षण, एसआईआर समेत अन्य मुद्दों को लेकर सभी दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप के जरिए मतदाताओं को साधने की पूरी कोशिश है। जिनके नाम काटे गए हैं, उनके परिवार के सदस्यों के रोष का भी असर इस चुनाव में दिखने की प्रबल संभावना है।
बीजेपी का वादा
कुछ दिनों पहले भाजपा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था कि 707 चाय बागानों के साढ़े 3 लाख परिवारों को भूमि के मालिकाना हक का पट्टा देने का पार्टी ने काम भाजपा किया है। पहले चरण में 20 जिलों के 106 बागानों में यह काम पूरा हो चुका है।
राजनीतिक मामलों के जानकार एम इस्लाम ने कहा कि पश्चिम बंगाल के उत्तरी क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन पिछले कई वर्षों के दौरान अच्छा रहा है। लेकिन इस बार एसआईआर में नाम काटे जाने से मतदाताओं के सभी वर्गों में रोष है। उत्तरी बंगाल में भी हिंदू मतों के बंटने का मतदान पर असर दिखने की प्रबल संभावना है। एसआईआर के मुद्दे को भाजपा और तृणमूल कांग्रेस, दोनों ही अपने अपने तरीके से मतदाताओं के सामने रख रही है। मतदान से पहले आखिरी वक्त में मतदाताओं का रुख किस दल की तरफ होता है, इस पर प्रदेश के सियासी माहिरों की निगाहें भी टिकी हैं।
(यह भी पढ़ें- बीजेपी के UCC वादे ने ममता को फायदा तो नहीं दे दिया?)
पुनरीक्षण में नाम हटने, भाजपा के यूसीसी के वादे और AIMIM-AJUP गठबंधन के कमजोर पड़ने से टीएमसी की मुसलिम मतदाताओं पर पकड़ एक बार फिर मजबूत होती दिख रही है। पढ़ें पूरी खबर
