ताज़ा खबर
 

आडवाणी, उमा,जोशी के खिलाफ 9 महीने में दें फैसला, बाबरी विध्वंस केस की सुनवाई कर रहे जज को SC का आदेश

शीर्ष अदालत ने अयोध्या में मुगलकालीन इस ढांचे को गिराये जाने को ‘अपराध’ बताते हुये कहा था कि इसने संविधान के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को हिला कर दिया है। न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में अतिविशिष्ट आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोप बहाल करने की सीबीआई को अनुमति दे दी थी।

Author Updated: July 19, 2019 11:28 PM
supreme courtतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (एएनआई फोटो)

उच्चतम न्यायालय ने 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश से शुक्रवार को कहा कि इस प्रकरण में आज से नौ महीने के भीतर फैसला सुनाया जाये। इस मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, डॉÞ मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और कई अन्य नेता आरोपी हैं।
शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी होने और फैसला सुनाए जाने तक लखनऊ में विशेष न्यायाधीश के कार्यकाल को भी बढ़ा दिया। शीर्ष अदालत ने 19 अप्रैल, 2017 को इस मामले में आडवाणी, जोशी, उमा भारती के साथ ही भाजपा के पूर्व सांसद विनय कटियार और साध्वी ऋतंबरा पर भी आपराधिक साजिश के आरोप लगाए थे। इस मामले में आरोपी गिरिराज किशोर, विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल और विष्णु हरि डालमिया का निधन हो चुका है। अत: उनके खिलाफ कार्यवाही खत्म कर दी गयी है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के कार्यकाल में अयोध्या में यह विवादित ढांचा गिराया गया था। सिंह इस समय राजस्थान के राज्यपाल हैं। शीर्ष अदालत ने कहा था कि राज्यपाल के पद पर आसीन रहने के दौरान कल्याण सिंह को संविधान के तहत छूट प्राप्त है। न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन और न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने शुक्रवार को कहा कि इस मामले में गवाहों के बयान दर्ज करने का काम छह महीने के भीतर पूरा किया जाये। पीठ ने कहा, ‘‘मौखिक दलीलें कम से कम पेश की जाएं और उनके साथ लिखित अभिवेदन भी दिए जाएं। इस मामले में आज से अधिकतम नौ महीने में फैसला तैयार किया जाए और सुनाया जाए।’’ पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त अपनी पूर्ण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह 30 सितंबर को सेवानिवृत्त होने वाले विशेष न्यायाधीश का कार्यकाल बढ़ाने के लिए चार सप्ताह में इलाहाबाद उच्च न्यायालय से विचार-विमर्श करके उपयुक्त आदेश पारित करे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि विशेष न्यायाधीश का कार्यकाल सिर्फ इस मुकदमे की सुनवाई पूरी करने और फैसला सुनाने के उद्देश्य से ही बढ़ाया जा रहा है।
पीठ ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि वह न्यायाधीश के कार्यकाल के विस्तार के संबंध में राज्य सरकार के उपयुक्त आदेश रिकॉर्ड में लाने के लिए शपथ पत्र दायर करें। उसने कहा कि विस्तारित कार्यकाल के दौरान विशेष न्यायाधीश इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ही प्रशासनिक नियंत्रण में ही रहेंगे। उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता ऐश्वर्या भाटी ने शुरुआत में कहा कि राज्य में न्यायिक अधिकारियों का कार्यकाल बढ़ाए जाने का कोई प्रावधान नहीं है।

उन्होंने साथ ही कहा कि न्यायालय अपने पूर्ण अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए राज्य को तीन माह के लिए विशेष न्यायाधीश का कार्यकाल बढ़ाने का आदेश दे सकता है। पीठ ने कहा, ‘‘हम आपको तीन महीने नहीं दे रहे। हम कह रहे हैं कि कार्यकाल का विस्तार मुकदमे की सुनवाई पूरी होने और फैसला सुनाए जाने तक होगा, भले ही इसमें दो साल लग जाएं।’’ इससे पहले, इस हाई प्रोफाइल मामले की सुनवाई कर रहे लखनऊ में विशेष न्यायाधीश ने शीर्ष अदालत को 25 मई को पत्र लिखकर मामले की समाप्ति के लिए दो वर्ष की समय सीमा बढ़ाए जाने की मांग की थी।

विशेष न्यायाधीश ने न्यायालय को सूचित किया था कि वह 30 सितंबर 2019 को सेवानिवृत्त हो जाएंगे। पीठ ने 15 जुलाई को कोई ऐसा रास्ता निकालने में उत्तर प्रदेश सरकार से मदद मांगी थी जिससे विशेष न्यायाधीश द्वारा इस मामले में फैसला सुनाये जाने तक उनका कार्यकाल बढ़ाया जा सके। पीठ ने कहा था , ‘‘दो साल तक लगभग रोजाना सुनवाई करने के बाद विशेष न्यायाधीश अब इस मामले की सुनवाई पूरी करने के करीब हैं और इसे पूरा करने तथा फैसला सुनाने के लिये उन्हें छह महीने से थोड़ा अधिक समय चाहिये।’’ शीर्ष अदालत ने 19 अप्रैल, 2017 को राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मामले की रोजाना सुनवाई करके इसे दो साल के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया था ।

शीर्ष अदालत ने अयोध्या में मुगलकालीन इस ढांचे को गिराये जाने को ‘अपराध’ बताते हुये कहा था कि इसने संविधान के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को हिला कर दिया है। न्यायालय ने इसके साथ ही इस मामले में अतिविशिष्ट आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोप बहाल करने की सीबीआई को अनुमति दे दी थी। शीर्ष अदालत ने इस मुकदमे की सुनवाई में 25 साल के विलंब के लिये सीबीआई को आड़े हाथ लिया था। शीर्ष अदालत ने रायबरेली में विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में आडवाणी और अन्य के खिलाफ लंबित कार्यवाही को लखनऊ में अयोध्या मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश की अदालत में स्थानांतरित कर दिया था।

न्यायालय ने कहा था कि सत्र अदालत सीबीआई द्वारा दाखिल संयुक्त आरोप पत्र में नामित व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (साजिश) और दूसरे दंडात्मक प्रावधानों के तहत अतिरिक्त आरोप निर्धारित करेगी। संयुक्त आरोप पत्र में चंपत राय बंसल, सतीश प्रधान, धरम दास, महंत नृत्य गोपाल दास, महामण्डलेश्वर जगदीश मुनि, राम बिलास वेदांती, बैकुण्ठ लाल शर्मा और सतीश चंद्र नागर के नाम शामिल थे। शीर्ष अदालत ने आडवाणी और अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश रचने के आरोप हटाने संबंधी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 12 फरवरी, 2001 के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताया था। न्यायालय के इस फैसले से पहले अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराये जाने की घटना के संबंध में लखनऊ और राय बरेली की अदालत में अलग अलग मुकदमे चल रहे थे।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 ‘आधार’, ‘तीन तलाक’ पर SC ने तो नहीं कहा फिर भी बनाया कानून, मॉब लिचिंग पर क्यों डर रही मोदी सरकार? ओवैसी का वार
2 कर्नाटक: बहुमत परीक्षण के बीच ‘काला जादू’ पर चर्चा, बीजेपी बोली- CM के भाई नंगे पांव, नींबू क्यों लाए असेंबली?
3 मॉब लिंचिंग पर डिबेट में वरिष्ठ पत्रकार ने LJP प्रवक्ता को हड़काया- डॉन्ट बिहैव लाइक डिक्टेटर वर्ना…