Bankipur By Poll Results Analysis: वर्तंमान राजनीति में किसने सोचा होगा कि ममता बनर्जी से पश्चिम बंगाल छीनने और उनकी TMC में बड़ी फूट होने के बाद और उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी में एक बार फिर विभाजन होने के बाद बीजेपी इतना बड़ा कदम उठाएगी कि दिल्ली के जंतर मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन के चलते अपने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लेगी। ये ऐसा वक्त था कि जब एनडीए गठबंधन संसद में दो तिहाई बहुमत पारित हासिल करने के बेहद करीब पहुंच गया था।

इसी तरह किसने ये सोचा होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाले एनडीए गठबंधन के तहत पाटलिपुत्र की गद्दी पर बैठे बीजेपी के पहले सीएम सम्राट चौधरी के राज में वह अपना सबसे सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्र यानी बांकीपुर बुरी तरह हार जाएगी, जबकि पिछले लगभग तीन दशकों से इस सीट पर बीजेपी का ही कब्जा था।

बांकीपुर सीट थी बीजेपी का दुर्ग

असल बात यह है कि हर राज्य में उपचुनाव आमतौर पर सत्ताधारी पार्टी के लिए आसान जीत साबित होते हैं। इस मामले में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने पिछले नवंबर में ही 243 सदस्यीय विधानसभा में 202 सीटें जीती थीं। इतना ही नहीं, बांकीपुर सीट भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का गढ़ मानी जाती है, जिन्होंने 2006 से लगातार पांच बार यह सीट जीती है। नितिन नवीन से पहले यह सीट उनके दिवंगत पिता नबीन किशोर सिन्हा के पास 1995 से 2006 में उनकी मृत्यु तक थी।

दरअसल, उपचुनाव इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि नितिन नवीन ने बीजेपी अध्यक्ष बनने और इस साल की शुरुआत में राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद यह सीट खाली कर दी थी, जिसे उन्होंने विधानसभा चुनाव में लगभग 52,000 वोटों से जीता था।

प्रशांत किशोर ने बना दिया था जनमत संग्रह

बीजेपी के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहली बार चुनावी मुकाबले का सामना कर रहे थे, जो कि बांकीपुर की विधानसभा सीट का उपचुनाव है। आम तौर पर यह उम्मीद की जा रही थी कि वह इसे जीतने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे, क्योंकि मुख्य प्रतिद्वंद्वी, जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने इस मुकाबले को उनके नेतृत्व पर एक “जनमत संग्रह” बना दिया था ।

सम्राट चौधरी के कुशवाहा नेता होने के नाते यह उम्मीद की जा रही थी कि वे अपने दिवंगत पिता, समाजवादी नेता शकुनी चौधरी द्वारा नीतीश कुमार के साथ मिलकर 1990 के दशक में ओबीसी समूहों में यादवों के वर्चस्व का मुकाबला करने के लिए स्थापित लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) गठबंधन को मजबूत करेंगे, लेकिन बांकीपुर विधानसभा सीट पर मिली हार के चलते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और बीजेपी को बड़ा झटका लगा है।

बांकीपुर के चुनावी नतीजे बना सकते हैं माहौल

बांकीपुर सीट पर काबिज बीजेपी के खिलाफ असंतोष, प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी की अस्वीकृति की वजह से, जनता ने नए प्रयोग करने निकले चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर को जनादेश मिला। हालांकि उनकी जनसुराज पार्टी 2025 के विधानसभा चुनाव में 238 सीटों पर लड़ने के बावजूद एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी। बांकीपुर का परिणाम बिहार से परे भी एक बड़े बदलाव का संकेत दे सकता है, जो देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी बदलते माहौल को दर्शाता है। ऐसी स्थिति का विश्लेषण करना काफी दिलचस्प हो सकता है। पटना में बीजेपी की सत्ता अभी भी मजबूत है और उसके कार्यकाल में अभी लगभग साढ़े चार साल शेष हैं, इसलिए उससे सुधारात्मक कदम उठाने की उम्मीद की जा सकती है।

