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विशेष: सकारात्मक ऊर्जा है आभामंडल

आभामंडल की ऊर्जा का संबंध मनुष्य के कर्मों से होता है। सकारात्मक वातावरण, सत्संग, हवन, मंत्र उच्चारण, ध्यान, भजन और धार्मिक स्थानों के सानिध्य में मनुष्य का आभामंडल विस्तृत होता है। इसके विपरीत नकारात्मक संग, भोजन, संगीत, साहित्य पढ़ना आदि आभामंडल को घटाता है। इसलिए यह विशेष ध्यान देना चाहिए कि हम अपना समय कैसे सानिध्य अथवा संग में व्यतीत करते हैं। हम कैसे लोगों के संबंध में अधिक रहते हैं।

human auraमनुष्य के शरीर में विद्यमान सात चक्र – 1.मूलाधार चक्र, 2.स्वाधिष्ठान चक्र, 3.मणिपुर चक्र, 4.अनाहत चक्र, 5.विशुद्ध चक्र 6.आज्ञा चक्र, 7.सहस्त्र चक्र आदि।

कमल वैष्णव
सूर्य व चंद्रमा के चारों ओर एक प्रकाशीय वृत्त प्रतीत होता है। वह प्रकाश चक्र सूर्य व चंद्रमा का आभामंडल कहलाता है। जिसे तेज पुंज, कांति, चमक, आभा अथवा नूर भी कहते हैं। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक सजीव प्राणी का भी एक आभा मंडल तथा निष्प्रभ मंडल होता है।
आइए जानते हैं कि आभा मंडल की उत्पत्ति कैसे होती है।
मनुष्य के शरीर में विद्यमान सात चक्र होते हैं जो क्रमश: इस प्रकार हैं-
1.मूलाधार चक्र, 2.स्वाधिष्ठान चक्र, 3.मणिपुर चक्र, 4.अनाहत चक्र, 5.विशुद्ध चक्र 6.आज्ञा चक्र, 7.सहस्त्र चक्र आदि।

इन्ही सातों चक्रों से आभामंडल का निर्माण होता हैं आभामंडल का निर्माण मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक शृंखलाओं के योग से होता है। मनुष्य के सातों चक्रों से सकारात्मक ऊर्जा प्रकट होती है तो वह उक्त व्यक्ति का आभामंडल कहलाता है। यदि सातों चक्रों से नकारात्मक ऊर्जा प्रकट होती है तो वह निष्प्रभ मंडल कहलाता है।

शास्त्रों के अनुरूप एक साधारण व्यक्ति का आभामंडल 2 से 3 फीट तो महापुरुषों व संतों का आभामंडल 30 से 60 मीटर तक का होता है। जो साधना, तप, ध्यान इत्यादि पर निर्भर करता है तथा इनके घटने और बढ़ने पर आभामंडल भी घटता और बढ़ता है। इसे आध्यात्मिक ऊर्जा मंडल भी कहते हैं।
आभामंडल को निस्तेज करने वाले तत्व: काम ,क्रोध, मोह ,अहंकार, मद और दुर्व्यसन आदि हैं। इनकी अधिकता से शरीर में नकारात्मक ऊर्जा की उत्पत्ति होती है। तथा शरीर में प्रकट होने वाला आभामंडल निष्प्रभ मंडल में परिवर्तित हो जाता है।

आभामंडल की ऊर्जा का संबंध मनुष्य के कर्मों से होता है। सकारात्मक वातावरण, सत्संग, हवन, मंत्र उच्चारण, ध्यान, भजन और धार्मिक स्थानों के सानिध्य में मनुष्य का आभामंडल विस्तृत होता है। इसके विपरीत नकारात्मक संग, भोजन, संगीत, साहित्य पढ़ना आदि आभामंडल को घटाता है। इसलिए यह विशेष ध्यान देना चाहिए कि हम अपना समय कैसे सानिध्य अथवा संग में व्यतीत करते हैं। हम कैसे लोगों के संबंध में अधिक रहते हैं।

यदि बात करते हैं प्रकृति और सनातन धर्म के संबंध की तो सनातन धर्म में बहुत विस्तार से यह बताया गया है कि सनातन धर्म में प्रकृति को पूजनीय क्यों कहा गया है । सनातन धर्म के अनुसार विशेष वनस्पति पूजनीय कही गई है जैसे कि पीपल, तुलसी, वटवृक्ष, पुष्पों में कमल, गुलाब, कनेर, सफेद आक आदि। मनुष्य हों ,जीव जंतु हों अथवा अन्य कोई सजीव प्राणी हों सभी का आभामंडल भिन्न- भिन्न प्रकार का होता है। कुछ शास्त्र प्रमाणों के माध्यम से समझते हैं कि किस वनस्पति अथवा जीव जंतुओं का आभामंडल कितनी दूरी तक होता है तथा सनातन धर्म में पूजा पद्धति में उनका क्या महत्व है?

पीपल वृक्ष 3.5 मीटर, तुलसी 6.11 मीटर, वट वृक्ष 10.1 मीटर, कदम वृक्ष 8.4 मीटर, नीम वृक्ष 5.5 मीटर, आम वृक्ष 3.5 मीटर, नारियल 10.5 मीटर, कमल पुष्प 6.8 मीटर, गुलाब पुष्प 5.7 मीटर, सफेद आक 15 मीटर,, गाय 16 मीटर, गाय घृत 14 मीटर, गाय दुग्ध 13 मीटर, गाय दधि 6.9 मीटर।

इस प्रकार प्रकृति में सभी मनुष्यों, जीव जंतुओं, वनस्पतियों तथा पदार्थों का अपना-अपना आभामंडल होता है। सनातन धर्म में हवन यज्ञ, शालीग्राम व शिव अभिषेक इत्यादि में भिन्न-भिन्न पदार्थों को इसी कारण उपयोग किया जाता है कि उन पदार्थों के विशेष आभामंडल के संपर्क में आने से मनुष्य तथा वातावरण में सकारात्मक आभा मंडल का विस्तार होता है। जैसे हवन में आम की लकड़ी, गौ घृत जौ, तिल आदि की आहुति देने से वातावरण में विस्तृत आभामंडल का निर्माण होता है तथा जो जीव उस आभामंडल के सानिध्य में होंगे उनका भी आभा वृत्त बढ़ता है।

बात करते हैं की घर, दफ्तर और स्वयं के आभामंडल को कैसे बढाएं-सदैव सकारात्मकता प्रदान करने वाले व्यक्त्वि व साहित्य को प्रबुद्धता दें। ओजस्वी, तेजस्वी व बुद्धिमान लोगों के संपर्क में समय व्यतीत करें। घर दफ्तर में पेड़ पौधों का रोपण करें। प्रकाश की व्यवस्था ठीक रखेंं। स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। घरों में हवन, मंत्रोच्चारण ,दीप प्रकाश, शंखनाद आदि करते रहें। पांच तत्वों की शुद्धि का सदैव ध्यान दिया जाना चाहिए… जल, अग्नि, वायु ,पृथ्वी तथा आकाश। इनसे संबंधित प्रदूषण करने से बचना चाहिए।

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