West Bengal News: अपनी लेखनी को लेकर हुए हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के बाद कोलकाता छोड़ने पर मजबूर होने के लगभग 20 साल बाद बांग्लादेश में जन्मीं स्वीडिश लेखिका तसलीमा नसरीन 1 अगस्त को एक साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए शहर लौट रही हैं।

शहर के रवींद्र सदन सभागार में तस्लीमा नसरीन के कार्यक्रम का आयोजन तीन संगठनों की ओर से किया जा रहा है। इसमें पहला तो सेकुलर मिशन, पश्चिम बंगाल के लिए बंगाल जन आंदोलन और ह्यूमन राइट्स बियॉन्ड फ्रंटियर्स। आयोजकों ने बताया कि सीएम शुभेंदु अधिकारी और प्रख्यात लेखक शिर्शेंदु मुखोपाध्याय के भी इस कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद है।

कितने संगठनों ने आयोजित किया कार्यक्रम?

पश्चिमबोंगर जोन्नो के मोहित रॉय ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “इस कार्यक्रम का आयोजन हमारे संगठन सहित तीन संगठनों द्वारा किया जा रहा है। इसमें नसरीन की कविताएं और गीत प्रस्तुत किए जाएंगे। मुख्यमंत्री भी उपस्थित रहेंगे।”

सेकुलर मिशन के उस्मान मल्लिक ने कहा, “बंगाल को भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जाना जाता है। कट्टरपंथी विरोध प्रदर्शनों के कारण नसरीन को यहां से जाना पड़ा, जिससे हमें बहुत दुख हुआ। पिछली सरकार के दौरान हमने उनकी यात्रा आयोजित करने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो सके। इस बार हमने अधिकारी से संपर्क किया, जिन्होंने हमें आश्वासन दिया कि उचित सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी।”

उन्होंने आगे कहा, “फिर हमने लेखिका से संपर्क किया और वे कोलकाता आने और कार्यक्रम में भाग लेने के लिए सहमत हो गईं। वे अपने निर्वासन के वर्षों के बारे में बात करेंगी, उन परिस्थितियों का वर्णन करेंगी जिनके कारण उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा और अपनी कविताएं पढ़ेंगी।”

कहां पर रहती हैं तस्लीमा नसरीन?

फिलहाल न्यूयॉर्क में रह रहीं नसरीन 2007 के बाद पहली बार कोलकाता लौट रही हैं। 2007 में उनकी किताब ‘द्विखंडितो’ के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों के कारण उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था। बांग्लादेश में जन्मीं नसरीन दशकों से अपनी लेखनी को लेकर विवादों के केंद्र में रही हैं। उन्होंने बांग्ला भाषा में 40 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। इनमें कविताएं, उपन्यास, निबंध और कई आत्मकथा शामिल है। उनकी रचनाओं का अनुवाद 30 से ज्यादा भाषाओं में हो चुका है।

नसरीन की लेखनी मुख्य रूप से महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता, पितृसत्तात्मक मान्यताओं को चुनौती देने और महिलाओं द्वारा झेली जाने वाली घरेलू हिंसा को उजागर करने पर केंद्रित है। 1993 में प्रकाशित उनके सबसे मशहूर उपन्यास ‘लज्जा’ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। यह किताब भारत में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद बांग्लादेश में एक हिंदू परिवार पर हुए अत्याचारों की कहानी बताती है।

नसरीन ने स्वीडन की नागरिकता ले ली

धमकियों और विरोध का सामना करते हुए नसरीन 1994 में बांग्लादेश छोड़कर यूरोप और उत्तरी अमेरिका में निर्वासित जीवन जीने लगीं। बाद में उन्होंने स्वीडन की नागरिकता ले ली और जर्मनी में भी कुछ समय बिताया। 1998 में, उन्होंने अपनी आत्मकथा का पहला भाग ‘मेयेबेला’ प्रकाशित किया।

2004 में नसरीन को केंद्र सरकार से रिन्यू होने वाला अस्थायी रेजिडेंस परमिट मिला और वह कोलकाता चली गईं, जहां वह बंगाली अखबारों के लिए नियमित रूप से कॉलम लिखती थीं। जून 2006 में, कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के तत्कालीन इमाम सैयद नूर-उर-रहमान बरकती ने नसरीन का चेहरा काला करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए इनाम की घोषणा की। कई संगठनों ने उनके देश छोड़ने की मांग भी की।

2007 में नसरीन के खिलाफ कोलकाता में हुए विरोध प्रदर्शन

नवंबर 2007 में कोलकाता में लेखिका के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए। ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम की ओर से आयोजित प्रदर्शनों की वजह से शहर के कुछ हिस्सों में सड़कें जाम हुईं और आगजनी की घटनाएं हुईं। उस समय मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली लेफ्ट फ्रंट सरकार को शांति बहाल करने के लिए सेना बुलानी पड़ी।

इसके बाद नसरीन कोलकाता छोड़कर नई दिल्ली में एक अज्ञात जगह पर सात महीने से ज्यादा समय तक रहीं और आखिरकार मार्च 2008 में देश छोड़कर चली गईं।

यह भी पढ़ें: ‘जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’, बांग्लादेश चुनाव के बीच बोलीं तसलीमा नसरीन

बांग्लादेश में आज आम चुनाव के लिए 299 सीटों पर वोटिंग हो रही है। इस बीच प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन ने वहां की राजनीतिक स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि अगर जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आ जाती है, तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। धर्मतंत्र हावी हो जाएगा और सब कुछ नष्ट कर देगा। अल्पसंख्यकों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा और उन्हें देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…