बांकीपुर बिहार का एक विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्र नहीं है। यह एक पूर्णतः शहरी क्षेत्र है, जिसे पहले पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता था, लेकिन यह गांधी मैदान जैसे ऐतिहासिक स्थलों से भी जुड़ा हुआ है, जहां कई राजनीतिक आंदोलनों का जन्म हुआ, जिन्होंने न केवल बिहार के भविष्य को बल्कि कभी-कभी भारत के भविष्य को भी आकार दिया। 1970 के दशक के मध्य में जेपी आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। बांकीपुर विचारों की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता रहा है, क्योंकि यहां शिक्षित, उच्च जाति के समूहों, विशेष रूप से कायस्थों का वर्चस्व है, जो नौकरशाह और पेशेवर हैं और हाल ही में हुए NEET परीक्षा लीक विवाद से प्रभावित भी हुए ही होंगे।

बीजेपी के लिए खास संदेश

बीजेपी के लिए बांकीपुर से आ रहे संदेश बिल्कुल स्पष्ट हैं। कई बीजेपी नेता और एनडीए सहयोगी निजी तौर पर यह बता रहे हैं कि क्या गलत हुआ; लोगों ने “सत्ता के अहंकार” के खिलाफ प्रतिक्रिया दी है और पार्टी को झटका देना चाहते थे। बीजेपी खेमे से कथित तौर पर यह टिप्पणी आई थी कि पार्टी द्वारा मैदान में उतारा गया ‘कुत्ता-बिल्ली’ भी बांकीपुर से जीत जाएगा, जिसे प्रशांत किशोर ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान नारे के रूप में इस्तेमाल किया।

बांकीपुर का परिणाम इस बात का संकेत हो सकता है कि बीजेपी का मुख्य समर्थक आधार यानी उच्च जातियां उससे निराश हो रही हैं। यह इस साल की शुरुआत में तब स्पष्ट हुआ जब सामान्य वर्ग के कुछ वर्गों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में यूजीसी के समानता मानदंडों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, क्योंकि उनका मानना ​​था कि ये मानदंड ओबीसी के पक्ष में झुके हुए हैं।

सामान्य वर्ग की नाराजगी

इसके बाद कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ (पीयूएसयू) के चुनावों में अध्यक्ष पद जीता। भोजपुर में कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ में 28 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता भरत तिवारी की हत्या ने राज्य में व्यापक आक्रोश पैदा कर दिया। सबसे बढ़कर अयोध्या में राम मंदिर के लिए दान की गई धनराशि में हुई चंदा चोरी ने कई हिंदुओं को और खासकर सामान्य वर्ग जातियों को नाराज किया, जो कि लगातार मंदिर मुद्दे पर बीजेपी का समर्थन कर रहे थे।

प्रशांत किशोर ने भले ही जनरेशन Z को कम महत्व दिया हो लेकिन इसका एक अहम पहलू Gen Z भी है। भारत की कुल जनसंख्या में Gen Z की हिस्सेदारी लगभग 26% है, जबकि बिहार की जनसंख्या में इसकी हिस्सेदारी 29% से अधिक है। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए युवा आंदोलन का असर देश के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिला, इसके चलते बिहार भर में छात्र विरोध प्रदर्शन हुए। बिहार में पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों पर AK-47 राइफल से फायरिंग करने की घटना ने एक बड़ा बवाल खड़ा कर दिया।

सबसे अहम प्रशांत किशोर फैक्टर

प्रशांत किशोर फ्रैक्टर की बात करें तो उन्हें आम तौर पर लोग पीके के नाम से जानते हैं। पर्दे के पीछे की रणनीति में माहिर पीके ने 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की जीत और नीतीश, कैप्टन अमरिंदर सिंह, ममता, जगन मोहन रेड्डी जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों की जीत में अहम भूमिका निभाई थी। वह बांकीपुर में खुद चुनावी मैदान में उतरे थे। 2 अक्टूबर 2024 को जेएसपी की शुरुआत से पहले, उन्होंने बिहार भर में दो साल की पदयात्रा की थी।

