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बुलंदशहर गैंगरेप कांड: आज़म ख़ा के पेश नहीं होने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज़, नए सिरे से नोटिस भेजने को कहा

29 जुलाई की रात को राजमार्ग पर लुटेरों ने नोएडा के एक परिवार की कार को रोका और बंदूक दिखाकर कार में से महिला और उसकी बेटी को निकालकर उनके साथ बलात्कार किया था।

Author नई दिल्ली | September 27, 2016 18:06 pm
उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री आजम खान। (पीटीआई फाइल फोटो)

उच्चतम न्यायालय ने सनसनीखेज बुलंदशहर सामूहिक बलात्कार कांड से संबंधित मामले में उत्तर प्रदेश के मंत्री आजम खां द्वारा अपने वकील के माध्यम से शीर्ष अदालत में पेश नहीं होने पर मंगलवार (27 सितंबर) को अप्रसन्नता व्यक्त की और केन्द्रीय जांच ब्यूरो को निर्देश दिया कि समाजवादी पार्टी के इस नेता पर नए सिरे से नोटिस की तामील की जाए। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘हमारी सुविचारित राय में प्रतिवादी नंबर दो (खां) को यहां पेश होना चाहिए था क्योंकि उनके खिलाफ प्रत्यक्ष आरोप है। इस तथ्य के मद्देनजर हम केन्द्रीय जांच ब्यूरो को निर्देश देते हैं कि प्रतिवादी नंबर दो को नोटिस की तामील की जाए।’’

न्यायालय ने शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि उप्र के मंत्री पर नोटिस की तामील के लिए नोटिस के साथ इस मामले के रिकॉर्ड की प्रति जांच ब्यूरो को मुहैया करायी जाए। न्यायालय ने कहा कि ऐसा लगता है कि खान ने यह सब अपनी ‘निजी हैसियत में कहा था।’ न्यायालय ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब जांच ब्यूरो की ओर से अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल मनिन्दर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के माध्यम से खां पर नोटिस तामील की जा सकती है क्योंकि वह राज्य मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं। इस बीच, न्यायालय ने पीड़ित के पिता की ओर से पेश वकील किसलय पाण्डे को इस मामले में अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने की अनुमति प्रदान करते हुए इसकी सुनवाई 25 अक्तूबर के लिए निर्धारित कर दी।

यह जघन्य घटना 29 जुलाई की रात में हुई थी जब राजमार्ग पर लुटेरों के एक गिरोह ने नोएडा स्थित इस परिवार की कार रोक ली थी और कार में सवार मां और उसकी पुत्री को वाहन से बाहर खींचकर उन पर यौन हमला किया था। शीर्ष अदालत ने 29 अगस्त को इस मामले में जांच ब्यूरो की जांच पर रोक लगाते हुए खां की इस विवादास्पद टिप्पणी की संज्ञान लिया था कि सामूहिक बलात्कार का मामला एक ‘राजनीतिक साजिश’ है। न्यायालय ने यह भी जानना चाहा था कि क्या शासन को इस तरह के जघन्य अपराधों के बारे में ऐसी टिप्पणी करने से उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों को रोकना चाहिए।

न्यायालय ने आठ सितंबर को अपने पहले के आदेश में सुधार करते हुए इस मामले की सीबीआई जांच पर लगी रोक हटा दी थी और जांच एजेन्सी से कहा था कि वह कानून के मुताबिक कार्यवाही करे। जांच ब्यूरो ने इस मामले की जांच पर लगायी गई रोक के आदेश में सुधार का न्यायालय से अनुरोध किया था। जांच ब्यूरो का कहना था कि जांच पर रोक से इस मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य गायब हो सकते हैं और छह आरोपी जमानत प्राप्त कर सकते हैं।

शुरुआत में उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले में 30 जुलाई को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी लेकिन जांच ब्यूरो ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के आलोक में 18 अगस्त को नई सिरे से मामला दर्ज किया था। शीर्ष अदालत ने इससे पहले ऐसे जघन्य मामालों की निष्पक्ष जांच के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आजादी और उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों के ऐसे बयानों के संभावित असर के बारे में कुछ कानूनी सवाल तैयार करने के साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता एफ एस नरिमन को इस मामले में न्याय मित्र नियुक्त किया था।

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