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जनसत्ता विशेष: सूक्ष्मजैव विज्ञानी बन करें संक्रामक बीमारियों का इलाज

सूक्ष्म जीवों की मदद से ही दवाओं का निर्माण किया जाता है। एंथ्रेक्स और सार्स जैसी खतरनाक बीमारियां भी इन सूक्ष्मजीवों की ही देन है। विषाणुओं से होने वाले हानि और लाभ के अलावा संरचना और वातावरण में इनकी भूमिका पर भी सूक्ष्मजैविकी में अध्ययन किया जाता है। कृषि एवं औद्योगिक विकास में उनके उपयोग का भी अध्ययन किया जाता है। सूक्ष्मजैव विज्ञानी बीमारियों की वजह जानने का प्रयास करते हैं और बीमारियों की रोकथाम के लिए दवाइयों का विकास करते हैं।

Author Published on: April 9, 2020 12:38 AM
सूक्ष्म जीवों के अध्ययन से काफी लाभ होता है।

आज पूरी दुनिया कोरोना विषाणु संक्रमण के संकट में हैं। दुनिया भर के सूक्ष्मजैव विज्ञानी कोरोना विषाणु को जानने, समझने और इसके इलाज को ढूंढ़ने में लगे हैं। सूक्ष्मजैविकी के विशेषज्ञों की बदौलत ही हमारी दुनिया कई महामारियों से बची है जिनमें जीका विषाणु, स्वाइन फ्लू, एचआइवी आदि प्रमुख हैं।

सूक्ष्मजैविकी उन सूक्ष्मजीवों का गहन अध्ययन है, जो एककोशिकीय या सूक्ष्मदर्शीय कोशिका समूह जंतु होते हैं। सूक्ष्मजैविकी बहुत विस्तृत विज्ञान है, इसलिए इसमें विषाणु विज्ञान, कवक विज्ञान, परजीवी विज्ञान, जीवाणु विज्ञान और कई अन्य शाखाएं शामिल हैं।

जीवविज्ञान और रसायन विज्ञान के मेल से बना यह विषय न केवल दिलचस्प है बल्कि प्रतिदिन की जरूरतों से जुड़ा होने के कारण बहुत उपयोगी भी है। यही वजह है कि आज इस विषय को बहुत पसंद किया जा रहा है और इसमें रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध हैं। अभी तक मनुष्य ने पृथ्वी पर मौजूद सूक्ष्मजीवों में से केवल एक फीसद का ही अध्ययन किया है और जीव विज्ञान की अन्य शाखाओं, जैसे जंतु विज्ञान या पादप विज्ञान की अपेक्षा सूक्ष्मजैविकी अपने शुरुआती चरण में है। इसलिए यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र में करिअर के कितने उजले अवसर हैं।
वर्तमान समय में सूक्ष्मजैव विज्ञानियों की आवश्यकता कई स्तरों पर होती है।

जिस तरह से दुनिया भर में नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं, उसे देखते हुए कई सूक्ष्म जीवाणु या विषाणु अर्थात बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं का अब भी पता लगाया जाना बाकी है। इसलिए इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है। सूक्ष्मजैविकी विशेषज्ञ सूक्ष्म जीवों के इंसानों, पौधों और जानवरों पर पड़ने वाले सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों के बारे में अध्ययन करते हैं। इसके अलावा जीन थेरेपी तकनीक के माध्यम से वे इंसानों में होने वाले कैंसर जैसे दूसरे जेनेटिक बदलावों के बारे में भी पता लगाते हैं और उनका इलाज खोजते हैं।

सूक्ष्म जीवों की मदद से ही दवाओं का निर्माण किया जाता है। एंथ्रेक्स और सार्स जैसी खतरनाक बीमारियां भी इन सूक्ष्मजीवों की ही देन है। विषाणुओं से होने वाले हानि और लाभ के अलावा संरचना और वातावरण में इनकी भूमिका पर भी सूक्ष्मजैविकी में अध्ययन किया जाता है। कृषि एवं औद्योगिक विकास में उनके उपयोग का भी अध्ययन किया जाता है। सूक्ष्मजैव विज्ञानी बीमारियों की वजह जानने का प्रयास करते हैं और बीमारियों की रोकथाम के लिए दवाइयों का विकास करते हैं।

सूक्ष्मजैविकी एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें विशेषज्ञता हासिल करने के बाद ही चमकीला करिअर बनाया जा सकता है। सूक्ष्मजैविकी का उपयोग स्वास्थ्य, पर्यावरण, सेवाओं और कृषि जैसे कई क्षेत्रों में होता है और सबसे महत्त्वपूर्ण बात इस क्षेत्र से जुड़ी यह है कि अगर आप में अनुसंधान करने की प्रवृत्ति है तो यह करिअर आपके लिए ही बना है। सूक्ष्मजैविकी के तहत फिजियोलॉजी आफ माइक्रोब्स, जीवाणुओं की जैविक संरचना, कृषि सूक्ष्मजैविकी, खाद्य सूक्ष्मजैविकी, पर्यावरण, बायोफर्टिलाइजर में जीवाणु, कीटनाशक, मानवीय बीमारियों आदि में सूक्ष्म जीवों का गहन अध्ययन किया जाता है।

सूक्ष्मजैविकी के लिए विद्यार्थियों को भौतिकी, रसायन, गणित या जीवविज्ञान के साथ 12वीं उत्तीर्ण होना चाहिए। जीवविज्ञान विषय से 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद सूक्ष्मजैविकी के विभिन्न पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया जा सकता है। इनमें बीएससी माइक्रोबायोलॉजी, बीएससी इंडस्ट्रीयल व बीएससी आनर्स इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी, बीएससी मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी, एमएससी व एमएससी आॅनर्स माइक्रोबायोलॉजी, एमएससी मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी आदि प्रमुख हैं। वहीं, स्नातकोत्तर करने के लिए सूक्ष्मजैविकी या लाइफ साइंस में स्नातक डिग्री जरूरी है। सूक्ष्मजैविकी में विशेषज्ञता प्राप्त करने के पाठ्यक्रम भी उपलब्ध हैं जैसे अप्लायड माइक्रोबायोलॉजी, चिकित्सकीय सूक्ष्मजैविकी, क्लीनिकल रिसर्च, बायोइंफॉर्मेटिक्स, मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, फोरेंसिक साइंस आदि। जो लोग स्वतंत्र रूप से अनुसंधान करना चाहते हैं, वे पीएचडी करने के बाद ऐसा कर सकते हैं।

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