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मस्जिद बनाने के लिए हिंदू मंदिर गिराया गया

वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने सुनवाई के दौरान ‘एएसआई’ की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि रिपोर्ट में मगरमच्छ और कछुए की आकृतियों का जिक्र है, जिनका मुसलिम संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने रिपोर्ट से अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला देते हुए विवादित क्षेत्र में हिंदू मंदिर होने के दावों को पुख्ता करने की कोशिश की।

Author नई दिल्ली | Updated: August 21, 2019 1:17 AM
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर प्रतिदिन सुनवाई चल रही है। इससे पहले सोमवार को संविधान पीठ के पांच न्यायाधीशों में से एक के मौजूद ना होने के कारण सुनवाई नहीं हुई। सोमवार को सुनवाई का आठवां दिन था।

सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद की आठवें दिन की सुनवाई के दौरान ‘राम लला विराजमान’ के वकील ने मंगलवार को ‘एएसआई’ की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि अयोध्या में मस्जिद का निर्माण करने के लिए हिंदू मंदिर गिराया गया। वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने अदालत में कहा कि ‘एएसआई’ की रिपोर्ट में मगरमच्छ और कछुए की आकृतियों का जिक्र है। जिसका मुसलिम संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाले पांच जजों के संविधान पीठ के समक्ष उन्होंने ‘एएसआई’ की रिपोर्ट से अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला देते हुए विवादित क्षेत्र में हिंदू मंदिर होने के दावों को पुख्ता करने की कोशिश की।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के अलावा पीठ में न्यायमूर्ति एसए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर भी हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर प्रतिदिन सुनवाई चल रही है। इससे पहले सोमवार को संविधान पीठ के पांच न्यायाधीशों में से एक के मौजूद ना होने के कारण सुनवाई नहीं हुई। सोमवार को सुनवाई का आठवां दिन था। सुनवाई शुरू होने से कुछ मिनट पहले अदालत के कर्मचारियों ने दोनों पक्षों के वकीलों को बताया कि न्यायमूर्ति एसए बोबडे मौजूद नहीं हैं।

अधिवक्ता वैद्यनाथन ने शुक्रवार को पीठ से कहा था कि एससआई की रिपोर्ट के अनुसार वहां ‘ईसापूर्व दूसरी शताब्दी का स्तंभ आधारित एक भव्य ढांचा मौजूद था’ और एएसआई के सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि उस स्थल पर ‘स्तंभों वाला’ एक ‘मंडप’ था। शीर्ष अदालत अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि के मालिकाना हक के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही है।

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