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वंदेमातरम की गूंज से परेशान हो गए थे अंग्रेज, लेखन की वजह से बंकिमचंद्र को नहीं मिला था प्रमोशन

वंदे मातरम गीत बंकिम चन्‍द्र चटर्जी द्वारा संस्‍कृत में रचा गया है। यह स्‍वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणास्रोत गीत था।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: April 8, 2021 1:27 PM
Bankim Chandra, Vande Mataramवंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी। (एक्सप्रेस फोटो)

भारत के राष्ट्रगीत वंदेमातरम के रचयिता और बंगाल के लोकप्रिय उपन्यासकार बंकिम चंद्र चटर्जी की आज पुण्यतिथि है। 27 जून 1838 को कोलकाता में जन्में चटर्जी का 8 अप्रैल 1894 को कोलकाता में ही निधन हुआ था। आज देशभर के सभी बड़े नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। कला के जरिए विदेशी शासन के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले चटर्जी को अपनी इसी क्रांति की वजह से नौकरी तक में प्रमोशन तक नहीं मिला था, लेकिन उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष नहीं रोका।

चटर्जी को वंदे मातरम के जरिए असंख्य देशवासियों में स्वाधीनता की अलख जगाने वाले महान देशभक्त के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने जीवनभर बंगाली भाषा व संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम किया। चटर्जी ने जब नौकरी के समय लेखन किया, तो उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी। अंग्रेज अफसर लगातार काम में बाधा डालने की कोशिश करते रहे।

बंकिम चंद्र चटर्जी सजग अधिकारी थे। वे अंग्रेजों के सामने कभी झुके नहीं। वे निर्भीक थे और देशभक्त भी थे, जिससे अंग्रेज उनसे नाराज रहते थे। कदम-कदम पर उनका अंग्रेजों से संघर्ष होता था। इसका असर यह हुआ कि काफी मेहनत के बावजूद चटर्जी कभी किसी बड़े ओहदे तक नहीं पहुंच पाए।

बताया जाता है कि इसके चलते बंकिम चंद्र 53 साल की उम्र में ही सेवानिवृत्त होना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा होने नहीं दिया। उनकी मंशा कुछ और थी। हालांकि, किसी तरह बंकिम चंद्र सेवानिवृत्त होने में सफल रहे और लेखन का काम जारी रखा। इसके बाद उनकी मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई और चटर्जी के ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष को एक नई दिशा मिली थी।

वंदे मातरम को स्वतंत्रता सेनानियों ने दी पहचान: वंदे मातरम गीत बंकिम चन्‍द्र चटर्जी द्वारा संस्‍कृत में रचा गया है। यह स्‍वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्ररेणा का स्रोत था। इसका स्‍थान जन गण मन के बराबर है। इसे पहली बार 1896 में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के सत्र में गाया गया था। इसके बाद वंदे मातरम की लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।

1920 तक सुब्रमण्यम भारती के साथ कई विद्वानों ने इस गीत का अलग-अलग भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी कर दिया था। इसके बाद वंदे मातरम को राष्ट्रगीत की पहचान मिल गई। यहां तक कि लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस जर्नल का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम भी वंदे मातरम रखा गया था।

नहीं मिल पाया राष्ट्रगान का दर्जा: वंदे मातरम की गूंज ने अंग्रेजों को हमेशा ही परेशान किया। उनके इस गीत की वजह से आजादी के लिए पूरा भारत आंदोलित हो उठा था। वे किसी तरह इस गान को रोकना चाह रहे थे। अंग्रेजों की शह पर इस गीत पर विवाद खड़ा किया गया। हालांकि, देश-विदेश में भारत की आजादी की अलख जगाने वाला गीत राष्ट्रगान का दर्जा नहीं पा पाया।

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