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Ayodhya Ram Mandir-Babri Masjid Case Updates: बाबरी विध्वंस में अवमानना के आरोपी थे कल्याण सिंह, यूयू ललित ने की थी उनकी पैरवी, जानें-पूरा मामला

Ayodhya Ram Mandir-Babri Masjid Case Supreme Court Today News Updates: सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का दोषी मानते हुए कल्याण सिंह को एक दिन की सजा सुनाई थी और 20 हजार रूपये का जुर्माना भी लगाया था।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उदय यू ललित।

Ayodhya Ram Mandir-Babri Masjid Case Updates: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस यूयू ललित ने अयोध्या में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। वो पांच जजों की खंडपीठ का हिस्सा थे। दरअसल, जस्टिस ललित साल 1994 में अवमानना से जुड़े एक मामले में भाजपा नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के वकील थे। कल्याण सिंह पर सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी विध्वंस केस में अवमानना का केस चलाया था। बता दें कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाते कल्याण सिंह ने जुलाई 1992 में सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र दाखिल किया था जिसमें कहा गया था कि बाबरी मस्जिद के ढांचे को यथावत रखा जाएगा लेकिन 6 दिसंबर 1992 को कल्याण सिंह इस वचन को नहीं निभा सके। कार सेवकों और अन्य हिन्दूवादी संगठनों ने बाबरी मस्जिद का ढहा दिया। इस कारण सुप्रीम कोर्ट ने 24 अक्टूबर 1994 को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए कल्याण सिंह को एक दिन की सजा सुनाई थी और 20 हजार रूपये का जुर्माना भी लगाया था। सुप्रीम कोर्ट में कल्याण सिंह के लिए इस मामले की पैरवी यूयू ललित ने ही की थी।

गुरुवार (10 जनवरी) को जब सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच ने मामले की सुनवाई शुरू की तब मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने बेंच में जस्टिस यूयू ललित के होने पर बेंच का ध्यान दिलाया और कहा, “मैं इसे आपके नोटिस में ला रहा हूं, लेकिन हमें उनकी बात सुनने पर आपत्ति नहीं है। यह पूरी तरह से आपके लॉर्डशिप पर निर्भर है।” धवन की दलील पर संविधान पीठ के पांचों जजों ने आंतरिक चर्चा की। चर्चा के बाद CJI गोगोई ने कहा कि जस्टिस ललित ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग रखने की इच्छा व्यक्त की है, इसलिए अब कोर्ट नई बेंच का गठन कर 29 जनवरी को मामले की सुनवाई करेगी। पांच जजों की खंडपीठ में CJI रंजन गोगोई, के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ शामिल थे।

जस्टिस उदय यू ललित का जन्म 9 नवंबर, 1957 को हुआ था। उन्होंने जून 1983 से वकालत की शुरुआत की। दो साल बाद उन्होंने दिसंबर, 1985 में बॉम्बे हाई कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की। इसके एक साल बाद उन्होंने अपना ट्रांसफर जनवरी, 1986 में दिल्ली करवा लिया। अप्रैल, 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया। यूयू ललित कई मामलों में एमिकस क्यूरी भी बनाए गए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत सभी 2 जी मामलों में ट्रायल आयोजित करने के लिए सीबीआई के लिए विशेष लोक अभियोजक भी नियुक्त किए गए थे। यूयू ललित गुजरात के बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख और तुलसी प्रजापति एनकाउंटर केस में भाजपा अध्यक्ष अध्यक्ष अमित शाह के वकील भी रह चुके हैं। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद 13 अगस्त 2014 को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली थी।

पिछले साल (2018) 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए के गोयल और जस्टिय यूयू ललित की खंडपीठ ने एससी/एसटी (अत्याचार रोकथाम) एक्ट पर बड़ा फैसला सुनाया था कि किसी भी आरोपी को दलित अत्याचार के केस में प्रारंभिक जांच के बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। इससे पहले केस दर्ज होने के बाद ही गिरफ्तारी का प्रावधान था। इस फैसले से देशभर के दलितों ने 2 अप्रैल को देशव्यापी बंद का आह्वान किया था। बाद में मोदी सरकार ने कोर्ट के इस फैसले को संसद में कानून बनाकर पलट दिया था।

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