राम मंदिर के चंदा फंड को लेकर उठे विवाद के केंद्र में एक साधारण-सा नाम वाला ‘पिलग्रिम फैसिलिटेशन सेंटर’ (तीर्थयात्री सुविधा केंद्र) है। मुख्य मंदिर से करीब 200 मीटर की दूरी पर स्थित यह इमारत अपनी वास्तुकला में राम मंदिर की छाप लिए हुए है। इस भवन के बेसमेंट में एक काउंटिंग रूम बनाया गया है जहां मंदिर परिसर में लगे करीब 35 दानपात्रों (डोनेशन बॉक्स) की राशि लाकर गिनी जाती है।

मंदिर में हर दिन करीब एक लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस कारण दान राशि की गिनती का काम दो पालियों में किया जाता है। पहली पाली सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक जबकि दूसरी पाली दोपहर 2 बजे से रात 8 बजे तक चलती है। हर पाली में करीब 20 कर्मचारी (टेलर) दान राशि की गिनती में जुटे रहते हैं।

हर दिन 8 से 13 लाख रुपये का दान

मंदिर में हर दिन मिलने वाले दान की राशि का अनुमान 8 लाख से 13 लाख रुपये के बीच है। हालांकि, राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट के दान राशि काउंटर रूम में तैनात एक कर्मचारी का का कहना है कि ‘कुछ एक दिन यह रकम 50 से 60 लाख रुपये तक भी पहुंच जाती है।’

यह कर्मचारी उन लोगों में शामिल है जिनसे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) ने पूछताछ की है। SIT मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए सोने, चांदी और हीरे के आभूषणों को कथित तौर पर नकली वस्तुओं से बदलने और मंदिर के संग्रह से नकदी चोरी होने के आरोपों की जांच कर रही है।

मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित ‘ग्रीन हाउस’ में विशेष जांच दल (SIT) ने अपना अस्थायी डेरा बना रखा है। जांच टीम दान से जुड़े रिकॉर्ड, नकदी की गिनती की प्रक्रिया, लेखा-जोखा और बैंक में जमा करने की व्यवस्था की पड़ताल कर रही है। इसके साथ ही दान प्रबंधन और खातों के रखरखाव से जुड़े अधिकारियों से भी पूछताछ की जा रही है।

सूत्रों के मुताबिक, SIT अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट अगले एक-दो दिनों में सौंप सकती है जबकि अंतिम रिपोर्ट अगले सप्ताह आने की संभावना है। हालांकि, अब तक पुलिस को इस मामले में कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।

इसी बीच, दान राशि को लेकर जारी विवाद के बीच यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार दोपहर अयोध्या दौरे पर रहेंगे। अपने दौरे के दौरान वह राम मंदिर में दर्शन-पूजन करेंगे। इसके अलावा, योगी रामायण वैक्स म्यूजियम और नगर निगम के जोनल कार्यालय का भी उद्घाटन करेंगे।

कैसे होती है पैसों की गिनती

दान प्रबंधन की पूरी व्यवस्था के शीर्ष पर राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट के प्रमुख सदस्य अनिल मिश्रा हैं। दान की रकम और आभूषणों के संग्रहण, गिनती से लेकर उनके इस्तेमाल तक की पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी उनके पास है। वह काउंटर रूम से सटे दफ्तर से इस व्यवस्था की निगरानी करते हैं।

दान की गिनती की प्रक्रिया की सीधी निगरानी रिटायर्ड बैंक अधिकारी सुभाष श्रीवास्तव करते हैं। वह अनिल मिश्रा के अधीन काम करते हैं। गिनती की दोनों पालियों के लिए अलग-अलग शिफ्ट प्रभारी नियुक्त किए गए हैं जो सुभाष श्रीवास्तव को रिपोर्ट करते हैं।

गिनती में लगे कर्मचारियों की निगरानी के लिए हर चार से पांच टेलर पर एक सुपरवाइजर तैनात किया गया है। इस तरह दान की पूरी प्रक्रिया कई स्तरों वाली निगरानी व्यवस्था के तहत संचालित होती है।

