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Ayodhya Ram Mandir: क्या मुस्लिमों की कब्र पर बन सकता है राम मंदिर? अयोध्या के बाशिंदों ने ट्रस्ट से पूछा

Ayodhya Ram Mandir: पत्र में कहा गया है कि "ध्वस्त मस्जिद के चारों ओर 4-5 एकड़ जमीन" को लेकर केंद्र ने मनमानी की है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जो जमीन दी गई है, वह जहां बाबरी मस्जिद मौजूद थी, उससे बहुत दूर है।

Author Edited By रवि रंजन नई दिल्ली | Published on: February 18, 2020 1:17 PM
अयोध्या के रहने वालों ने पूछा है कि क्या मुस्लिमों की कब्र पर राम मंदिर बन सकता है। (Express File Photo)

Ayodhya Ram Mandir: अयोध्या के नौ मुस्लिम निवासियों ने नवगठित श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र को पत्र लिखा है। पत्र में यह अपील की गई है कि जहां पर बाबरी मस्जिद थी, उसके आसपास के 1,480 वर्ग मीटर के आसपास के क्षेत्रों में मुसलमानों के कब्रिस्तान पर नए राम मंदिर का निर्माण न करें। इस पत्र में यह दावा किया गया है कि मंदिर के लिए सरकार द्वारा अधिग्रहित कुल 67 एकड़ जमीन का उपयोग मुसलमानों के दावे को ‘पूरी तरह खारिज करना’ और कानून में जो कहा गया है, उसके विरुद्ध है।

पत्र में कहा गया है कि “ध्वस्त मस्जिद के चारों ओर 4-5 एकड़ जमीन” को लेकर केंद्र ने मनमानी की है। पत्र में आगे कहा गया है, “मौजूदा तथ्य को देखते हुए आज कब्रें दिखाई नहीं दे सकती हैं क्योंकि 1949 के बाद से पूरे क्षेत्र के साथ अलग तरह से व्यवहार किया गया है। जबरन भगवान राम की एक मूर्ति मस्जिद के अंदर रखी गई थी और 1992 में जब मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था।”

पत्र में कहा गया है कि इसके अलावा, “5 एकड़” जमीन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2019 के अपने आदेश में कहा था कि “अयोध्या में एक उपयुक्त प्रमुख स्थान” पर मुसलमानों को आवंटित किया जाएगा, लेकिन जहां बाबरी मस्जिद मौजूद थी, वहां से बहुत दूर दिया गया है।

चार पन्नों के पत्र में 10 ट्रस्टियों से “हिंदू / सनातन धर्म और उसकी व्यवहारिकता के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ ज्ञान और अनुभव के साथ” यह विचार करने के लिए कहा गया है कि क्या “भगवान राम के मंदिर का नींव मुसलमानों की कब्र पर रखा जा सकता है”। पत्र में कहा गया, “1994 में सुप्रीम कोर्ट ने 67 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को बरकरार रखा, जिसमें कब्रिस्तान की जमीन शामिल थी और इस तरह पूरी जमीन केंद्र सरकार के पास चली गई। 1993 के अधिग्रहण अधिनियम का उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देना था।”

पत्र में यह भी कहा गया है कि अधिग्रहण “मुसलमानों को उक्त भूमि से बाहर करने के लिए नहीं था”। अधिनियम के माध्यम से प्राप्त की जाने वाली वस्तु ‘मस्जिद’ के निर्माण के लिए भी थी। पत्र में श्री रामलला विराजमान के ऑरिजनल सूट नंबर 5 और “दर्ज तथ्यों” का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि 1855 के दंगों में मारे गए 75 मुसलमानों को वहां ‘मस्जिद के आसपास एक मौजूदा कब्रिस्तान में’ दफन किया गया था। साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला जहां जस्टिस डी वी शर्मा ने हवाला दिया कि “विवादित ढांचा तीन तरफ से कब्रिस्तान से घिरा हुआ था”।

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