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क्यों चुनौती बना गया है ‘लाल गलियारा’

तीन अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बीजापुर-सुकमा में हुए नक्सली हमले में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। साल 2021 में यह अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला था।

Naxal(बाएं) डीएम अवस्थी पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़ ! (दाएं) बीकेएस रे, पूर्व गृह सचिव, छत्तीसगढ़ !

तीन अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बीजापुर-सुकमा में हुए नक्सली हमले में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। साल 2021 में यह अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला था। इसके साथ ही एक बार फिर नक्सली हिंसा और उसकी चुनौतियों को लेकर बहस छिड़ गई है। बस्तर के इलाके को ‘लाल गलियारा’ कहा जाता है।

यह इलाका नक्सलियों का गढ़ होने के कारण सुरक्षा बलों के अभियानों में इसे केंद्र माना जाता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 305 किलोमीटर दूर दक्षिण में बस्तर जिला है। छह हजार से भी ज्यादा वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके में लगभग दो हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका नक्सलियों के कब्जे में है। प्रशासनिक कारणों से 1999 में इसमें से दो अलग जिले- कांकेर और दंतेवाड़ा बनाए गए। ये जिले भी नक्सल प्रभावित हैं।

घना जंगल और राज्यों की सीमा

छत्तीसगढ़ का बस्तर डिवीजन घने जंगलों में लगभग 39 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसमें से 20 हजार वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा का इलाका नक्सलियों का प्रभाव वाला है। इस इलाके में पुलिस-प्रशासन की उपस्थिति नहीं के बराबर है। नक्सलियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह होने के साथ-साथ यह इलाका अन्य राज्यों से लगा हुआ भी है- ओड़ीशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश तक। नक्सली यहां वारदात को अंजाम देकर कारर्वाई से बचने के लिए दूसरे राज्यों का रुख कर लेते हैं।

छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा, राज्य के अंतिम छोर पर बसे इलाके हैं और इन्हीं दो जिलों की सरहद पर बसा हुआ है टेकलागुड़ा गांव, जहां मुठभेड़ हुई। असल में माओवादियों का गढ़ कहे जाने वाला इस इलाके में माओवादियों के बटालियन नंबर वन का दबदबा है। इस बटालियन के कमांडर माड़वी हिड़मा को लेकर कई किस्से हैं।

90 के दशक में माओवादी संगठन से जुड़े माडवी हिड़मा उर्फ संतोष उर्फ इंदमूल उर्फ पोड़ियाम भीमा उर्फ मनीष के बारे में कहा जाता है कि 2010 में ताड़मेटला में 76 जवानों की हत्या के बाद उसे संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद झीरम घाटी का मास्टर माइंड भी इसी हिड़मा को बताया गया। इस पर 35 लाख रुपए का इनाम है।

आदिवासियों में पैठ का सवाल

आदिवासियों के बीच पैठ बनाने के लिए नक्सलियों ने भ्रष्टाचार को हथियार बनाया। उनकी जन अदालतों का प्रभाव आदिवासी इलाकों में है। साथ ही नक्सलियों में बड़ी संख्या आदिवासियों की भी है। इस वजह से ग्रामीणों को मजबूरी में ही सही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से नक्सलियों का सहयोग करना पड़ता है।

आए दिन नक्सली मुखबिरी के शक में ग्रामीणों की हत्या करते रहते हैं। इस वजह से ग्रामीणों के बीच भय का माहौल है और वे सुरक्षाबलों का सहयोग करने से डरते हैं। अक्सर स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों-सीआरपीएफ आदि के बीच तालमेल की कमी का भी सवाल उठता है। किसी भी लिाके में तैनात केंद्रीय बलों के जवान उस इलाके से उस कदर परिचित नहीं होते, जितना कि स्थानीय पुलिस।

कई बार केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान स्थानीय पुलिस को साथ नहीं लेने के कारण नक्सलियों के जाल में फंस जाते हैं। चुनौती नक्सलियों का तकनीक के मामले में आगे होना भी है। उनके हथियार आधुनिक हैं। हमलावर नक्सली देखने में गरीब लगते हैं, लेकिन इन्हें मदद पहुंचाने वालों का तंत्र बड़ा है। आला अधिकारियों का कहना है कि सरकार उनके तंत्र को तोड़ रही है और सुरक्षा बल नक्सलियों से सीधी लड़ाई कर उन्हें खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं।