काउंटिंग की इस प्रक्रिया में शामिल सभी कर्मचारी या तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) का स्टाफ हैया फिर उन्हें बैंक ने आउटसोर्स किया है। अकसर इनका चुनाव ट्रस्ट के अधिकारी, सदस्य याो स्थानीय आरएसएस नेताओं द्वारा किया जाता है।

दानपेटियों को तभी खाली किया जाता है जब वे पूरी भर जाती हैं। खोलने के समय ट्रस्ट के स्टाफ और एसबीआई के एक कर्मचारी सहित कुल चार कर्मचारियों को मौके पर रहना अनिवार्य है। इसके बाद पैसे को लोहे के एक कंटेनर में रखकर लॉक किया जाता है और फिर गाड़ी में रखकर काउंटिंग रूम ले जाया जाता है। इस पूरी गतिविधि की निगरानी सीसीटीवी कैमरों द्वारा की जाती है।

काउंटिंग सेंटर पर ही करेंसी नोट, सिक्के या दूसरा चढ़ावा जैसे गहने आदि को अलग-अलग कर लिया जाता है। इसके बाद इन्हें गिनती कक्ष में बने विभिन्न काउंटरों पर तैनात कर्मचारियों (टेलरों) को सौंप दिया जाता है जो निर्धारित प्रक्रिया के तहत उनकी गिनती करते हैं।

गिनती में लगे कर्मचारियों के लिए भी सख्त नियम बनाए गए हैं। उन्हें अपनी ड्यूटी के दौरान केवल शौचालय जाने या भोजन करने के लिए ही गिनती कक्ष से बाहर निकलने की अनुमति होती है। भोजन की व्यवस्था भी हॉल के ठीक बाहर की गई है। हालांकि, अपनी पूरी शिफ्ट के दौरान किसी भी कर्मचारी को भवन परिसर से बाहर जाने की इजाजत नहीं होती।

गिनती पूरी होने के बाद कैश को दोबारा बैंक कंटेनर में पैक कर दिया जाता है और हर सुबह SBI ब्रांच ले जाने से पहले निगरानी के तहत सील कर दिया जाता है। गिनती पूरी होने के बाद नकदी को बैंक की निर्धारित प्रक्रिया के तहत राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट के अधिकृत दान खाते में जमा कराया जाता है। जमा करने से पहले बैंक भी अपने स्तर पर राशि का सत्यापन और मिलान करता है।

इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ट्रस्ट को खाते में जमा की गई राशि की जानकारी देता है और उसी के आधार पर खातों का रिकॉर्ड अपडेट किया जाता है।

एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, ट्रस्ट का यह खाता ‘नो-चेक बुक’ अकाउंट है। उन्होंने बताया, ”किसी भी तरह के खर्च, बिल भुगतान या विक्रेताओं, ठेकेदारों और सर्विस प्रोवाइडर्स को भुगतान के लिए चेक का इस्तेमाल नहीं किया जाता। सभी लेन-देन डिजिटल माध्यम से एक खाते से दूसरे खाते में किए जाते हैं।”

राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने स्पष्ट किया कि मंदिर निर्माण के लिए चलाया गया धन संग्रह अभियान पूरी तरह अलग प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि उस दौरान जुटाई गई करीब 3500 करोड़ रुपये की राशि अलग खाते में जमा की गई थी और उसका हिसाब-किताब भी स्वतंत्र रूप से रखा गया था।

दान राशि की गिनती करने वाले कर्मचारियों के अलावा राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट हजारों लोगों को रोजगार देता है। इनमें सुरक्षा गार्ड, रसोइये और सफाईकर्मी जैसे कर्मचारी शामिल हैं। ट्रस्ट के स्टाफ में करीब 40 पूर्व सैनिक (एक्स-आर्मीमैन) भी कार्यरत हैं।