प्रशांत किशोर द्वारा शिक्षा, रोजगार और प्रवासन पर ध्यान केंद्रित करने और जाति एवं सांप्रदायिक राजनीति से ऊपर उठने के प्रयासों के बावजूद 2025 के चुनावों में उनकी जनसुराज को करारी हार का सामना करना पड़ा था। इसके चलते ही बांकीपुर के कुछ मतदाताओं में शायद बेचैनी थी। उन्होंने जमीनी स्तर पर भी काफी मेहनत की, घर-घर जाकर प्रचार किया और आम लोगों से कहा, “आपका वोट अनमोल है और आप अपने बच्चे के भविष्य में बदलाव ला सकते हैं।” पीके की इन बातों ने लोगों के दिलों को छू लिया। कई युवा यादव भी आरजेडी की तुलना में पीके को ज्यादा पसंद करते थे और राज्य के विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव को इस बात की चिंता करनी चाहिए।

हालांकि किशोर जेएसपी के इकलौते विधायक होंगे, लेकिन उनसे सदन में महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने, एनडीए सरकार को सतर्क रखने और साथ ही 2030 के विधानसभा चुनावों के लिए अपनी पार्टी को मजबूत करने की उम्मीद है।

नीतीश कुमार फैक्टर भी अहम

बांकीपुर की घटना बिहार में नीतीश युग के अंत का प्रतीक है। क्या किशोर नीतीश के उत्तराधिकारी के रूप में उभर पाते यदि दोनों के बीच मतभेद न होते? संभवतः जेडीयू प्रमुख ने शुरू में उन्हें इसी नजरिए से देखा होगा। वर्तमान, स्वास्थ्य समस्याओं के चलते नीतीश के राज्यसभा चले जाने के बाद, जेडीयू बिखरी हुई प्रतीत होती है। ऐसी खबरें थीं कि बांकीपुर में नीतीश के मुख्यमंत्री पद से हटने से नाखुश कई कुर्मी समुदाय के लोगों ने पीके पार्टी को वोट दिया था।

महत्वपूर्ण बात यह है कि बांकीपुर के नतीजों के ठीक एक दिन बाद ही प्रधानमंत्री को संसद में नीतीश के साथ फोटो खिंचवाते देखा गया। बांकीपुर ने यह दिखाया है कि नीतीश द्वारा तैयार किया गया उच्च जातियों और ओबीसी/ईबीसी (और महादलितों और पसमांदा मुसलमानों) का सामाजिक गठबंधन अब कमजोर पड़ सकता है, जबकि इसने ही लंबे वक्त तक बीजेपी-जेडी(यू) गठबंधन को बार-बार सत्ता तक पहुंचाया है।

इससे नए गठबंधन बन सकते हैं और नए चेहरे उभर सकते हैं, जिनमें किशोर सबसे प्रमुख चेहरा हैं। आगामी चुनावों में बीजेपी द्वारा युवा उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की पूरी कोशिश की जा सकती है। नया नेतृत्व शायद अतीत की तरह लंबे सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों के माध्यम से नहीं, बल्कि इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चलाए गए आंदोलनों के माध्यम से उभरेगा।

सीजेपी के मामले में यही देखने को मिला, जिसने कुछ ही हफ्तों में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं, जो अतीत में अकल्पनीय था। यह संकेत देता है कि हम एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर रहे हैं, और बांकीपुर उस बदलाव का प्रतीक बन सकता है।

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बांकीपुर उपचुनाव की हार ने भाजपा हाईकमान को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। पार्टी की समीक्षा रिपोर्ट में हार की सबसे बड़ी वजह जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के नैरेटिव का जवाब नहीं दे पाना बताया गया है यानी किशोर के नैरेटिव का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में विफल होना। हालांकि, भाजपा ने साफ किया है कि वह इस हार को लेकर किसी पर कोई कार्रवाई नहीं करेगी। पढ़िए पूरी खबर…