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बाबरी मस्जिद: इन वजहों से नरसिम्हा राव ने यूपी में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया

20 नवंबर, 1992 को सीसीपीए की मीटिंग में साफ हो गया कि नरसिम्हा राव के अलावा उनकी कैबिनेट के बाकी लोग भी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने पर सहमत नहीं थे। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सेनेगल की यात्रा पर थे। इसलिए उन्होंने अपनी गैरहाजिरी में एसबी चह्वान, अर्जुन सिंह और शरद पवार को यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू करने का जिम्मा सौंप रखा था। लेकिन, इन लोगों ने ऐसा नहीं किया।

बाबरी मस्जिद गिराए जाने के वक्त पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे. (एक्सप्रेस फोटो: आरके दयाल)

कहा जाता है कि 6 दिसंबर 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढाहाई जा रही थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव सो रहे थे। इस संबंध में राव को लेकर कई विचार, किस्से और कुछ सवाल भी हैं। प्रधानमंत्री रहते हुए ऐसे माहौल में क्या उन्हें वाकई गहरी नींद आ गयी थी? उन्होंने समय रहते यूपी में कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन क्यों नहीं लगाया? इन तमाम सवालों का कुछ हद तक जवाब विनय सीतापति की किताब ‘हाफ लायन: हाउ नरसिम्हा राव ट्रांसफॉर्म्ड इंडिया में मिलता है। बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटना के संबंध में सीतापति की किताब का अश-

6 दिसंबर, 1992 को नरसिम्हा राव सुबह 7 बजे उठे। उस दिन रविवार था। उन्होंने दैनिक अखबारों को पढ़ा। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2.25 लाख से भी अधिक वीएचपी (विश्व हिंदू परिषद) के कार्यकर्ता बाबरी मस्जिद के ठीक सामने प्रार्थना सभा करने वाले हैं। इसके कुछ ही देर बाद उनके डॉक्टर के. श्रीनाथ रेड्डी उनके पास पहुंच गए। जब रेड्डी उनके खून और पेशाब का सैंपल ले रहे थे, तब उन्होंने उनके साथ तेलगू और अंग्रेजी में थोड़ी बात की। एम्स अस्पताल के कॉर्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर रेड्डी आमतौर पर रविवार को अपने परिवार के साथ घर पर ही रहते थे। दोपहर के क़रीब उन्होंने अपना टीवी चालू किया। इस दौरान टीवी पर लाइव प्रसारण चल रहा था और मस्जिद के तीनों गुंबद दिखाई दे रहे थे। 12 बजकर 20 मिनट पर रेड्डी ने देखा कि पहला गुंबद हजारों की संख्या में वहां मौजूद कारसेवकों ने ढहा दिया।

चूंकि, रेड्डी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के डॉक्टर थे और उन्हें पता था कि वह दिल के मरीज हैं। लिहाजा, ऐसी परिस्थिति में वह प्रधानमंत्री कार्यालय भागे। प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचने पर उन्होंने देखा कि राव खड़े थे और उनके आसपास मौजूद अधिकारी तथा राजनेता खिलखिला रहे थे। वे सभी टीवी देख रहे थे। तीसरा गुंबद अभी तुरंत गिराया गया था। लेकिन, डॉक्टर रेड्डी को देखते ही राव ने गुस्से में पूछा, “तुम अभी क्यों आए हो?” इस दौरान डॉक्टर रेड्डी ने उनका चेकअप किया। अनुमान के मुताबिक उनके दिल की गति धीमी पड़ रही थी और ब्लडप्रेशर बढ़ गया था। उनका चेहरा भी लाल हो चुका था।  डॉक्टर रेड्डी ने उन्हें ‘बेटा ब्लॉकर’ का ज्यादा डोज दिया और स्थिति कंट्रोल में होने पर वहां से चले गए। घटना के 23 साल बाद डॉक्टर रेड्डी ने बताया कि बतौर चिकित्सक उन्होंने पाया कि मस्जिद गिरने के दौरान उनके (नरसिम्हा राव) स्वास्थ्य में जो भी बदलाव देखने को मिले वह स्वत: थे। उसमें कोई बनावटीपन नहीं था।