विकास परियोजनाओं का विरोध

बस्तर इलाके में सड़क और संचार की सुविधा नहीं है। नक्सली यहां विकास कार्यों का विरोध करते रहे हैं। आए दिन सरकारी परियोजनाओं में लगी मशीनों को नक्सली जला देते हैं और ठेकेदारों की हत्या कर देते हैं। संचार की सुविधा भी नहीं है। 2015 में सरकार ने दूरदराज के इलाकों के विकास कार्यों का जायजा लेने के लिए प्रगति प्रोजेक्ट शुरू किया था। इसके तहत नए स्कूल, भवन, सड़कें बनी हैं।

बरसों से जिन इलाकों में नक्सलियों का कब्जा था, वहां सड़क बन गई है, लेकिन नक्सली अक्सर सड़क और स्कूल को बम से उड़ा देते हैं। हाल के मुठभेड़ से कुछ दिन पहले ही उस इलाके में सड़क का काफी बड़ा हिस्सा इन लोगों ने काट दिया था। तर्रेम, जहां पर यह मुठभेड़ हुई, वहां भी हाल ही में सुरक्षा बलों का शिविर बनाया गया था। इसके आगे एक सिलगेर जगह है, वहां भी नया शिविर बन रहा है। नए शिविर बनने से नक्सलियों में बौखलाहट दिखती है, क्योंकि शिविर बन जाने से वहां, सड़क, स्कूल या फिर बिजली पहुंचाने में दिक्कत नहीं होती।

क्या कहते
हैं जानकार

आदिवासी गांवों में लोग सुरक्षाबलों पर अब भरोसा करने लगे हैं। इसका प्रमाण है सीआरपीएफ के शिविर काफी अंदर तक बनने लगे हैं। जहां-जहां सुरक्षाबल पहुंच जाते हैं, वहां विकास कार्य भी होने लगते हैं। गांववालों के बीच सुरक्षाबलों की मददगार वाली छवि है।
– डीएम अवस्थी
पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़

माओवादी एक के बाद एक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। सरकार के पास माओवाद को लेकर कोई नीति नहीं है। सरकार की नीति यही है कि हर बड़ी माओवादी घटना के बाद बयान जारी कर दिया जाता है कि जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। कोई नीति होगी तब तो उस पर क्रियान्वयन होगा।
– बीकेएस रे, पूर्व गृह सचिव, छत्तीसगढ़

अभियानगत योजना पर सवाल

कई दफा नक्सल प्रभावित इलाकों में बड़े अधिकारियों के पहुंचने के बाद नक्सली अपनी पकड़ जताने की कोशिश करते हैं। हाल के हमले से 20 दिन पहले केंद्र के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार व सीआरपीएफ के पूर्व प्रमुख के विजय कुमार एवं महानिरीक्षक (अभियान) नलिन प्रभात पिछले 20 दिनों से जगदलपुर, रायपुर व बीजापुर के क्षेत्रों में खुद मौजूद थे। एक ही इलाके में बड़े अधिकारियों की मौजूदगी नक्सलियों को भी सतर्क कर देती है। बताया जा रहा है कि बीजापुर नक्सली हमले में भी यही हुआ।
दूसरे, बीजापुर के नक्सली हमले से पहले ड्रोन से मिली फोटो और वीडियो के आधार पर यहां अभियान की योजना बनाई गई। वहां सौ नक्सलियों का झुंड दिखा था। लेकिन स्थानीय स्तर सूत्रों द्वारा (ह्यूमन इंटेलिजेंस) सूचनाएं नहीं मिल सकीं।

ऐसे में करीब सात सौ जवानों को नक्सलियों ने बीजापुर के तर्रेम इलाके में जोनागुड़ा पहाड़ियों के पास घेर लिया था। जानकारों का कहना है कि छत्तीसगढ़ के गोरिल्ला युद्धक्षेत्र जैसे बन गए इलाकों में सुरक्षाबल लंबे समय तक एक ही रणनीति के साथ सफलता हासिल नहीं कर सकते। यहां पर किसी एक रणनीति पर चलते रहना जवानों के लिए घातक हो सकता है। जरूरत लगातार रणनीतिक बदलाव करते रहने की है। नक्सली ऐसे ही करते हैं। इलाके की भौगोलिक स्थिति (टोपोग्राफी) और मांग के हिसाब से अभियान की योजना बनाने पर अरसे से जोर दिया जा रहा है।

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