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अयोध्या विवाद: 18 अक्टूबर तक पूरी होगी सुनवाई, निर्णय नवंबर के दूसरे सप्ताह में

सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्तूबर तक सुनवाई पूरी करने की समय सीमा तय की है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, उससे पहले फैसला आने की उम्मीद।

Author Updated: September 19, 2019 1:31 AM
पीठ ने अपने आदेश में कहा-इन अपीलों पर सुनवाई, जो काफी आगे बढ़ चुकी है, बगैर किसी बाधा के जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतक दृष्टि से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए बुधवार को 18 अक्तूबर तक की समय सीमा निर्धारित कर दी। शीर्ष अदालत के इस कदम से 130 साल से भी अधिक पुराने अयोध्या विवाद में नवंबर के मध्य तक फैसला आने की संभावना बढ़ गई है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में शनिवार को भी सुनवाई करने का प्रस्ताव रखा और साथ ही यह भी कहा कि संबंधित पक्षकार यदि चाहें तो मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद का सर्वमान्य समाधान करने के लिए स्वतंत्र हैं और वे ऐसा समाधान उसके समक्ष पेश कर सकते हैं। परंतु शीर्ष अदालत ने दोनों ही पक्षों के वकीलों से कहा कि वह चाहती है कि इस मामले की रोजाना हो रही सुनवाई 18 अक्तूबर तक पूरी की जाए ताकि न्यायाधीशों को फैसला लिखने के लिए करीब चार हफ्ते का समय मिल सके।

इस प्रकरण में हिंदू और मुसलिम पक्षकारों की दलीलें पूरी करने की समय सीमा निर्धारित किया जाना काफी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अयोध्या विवाद की सुनवाई कर रहे पांच सदस्यीय संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

पीठ ने अपने आदेश में कहा-इन अपीलों पर सुनवाई, जो काफी आगे बढ़ चुकी है, बगैर किसी बाधा के जारी रहेगी। यदि इस बीच पक्षकार मामले को, पहले गठित मध्यस्थता समिति के माध्यम से सुलझाना चाहें, तो वे ऐसा कर सकते हैं और समझौता यदि हो, तो अदालत के समक्ष पेश कर सकते हैं। पीठ ने मंगलवार को हिंदू और मुसलिम पक्षकारों के वकीलों से उनकी बहस पूरी करने के लिए अनुमानित समय के बारे में जानकारी मांगी थी।

पीठ ने कहा-हमें मिलकर 18 अक्तूबर तक सुनवाई पूरी करने के प्रयास करने चाहिए ताकि हमें भी लिखने के लिए चार हफ्ते का वक्त मिल जाए। धवन ने कहा कि वह और उनके सहयोगी अपनी दलीलें समाप्त करने के लिए आठ और कार्यदिवस लेंगे और उनकी दलीलों का जवाब देने के लिए हिंदू पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ वकील के परासरन और सीएस वैद्यनाथन को दो दिन की आवश्यकता होगी।

इस पर पीठ ने कहा-हम, अगर जरूरी हुआ, शनिवार को भी सुनवाई के लिए तैयार हैं। सुनवाई के लिए एक कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है। सुनवाई के कार्यक्रम पर विचार के बाद पीठ ने कहा कि उसे इस प्रकरण में मध्यस्थता के लिए बनाई गई समिति के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश एफएम आई कलीफुल्ला से एक पत्र मिला है। इसमें कहा गया है कि कुछ पक्षकारों ने मध्यस्थता प्रक्रिया फिर से शुरू करने के लिए उन्हें खत लिखा है। पीठ ने कहा- इससे संबंधित एक मुद्दा है। हमें एक पत्र मिला है कि कुछ पक्षकार इस मामले को मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाना चाहते हैं। पीठ ने यह भी कहा कि पक्षकार ऐसा कर सकते हैं और मध्यस्थता समिति के समक्ष होने वाली कार्यवाही गोपनीय रह सकती है।

पीठ ने कहा कि भूमि विवाद मामले की छह अगस्त से रोजाना हो रही सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी है और यह जारी रहेगी। शीर्ष अदालत ने इस विवाद का सर्वमान्य हल खोजने के लिए गठित मध्यस्थता समिति के प्रयास विफल हो जाने के बाद छह अगस्त से अयोध्या प्रकरण पर रोजाना सुनवाई करने का निश्चय किया था। अदालत ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कलीफुल्ला की अध्यक्षता वाली मध्यस्थता समिति की इस रिपोर्ट का संज्ञान लिया था कि मध्यस्थता की कार्यवाही विफल हो गई है और इसके अपेक्षित नतीजे नहीं निकले हैं।

शीर्ष अदालत ने इस विवाद को सर्वमान्य समाधान के उद्देश्य से आठ मार्च को मध्यस्थता के लिए भेजा था और इसे आठ हफ्ते में अपनी कार्यवाही पूरी करनी थी। समिति में धर्म गुरु श्री श्री रविशंकर और मध्यस्थता कराने में दक्ष वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू को शामिल किया गया था। समिति की कार्यवाही फैजाबाद में बंद कमरे में हुई और इस दौरान उसने संबंधित पक्षों से विस्तार से बातचीत भी की। समिति को आशा थी कि इस विवाद का समाधान निकल आएगा, इसलिए अदालत ने इसका कार्यकाल 15 अगस्त तक के लिए बढ़ा दिया था। शीर्ष अदालत ने समिति की 18 जुलाई तक की कार्यवाही की प्रगति के बारे में रिपोर्ट का अवलोकन किया और इसके बाद ही नियमित सुनवाई करने का निश्चय किया।

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