‘शव झूठ नहीं बोलते’: जुलाई के महीने में नरसिम्हा राव ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू नहीं किया। हालांकि, उन्होंने माधव गोडबोले (गृह सचिव) से मस्जिद को कब्जे में लेने के लिए एक तात्कालिक योजना बनाने के लिए कहा। जुलाई, 1992 को गोडबोले ने वैसा ही किया जैसा उन्हें कहा गया।( गोडबोले महाराष्ट्र कैडर के मेहनती और ईमानदार आईएएस अधिकारी माने जाते थे। उन्होंने बाद में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के संदर्भ में नरसिम्हा राव की काफी आलोचना की)। उन्होंने राव को योजना संबंध में एक गोपनीय रिपोर्ट भेज दिया। योजना के मुताबिक केंद्रीय सुरक्षा बलों को बेहतर बनाकर मस्जिद को अपने अंडर में लेना था। इसके लिए धारा 356 का लागू करना जरूरी था। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया।

राव ने जुलाई में बने प्लान पर अमल नहीं किया: नरसिम्हा राव खुद हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच बातचीत में शामिल थे।
लेकिन, 30 अक्टूबर,1992 को वीएचपी ने हुंकार भर दी। इसने ऐलान कर दिया कि अयोध्या में यूपी सरकार के अधीन जमीन पर 6 दिसंबर को कारसेवक बाबरी मस्जिद के ठीक सामने पूजा-पाठ करेंगे। हालांकि, वीएचपी ने वादा किया था कि मस्जिद को किसी तरह का नुकसान नहींं पहुंचाया जाएगा। मस्जिद के बाहरी हिस्से में ही पूजा की विधि संपन्न की जाएगी। मगर, 6 दिसंबर 1992 को एक लाख के करीब कारसेवकों का बाबरी मस्जिद के पास जुटना बड़ा मतलब तो जरूर रखता था। (वीएचपी के ऐलान के बाद) नरसिम्हा राव ने गोडबोले को दूसरा प्लान बनाने के लिए कहा, जिसमें केंद्रीय सुरक्षा बल मस्जिद को अपनी देखरेख में ले ले। 4 दिसंबर को गोडबोले ने बताया कि मस्जिद की सुरक्षा के लिए भारी संख्या में केंद्रीय सुरक्षाबलों की जरूरत होगी। गोडबोले की रिपोर्ट में दो बातों पर खास जोर दिया गया था। पहला यह कि पहले उत्तर प्रदेश में धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करना और दूसरा कि कार्रवाई के दौरान मस्जिद को खतरा हो सकता है।

हालांकि, इस संदर्भ में राव के अलावा उनकी पूरी कैबिनेट राष्ट्रपति शासन लागू करने के पक्ष में नहीं थी। 20 नवंबर, 1992 को सीसीपीए की मीटिंग में यह बात पुख्ता हो गयी थी। चूंकि, प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सेनेगल की यात्रा पर थे। इसलिए उन्होंने अपनी गैरहाजिरी में एसबी चह्वान, अर्जुन सिंह और शरद पवार को यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू करने का जिम्मा सौंप रखा था। लेकिन, इन लोगों ने ऐसा नहीं किया।(राष्ट्रपति शासन को लेकर) कैबिनेट में आम सहमति नहीं बन पाने के बाद नरसिम्हा राव ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस दौरान नंवबर के आखिर में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने कोर्ट को भरोसा दिया कि वह किसी भी सूरत में मस्जिद को नुकसान नहीं पहुंचाने देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कल्याण सिंह पर विश्वास किया और राव की याचिका खारिज कर दी।

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