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Ayodhya verdict: आडवाणी की रथ यात्रा, गुजरात दंगे, ‘मौत का सौदागर’….राम मंदिर के साथ ऐसा रहा मोदी का सफर

आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन के तहत रथ यात्रा निकालने का फैसला किया। मोदी उस वक्त बीजेपी के नैशनल इलेक्शन कमेटी के सदस्य होते थे। उन्हें 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से मुंबई के बीच निकाली जाने वाली रथयात्रा के समन्वय की जिम्मेदारी मिली।

गुजरात दंगों के समय आडवाणी ने मोदी का बचाव किया था। (फोटोः इंडियन एक्सप्रेस आर्काइव्ज)

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसले सुनाते हुए दशकों पुराने मामले का पटाक्षेप किया, जिससे अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हो गया। कोर्ट ने यह व्यवस्था दी कि अयोध्या में मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन दी जाए। इस फैसले के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि अब देशवासियों को राष्ट्र निर्माण का संकल्प लेकर नये भारत के निर्माण में जुटना होगा। पीएम मोदी के राजनीतिक जीवन के करीब तीन दशक इस मामले से जुड़े रहे हैं।

मोदी आज उस सरकार की अगुआई कर रहे हैं, जिसकी देखरेख में मंदिर का निर्माण होगा। हालांकि, कभी वह आम एक बीजेपी कार्यकर्ता के तौर पर इस मामले को लेकर चलाए गए आंदोलन का हिस्सा रहे। मोदी और संघ परिवार का इस मामले से जुड़ाव बेहद पुराना है। शुरुआत में आरएसएस और इसके सहयोगी संगठनों ने मांग की थी कि जहां बाबरी मस्जिद खड़ी है, वहां मंदिर का निर्माण किया जाए। उनका दावा था कि राम के जन्मस्थान पर बने मंदिर को तोड़कर 16वीं शताब्दी में मस्जिद बनाई गई।

1984 के आम चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद औसत रहा। पार्टी को सिर्फ दो सीटें मिलीं। बीजेपी नेतृत्व और आरएसएस ने राष्ट्रव्यापी पहचान बनाने और चुनावी राजनीति में दखल बढ़ाने के लिए राम मंदिर मामले को इस्तेमाल करने का फैसला किया। ये कोशिशें रंग लाते नजर आईं और पार्टी को 1989 के आम चुनाव में 89 सीटें मिलीं। तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन के तहत रथ यात्रा निकालने का फैसला किया। मोदी उस वक्त बीजेपी के नैशनल इलेक्शन कमेटी के सदस्य होते थे। उन्हें 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से मुंबई के बीच निकाली जाने वाली रथयात्रा के समन्वय की जिम्मेदारी मिली।

अब बात करते हैं 2002 की। मोदी ने गुजरात के सीएम की जिम्मेदारी संभाली ही थी कि अयोध्या में कार सेवा के बाद 2000 से ज्यादा यात्रियों को लेकर एक आ रही ट्रेन पर हमला हुआ। 59 कारसेवकों को जलाकर मार दिया गया। इस घटना की वजह से गुजरात में दंगे भड़के। हजार से ज्यादा लोग मार दिए गए। इनमें से अधिकतर मुस्लिम थे। मोदी यह कहते रहे हैं कि उन्होंने दंगों को काबू करने के लिए हर मुमकिन कोशिश की। हालांकि, उनके आलोचक उन पर मुस्लिमों की पीड़ा की अनदेखी की आरोप लगाते रहे हैं।

इस हिंसा ने मोदी की छवि को बेहद नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो 2007 के गुजरात चुनाव के दौरान मोदी को ‘मौत का सौदागर’ तक कह दिया। यही बात दोहराकर बिहार के सीएम नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने एनडीए गठबंधन से नाता तोड़ लिया था। 2004 में अटल बिहारी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की आम चुनाव में हार को भी गुजरात हिंसा से खराब हुई छवि से जोड़कर देखा गया।

वाजपेयी ने एक टीवी चैनल से बातचीत में माना था कि गुजरात दंगों का असर पूरे देश में महसूस किया गया और मोदी को घटना के बाद हटा देना चाहिए था। हालांकि, आडवाणी ने उस वक्त मोदी का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि मोदी गुजरात दंगों को लेकर चलाए गए नफरत भरे अभियान का शिकार हो गए थे।

इस घटनाक्रम की वजह से मोदी एक प्रभावशाली हिंदू नेता के तौर पर उभरे। आने वाले विधानसभा चुनावों में उन्होंने हिंदुत्व के एजेंडे को अपनाया। हालांकि, 2014 के आम चुनाव में उन्होंने हिंदुत्ववादी एजेंडे का इस्तेमाल नहीं किया। मोदी उस वक्त विकास की बात करते रहे, वहीं बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण का अपने चुनावी घोषणापत्र में ‘सांस्कृतिक विरासत’ के तौर पर जिक्र किया। बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि पार्टी राम मंदिर निर्माण के लिएए संविधान के दायरे में आने वाली हर मुमकिन संभावना को तलाशेगी।

2017 के यूपी चुनाव से पहले, यह मुद्दा दोबारा से पार्टी का प्राथमिक एजेंडा बन गया। केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2016 में ऐलान किया कि अयोध्या में रामायण म्यूजियम बनाया जाएगा। मोदी ने कई बार राम मंदिर मुद्दा उठाया है, लेकिन 2014 में पहली बार पीएम बनने के बाद वह अयोध्या तक नहीं गए। हालांकि, उन्होंने इस शहर के आसपास कई रैलियों को संबोधित किया। बतौर पीएम वह मंदिर मामले का जिक्र करने से बचते रहे।

वहीं, शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद मोदी ने खास तौर पर इस बात का जिक्र किया कि अदालत का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। मोदी ने शीर्ष अदालत के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आज ही के दिन बर्लिन की दीवार गिरी थी जिससे दो विपरीत विचारधाराओं के उस संकल्प की याद ताजा होती है जो सभी को मिलजुल कर आगे बढ़ने का संदेश देता है।

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