आगरा शिखर सम्मेलन 2001 में भारत और पाकिस्तान के बीच आयोजित किया गया था। यह पहला शिखर सम्मेलन था जिसका टेलीकास्ट पूरी दुनिया ने टेलीविजन पर देखा था। पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निमंत्रण पर भारत आए थे। बातचीत के मुद्दे में कश्मीर, क्रास बॉर्डर टेरिज्म और परमाणु हथियार से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। इस सम्मेलन के बाद दोनों देशों ने साझा बयान शेयर नहीं किया। साथ ही इस सम्मेलन के बाद दोनों देशों के बीच दूरियां बढ़ गई। इस मुद्दे को लेकर पूर्व आईबी अधिकारी अविनाश मोहनाने से जनसत्ता ने बात की।
अविनाश मोहनाने उस दौरान इस्लामाबाद में तैनात थे। उन्होंने आगरा सम्मेलन को लेकर कई बड़े खुलासे किए। उन्होंने कहा, ‘जब 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किए तो उसके एक साल बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु बम बना लिए। इसके बाद दोनों देशों में एक तनाव की स्थिति बन गई। इसी तनाव को कम करने के लिए दोनों देश और अमेरिका समेत दुनिया भी कम करना चाहती थी। इसके बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शहबाद शरीफ ने भारतीय समकक्ष को आमंत्रित किया। फरवरी 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बस यात्रा के जरिए पाकिस्तान गए। इससे पहले अक्टूबर 1998 में पाकिस्तानी सेना हमारे सरहद में घुस आई और फिर कारगिल युद्ध हुआ।’
भारत के साथ किया गया धोखा- अविनाश मोहनाने
आगे कहा, ‘जब शांति समझौते की बात हो रही थी तो पाकिस्तानी सेना हमारे इलाकों में थी, हमें सच नहीं बताया गया जो भारतीय सेना के साथ एक बड़ा धोखा किया गया था। लाहौर में शहबाज शरीफ और अटल बिहारी ने साझा बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने परमाणु मुद्दे भी शामिल किए थे। ये बातचीत कुछ आगे बढ़ती उससे पहले ही कारगिल युद्ध हो गया। कारगिल युद्ध की आड़ में ही परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को सत्ता से हटा दिया और पाकिस्तान में संदेश दिया कि पाकिस्तान सरकार भारत के साथ कश्मीर मुद्दे पर समझौता कर रही है। जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। अक्टूबर 1999 में परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान सत्ता पर कब्जा कर लिया।’
अविनाश मोहनाने ने कहा, ‘लेकिन फिर उन्हें पहला रियलिटी चेक तब हुई कि दुनिया उन्हें कैसे देख रही है, अप्रैल 2000 में बिल क्लिंटन भारत आए और पांच दिन बिताए जबकि पाकिस्तान में उन्होंने पांच घंटे भी नहीं बिताए। उस समय उन्होंने लाइव एड्रेस किए जो काफी दुर्लभ थे। साथ ही यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का पाकिस्तान में 30 साल बाद दौरा था। उन्होंने पाकिस्तान को रियलिटी चेक दिया कि अमेरिका का कोई इंटरेस्ट नहीं है कश्मीर मामले में आपको (पाकिस्तान) पहल करनी है।’
आगे उन्होंने कहा, ‘इसके बाद पाकिस्तान ने बेमन से कदम बढ़ाया और आतंकी गुट हिजबुल मुजाहिद्दीन ने जम्मू-कश्मीर में सीजफायर किया। इसके बाद भारत सरकार ने कहा कि हिजबिल मुजाहिद्दीन से बात करेगा क्योंकि वह कश्मीर के लड़के हैं। इस पर पाकिस्तान ने आंतकी गुट को कहा कि वह तब तक बात न करे जब तक पाकिस्तान इसमें शामिल न हो। यह बात भारत को मंजूर नहीं हुई इसलिए सीजफायर 18 दिन बाद टूट गया। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में हिंसा और बढ़ गई और यह मई 2001 तक हालात बने रहे फिर भारत सरकार ने परवेज मुशर्रफ को आमंत्रित किया और अमेरिका में जॉर्ज बुश आ गए थे।’
आगे कहा, ‘आगरा सम्मेलन के बाद पाकिस्तान भारतीय दूतावास से उसे पाकिस्तान में चलाने की अनुमति मांगी, जिस पर उन्हें ऑफ द रिकॉर्ड चलाने का कहा गया, लेकिन यहां भी पाकिस्तान ने धोखा दिया क्योंकि परवेज मुशर्रफ को अपने क्षेत्र में दिखाना था कि मैंने भारत के साथ कोई समझौता नहीं किया है। कारण ये था कि जब हिजबुल मुजाहिद्दीन ने सीजफायर की तो पाकिस्तान में बातें होने लगी थी कि पाकिस्तान सरकार ने अमेरिकी दबाव में यह फैसला लिया है।’
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भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को ‘स्थगित’ (In Abeyance) रखने का फैसला अभी तक बरकरार रखा है। पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की ओर से कई तीखी और राजनीतिक बयानबाज़ियां सामने आई हैं। पाकिस्तान ने पिछले महीने इस संधि पर एक तथाकथित ‘अंतरराष्ट्रीय’ कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की। इसमें वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों और प्रमुख नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर सिंधु नदी बेसिन की नदियों के जल प्रवाह में किसी तरह की रुकावट डाली गई तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और युद्ध जैसी हालात भी पैदा हो सकते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