संघ की चिंता

राम मंदिर के दान को लेकर उठे विवाद और आरोपों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के भीतर भी चिंता बढ़ा दी है। संघ से जुड़े सूत्रों ने स्वीकार किया कि इन आरोपों से संगठन की छवि को नुकसान पहुंचने की आशंका है। खास तौर पर विश्व हिंदू परिषद (VHP) के उपाध्यक्ष और राम जन्मभूमि क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट के महासचिव चम्पत राय तथा पूर्व RSS प्रांत प्रचारक गोपाल राव की भूमिका को लेकर सवाल उठने से बेचैनी बढ़ी है। ट्रस्ट से जुड़े भूमि सौदों को लेकर पहले हुए विवादों के बाद गोपाल राव को व्यवस्था से जोड़ा गया था। फिलहाल वे दर्शन व्यवस्था जैसी रोजमर्रा की गतिविधियों की जिम्मेदारी संभालते हैं।

दान राशि के प्रबंधन से सीधे जुड़े अनिल मिश्रा और सुभाष श्रीवास्तव का भी RSS से पुराना संबंध रहा है। पेशे से होम्योपैथिक डॉक्टर अनिल मिश्रा लंबे समय तक अवध क्षेत्र के RSS प्रांत कार्यवाह रहे हैं जबकि सुभाष श्रीवास्तव अयोध्या के आचार्य नगर क्षेत्र के वरिष्ठ संघचालक माने जाते हैं। अनिल मिश्रा कर्मचारियों की नियुक्तियों में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

मंदिर के संचालन की समग्र जिम्मेदारी संभालने वाले चम्पत राय मंदिर से जुड़े सबसे प्रभावशाली लोगों में गिने जाते हैं और अधिकतर नियुक्तियों में उनकी राय महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालांकि, संघ के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी जैसे सह-सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल और पूर्व सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी समय-समय पर अयोध्या आकर को-ऑर्डिनेशन करते हैं लेकिन उनकी भूमिका मुख्य रूप से सलाहकार की बताई जाती है।

एक स्थानीय RSS पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ”कई कर्मचारियों की नियुक्तियां उचित जांच-पड़ताल के बिना सिर्फ किसी के रिश्तेदार होने के आधार पर कर दी गईं। मौजूदा विवाद की जड़ यही है।”

संघ में एक सूत्र ने कहा, ”चम्पत जी ट्रस्ट के कामकाज को RSS कार्यालय की तरह संचालित करते हैं और इससे स्थिति संभालने के बजाय और उलझ जाती है।”

इंडियन एक्सप्रेस ने चम्पत राय, अनिल मिश्रा और सुभाष श्रीवास्तव से इस बारे में जानकारी लेने की कोशिश की लेकिन ये सभी लोग बात के लिए उपलब्ध नहीं थे या तो उन्होंने किसी टिप्पणी से इनकार कर दिया। राव ने कहा, ”अब जब विशेष जांच दल (SIT) इस पूरे मामले की जांच कर रहा है तो किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उसकी रिपोर्ट और जांच के नतीजों का इंतजार करना चाहिए।”

ट्रस्ट के एक अन्य सदस्य और निर्मोही अखाड़ा से जुड़े दिनेंद्र दास ने कहा, ”मुझे पूरा भरोसा है कि जिसने भी कोई गलत काम किया होगा, उसे सजा मिलेगी। फिलहाल मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता।”

ट्रस्ट कार्यालय से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, विवाद सामने आने से कुछ सप्ताह पहले चम्पत राय की संघ के वरिष्ठ नेताओं के साथ तीखी बहस हुई थी। इनमें बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार भी शामिल हैं।

विवाद के बाद विनय कटियार ने ट्रस्ट के अधिकारियों पर सवाल उठाते हुए कहा, ”ऐसे लोगों की ट्रस्ट में कोई जगह नहीं है और उन्हें हटा दिया जाना चाहिए… सब के सब चोर हैं।”

