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यूपी की दो मस्‍ज‍िदों में लाउडस्‍पीकर पर बैन बरकरार, हाईकोर्ट ने कहा- कोई मजहब इसकी जरूरत नहीं बताता

कोर्ट ने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाले प्रशासनिक आदेश को बरकरार रखा है।

सार्वजनिक स्थलों पर लाउडस्पीकर बजाने के लिए प्रशासन से लिखित में अनुमति लेने का प्रावधान है। फोटो: PTI

इलाहबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को दो मस्जिदों पर लाउडस्पीकर पर बैन को बरकरार रखने का फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने फैसले पर कहा कि कोई मजहब इसकी जरूरत नहीं बताता। ये दोनों मस्जिदें यूपी के जौनपुर जिले के बद्दोपुर और शाहगंज गांवों में स्थित हैं। कोर्ट ने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगाने के प्रशासनिक आदेश को बरकरार रखा है।

न्यायमूर्ति पंकज मिठल और न्यायमूर्ति वीसी दीक्षित की खंडपीठ ने मसूर अहमद और जौनपुर के निवासी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा ‘कोई मजहब लाउडस्पीकर से प्रार्थना करने की जरूरत को नहीं बताता। अगर इस तरह से प्रार्थना की भी जा रही है तो इससे दूसरों के अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। किसी को भी इससे परेशानी नहीं होनी चाहिए।

एसडीएम ने बीते साल जुलाई 2018 में मस्जिद अबू बकर सिद्दीकी और मस्जिद रहमानी में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। प्रशासन का कहना था कि लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर किसी भी तरह की अनुमति नहीं ली गई थी। वहीं टाइम्स नाऊ से बातचीत में कोर्ट के फैसले पर इलाके के निवासी ने कहा ‘जब योगी आदित्यनाथ सत्ता में आए तो उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के लिए सबसे पहले सरकार से अनुमति लेनी होगी। अनुमति लेने के बाद ही कोई भी लाउडस्पीकर का इस्तेमाल कर सकेगा। अमुनति लेने के बावजूद दोनों मस्जिदों को लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं करने दिया जा रहा है।’

बता दें कि लाउडस्पीकर अथवा सार्वजनिक स्थलों पर यंत्र बजाने के लिए प्रशासन से लिखित में अनुमति लेने का प्रावधान है। इसी रोक को हटाने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचियों का कहना था कि मस्जिदों में रोजाना दो मिनट के लिए इन उपकरणों के इस्तेमाल की अनुमति चाहते हैं। याचियों ने इसके पीछे तर्क दिया कि याचियों का कहना था कि बढ़ती आबादी की वजह से लोगों को लाउडस्पीकर के जरिये नमाज के लिए बुलाना जरूरी है।

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