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सुप्रीम कोर्ट के सिर्फ 7 जजों ने ही दिए हैं संपत्ति के विवरण, CJI ऑफिस को RTI दायरे में लाने वाले पांच में तीन ने भी नहीं दिए डिटेल्स!

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में सभी जजों ने अपनी संपत्ति का विवरण नहीं दिया है। इतना ही नहीं सीजेआई ऑफिस को आरटीआई के दायरे में लाने वाले पांच जजों में से तीन के नाम वेबसाइट में नहीं हैं।

Author नई दिल्ली | Published on: November 14, 2019 10:51 AM
CJI ऑफिस को RTI दायरे में लाने वाले पांच में तीन जजों की वेबसाइट पर नहीं हैं डिटेल्स!

सर्वोच्च न्यायालय ने आरटीआई अधिनियम के दायरे में भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को लाने का फैसला किया है। अब मुख्य न्यायाधीश का ऑफिस भी सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के तहत आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश द्वारा सीजेओ के साथ स्वैच्छिक रूप से घोषित संपत्ति आरटीआई के तहत उपलब्ध होगी। यह फैसला पांच जजों की संविधान पीठ ने बुधवार को सुनाया है। इस बेंच में चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एनवी रमन, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता, और जस्टिस संजीव खन्ना शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में सभी जजों ने अपनी संपत्ति का विवरण नहीं दिया है। इतना ही नहीं सीजेआई ऑफिस को आरटीआई के दायरे में लाने वाले पांच जजों में से तीन के नाम वेबसाइट में नहीं हैं। ‘न्यायाधीशों की संपत्ति’ नाम से सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में 34 न्यायाधीशों में से सात के ही नाम शामिल हैं। इन सात लोगों में सीजेआई गोगोई और न्यायमूर्ति एनवी रमन का नाम शामिल है। इनके अलावा ये फैसला सुनने वाले संविधान पीठ के बाकी जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता, और जस्टिस संजीव खन्ना का नाम इस लिस्ट में नहीं है।

बता दें सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 124 के तहत इस फैसले को लिया। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के द्वारा 2010 में दिए गए फैसले को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में तीन फैसले पारित किए, जिसमें से एक प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना व दीपक गुप्ता ने पारित किया और दो अलग-अलग आदेश न्यायमूर्ति एन.वी.रमन और डी.वाई चंद्रचूड़ ने पारित किया।

अदालत ने कहा, “पारदर्शिता और जवाबदेही को साथ-साथ चलना चाहिए और प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के दायरे में है।” न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, “पारदर्शिता न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करता है।” इस निर्णय के जरिए, सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष अदालत के महासचिव की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाने के फैसले का विरोध किया था।

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