आज से 40 साल पहले 3 अक्टूबर, 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर राजघाट पर जानलेवा हमला करने की कोशिश की गई थी। हमलावर ने करीब 50 मिनट के अंतराल में प्रधानमंत्री की ओर दो से तीन बार गोली चलाई। बताया गया कि हमलावर ने राजघाट स्थित समाधि के प्रवेश द्वार पर बने कंक्रीट के शेड को ढकने वाली बेलों के पीछे छिपकर गोली चलाई।

गोली चलने के बाद कारतूस फट गया, जिससे पांच लोगों को मामूली चोटें आईं। हालांकि, हमलावर ने बाद में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

हमलावर की पहचान पर उलझन

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, पकड़ा गया व्यक्ति अपनी पहचान बार-बार बदल रहा था। पहले उसने अपना नाम मनमोहन देसाई और खुद को मथुरा का निवासी बताया। उसकी जेब से हिंदी में “मनमोहन देसाई” नाम की एक पर्ची भी मिली थी। बाद में उसने अपना नाम करमजीत सिंह और खुद को संगरूर का निवासी बताया। जांचकर्ताओं को उसकी वास्तविक पहचान को लेकर संदेह बना रहा।

हमले के बाद भी राजीव गांधी का कार्यक्रम नहीं बदला

हमले के कुछ घंटे बाद राजीव गांधी नागपुर रवाना होने के लिए एयरपोर्ट पहुंचे। वहां मौजूद मंत्रियों और पार्टी नेताओं से उन्होंने कहा कि सब ठीक है। उन्होंने घटना के बावजूद अपना कार्यक्रम नहीं बदला और निर्धारित समय पर नागपुर के लिए रवाना हुए।

नेताओं ने की घटना की निंदा

देश के विभिन्न राजनीतिक नेताओं, राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों ने राजघाट की घटना की कड़ी निंदा की। उन्होंने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अन्य वीआईपी के सुरक्षित बचने पर राहत जताई।

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गांधी ने ब्रिटिश उपनिवेश मामलों के सचिव लॉर्ड रिपन को भेजी अपनी याचिका में लिखा था कि अगर किसी भारतीय के पास वोट देने का अधिकार नहीं होगा तो वह ‘इस उपनिवेश में अपना आत्मसम्मान खो देगा।’ एक साल बाद गांधी ने चेतावनी दी कि भारतीयों से वोट का अधिकार छीनने के नतीजे ‘सोचने तक में बहुत डरावने’ होंगे। पढ़ें पूरी खबर।