राम मंदिर आंदोलन से 1980 के दशक से जुड़े एक राष्ट्रीय स्तर के प्रचारक ने कहा कि इन आरोपों ने ‘संघ की छवि को धूमिल किया है।’ उन्होंने कहा, “अशोक सिंघल जी और मोरोपंत पिंगले जी राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख शिल्पकारों में थे। वे कभी नहीं चाहते थे कि बने हुए मंदिर का प्रबंधन किसी ट्रस्ट के हाथों में हो। वे ऐसा होने की अनुमति कभी नहीं देते।”

आने वाले चुनावों को देखते हुए विपक्ष को इस विवाद में सरकार को घेरने का बड़ा मुद्दा नजर आ रहा है- खासकर इसलिए क्योंकि यह मामला भाजपा की प्रमुख परियोजनाओं में से एक राम मंदिर से जुड़ा हुआ है।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राम मंदिर के दान फंड में कथित गड़बड़ी के आरोपों को ‘बेहद शर्मनाक’ बताया। उन्होंने इस मामले में सरकार की चुप्पी को ‘संदेहास्पद’ करार देते हुए सवाल उठाए।

वहीं उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय गुरुवार को अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने भाजपा पर ‘आस्था को बेचने’ का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ”जो लोग धर्म के नाम पर आए थे, उन्होंने उसी का सौदा कर लिया… यहां संगठित लूट चल रही है।”

अजय राय ने यह भी आरोप लगाया कि इस मामले की जिम्मेदारी केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी जवाबदेही सत्ता और व्यवस्था के शीर्ष स्तर तक जाती है।

दूसरे मंदिरों में क्या है प्रक्रिया

काशी विश्वनाथ मंदिर के एक ट्रस्टी ने कहा कि उन्हें अयोध्या में लगाए जा रहे आरोपों जैसी किसी घटना की जानकारी या याद नहीं है।

उन्होंने बताया, ”हमारे यहां करीब 50 दानपात्र हैं। इन्हें हर मंगलवार और शुक्रवार को खोला जाता है। मंदिर के बरामदे में महिला श्रद्धालु अपनी मर्जी से बिना किसी पारिश्रमिक के, दान राशि की गिनती करती हैं। इस दौरान दो सरकारी नामित प्रतिनिधि और बैंक अधिकारी (फिलहाल HDFC बैंक के अधिकारी) भी मौजूद रहते हैं।”

ट्रस्टी के मुताबिक, ”पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से और खुले स्थान पर होती है। हर गतिविधि कैमरों की निगरानी में रिकॉर्ड की जाती है ताकि किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका न रहे।”

उत्तर प्रदेश के एक अन्य प्रमुख धार्मिक स्थल विंध्याचल मंदिर में दान संग्रह की व्यवस्था अलग तरीके से संचालित होती है। यहां दान का पैसा इकट्ठा करने का काम पाली व्यवस्था (शिफ्ट सिस्टम) के तहत पंडे करते हैं। इसके बाद दानपात्रों से निकाली गई राशि की गिनती सरकारी अधिकारियों की मौजूदगी में की जाती है।

विंध्याचल के पंडों के एक नेता ने कहा, ”मेरी जानकारी में दान की गिनती से जुड़ा एकमात्र विवाद जनवरी 2016 का था जब एक व्यक्ति कैमरे में नकदी चोरी करते हुए पकड़ा गया था। उसके खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराई गई थी।”

लखनऊ से मौलश्री सेठ के इनपुट के साथ

दान पेटी से बैंक तक: मंदिरों में करोड़ों रुपये का हिसाब कैसे रखा जाता है?

यह स्टोरी किसी एक मंदिर या किसी एक विवाद की नहीं बल्कि उस पूरी व्यवस्था की पड़ताल है जो श्रद्धालुओं के विश्वास और करोड़ों रुपये के दान के बीच काम करती है। दान केवल धार्मिक नहीं, आर्थिक गतिविधि भी है। भारत में हर साल हजारों करोड़ रुपये का दान धार्मिक संस्थानों को मिलता है। इनमें नकद दान, सोना और चांदी, आभूषण, जमीन और संपत्ति, ऑनलाइन ट्रांसफर और UPI व QR कोड से भुगतान शामिल हैं।