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Ayodhya Verdict पर रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज एके गांगुली ने उठाए सवाल, कहा- मैं परेशान हूं

सु्प्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एके गांगुली ने शनिवार को अयोध्या मामले में आए फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि बतौर संविधान का विद्यार्थी होने के नाते मैं इसे पचा नहीं पा रहा हूं।

Author Updated: November 10, 2019 8:38 AM
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस गांगुली ने संविधान का हवाला देते हुए अयोध्या मामले में आए फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

Ayodhya Ram Mandir-Babri Masjid Case Verdict: सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश जस्टिस अशोक गांगुली ने अयोध्या मामले में आए फैसले पर असंतोष जाहिर करते हुए सवाल उठाए हैं। शनिवार को गांगुली ने कहा कि अयोध्या मामले पर आए फैसले ने उनके भीतर संदेह पैदा कर दिया है और फैसले के बाद वह काफी परेशान हो गए थे। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों वाली संविधान पीठ ने फैसला राम मंदिर के हक में दिया। कोर्ट ने फैसले में कहा कि 2.77 एकड़ भूमि पर ‘राम मंदिर’ बनेगा और सरकार को मुसलमानों के लिए वैकल्पिक रूप से पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया।

‘द टेलिग्राफ’ के मुताबिक 72 वर्षीय जस्टिस गांगुली ने कहा, “पीढ़ियों से अल्पसंख्यकों ने देखा कि वहां पर एक मस्जिद थी। जिसे ढहा गिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक इसके ऊपर एक मंदिर बनाया जाएगा। इस बात ने मेरे दिमाग में शंका पैदा कर दिया है। संविधान का विद्यार्थी होने के नाते इसे स्वीकार कर पाना मेरे लिए काफी कठिन है।”

जस्टिस गांगुली ने कोर्ट के फैसले पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि किसी जगह नमाज अदा की जाती है और प्रार्थना करने वालों के स्थान-विशेष पर मस्जिद होने की आस्था है, तो उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, “भले ही 1856-57 में नहीं, लेकिन निश्चित रूप से 1949 के बाद नमाजें अदा की गई हैं, इसका प्रमाण भी है।

जब हमारा संविधान अस्तित्व में आया, तब वहां नमाज अदा की जा रही थी। जिस स्थान पर नमाज अदा की जाती है, अगर उस स्थान को मस्जिद की मान्यता दी जाती है, तो अल्पसंख्यक समुदाय को अपने धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा का आधिकार है। यह संविधान द्वारा दिया गया मौलिक अधिकार है।

‘द टेलिग्राफ’ के मुताबिक जस्टिस गांगुली ने कहा, “आज फिर एक मुस्लिम क्या देखता है? इतने सालों तक वहां (अयोध्या) एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे ढहा दिया गया। अब अदालत ने उसकी जगह नए निर्माण को हरी झंडी दी है, यह मानते हुए कि वह जगह रामलला की है। क्या सुप्रीम कोर्ट सदियों पुराने जमीन का मालिकाना हक तय करेगा? क्या सुप्रीम कोर्ट यह भूल जाएगा कि जब संविधान अस्तित्व में आया, तब वहां एक मस्जिद काफी वक्त से थी?” जस्टिस गांगुली ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह संविधान और उसके प्रावधानों की रक्षा करे।

जस्टिस गांगुली ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं है कि वह तय करे कि संविधान से पहले वहां क्या था। उन्होंने कहा, “वहां एक मस्जिद थी, एक मंदिर था, एक बौद्ध स्तूप था, एक चर्च था… अगर हम इस तरह से फैसले देने शुरू करेंगे तो काफी सारे मंदिर और मस्जिद ध्वस्त करने पड़ जाएंगे। हम पौराणिक तथ्यों के हिसाब से नहीं चल सकते।”

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान जस्टिस गांगुली ने राम के अस्तित्व पर भी सवाल उठाते हुए कहा, “राम कौन हैं? क्या यह सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य है? यह सिर्फ आस्था और विश्वास का मामला है।”

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