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राजनीति: विवाद की जड़ में नदियां भी

चीन युद्ध का माहौल बना रहा है। कारण कई हैं, लेकिन सबसे अहम तिजोरी नदियों को लेकर है, जिसे भारतीय विदेश नीति में तवज्जो नहीं दी गई। पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के साथ तो नदियों को लेकर भारत संधि करता रहा, लेकिन चीन भारत के लिए म्यांमा, नेपाल और भूटान में नदियों के बहाव को रोकता रहा।

Author Published on: June 30, 2020 1:08 AM
India dispute with China, land issue, rivers dispute,भारत से चीन का नदी के रास्ते को लेकर भी विवाद है।

सतीश कुमार
गलवान घाटी में भारत-चीन विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। चीन का हठीला रुख बरकारार है। भारत भी पूरी सैनिक तैयारी में जुट गया है। अमेरिकी भी चीन को घेरने का मन बना चुका है। इन सारे विवादों में नदी जल का बंटवारा एक अहम मुद्दा है। भारत और नेपाल के बीच में विवाद चल रहा है। नदियों को लेकर विवाद इसलिए गंभीर है कि तिब्बत से निकलने वाली नदियों को चीन अपनी मनमर्जी के अनुरूप प्रयोग करता रहा है। अगर हम भारत-चीन सीमा विवाद को समझने की कोशिश करें, तो कई ऐसी बातें हैं जो सतह पर दिखती नहीं हैं, लेकिन वे विवाद का सबसे अहम कारण हैं।

चीन सीमा विवाद को लेकर अपनी प्राथमिकताएं पिछले छह दशकों में कई बार बदल चुका है। चीन की भू-राजनीतिक स्थिति में कई विसंगतियां हैं। औद्योगिक विकास के हिसाब से देखें तो चीन का उत्तरी भाग संपन्न है और ज्यादातर उद्योग-धंधे इसी क्षेत्र में हैं, लेकिन यहां पानी का संकट है। चीन की ज्यादातर प्रमुख नदियां दक्षिणी क्षेत्र में हैं। वह भी तब, जब तिब्बत के एक बड़े भाग को उससे अलग कर चीन के दक्षिणी खंडों के साथ जोड़ दिया गया। पीपुल्स लिवरेशन आर्मी (पीएलए) के पूर्व सेना अधिकारी ली लिंग ने 2005 में एक किताब लिखी थी, जिसका शीर्षक था,‘तिब्बत चीन को बचा लेगा’।

इस किताब में दक्षिण से उत्तर में नदियों के बहाव की चर्चा की गई थी। 1949 में माओ की टिपण्णी भी थी कि जिस दिन हम तिब्बत में बहने वाली नदियों की धारा को उत्तर की ओर मोड़ने में सफल हो गए, उसी दिन चीन की तकदीर बदल जाएगी। इसके बाद 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने साउथ-नार्थ वाटर ट्रांसफर प्रोजेक्ट की नींव रखी थी। इसके तीन चरण के काम पूरे हो चुके हैं। चीन के सरकारी दस्तावेजों में इस बात की चर्चा है कि केवल तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र में ही चीन के जल संकट की एक चौथाई समस्या को पूरा करने की क्षमता है। अगर पूरे तिब्बत को साथ में मिला दिया जाए, तो चीन में जल संकट रहेगा ही नहीं।

पिछले कुछ वर्षों से विशेषकर डोकलाम के बाद भारत ने चीन के जाल को कुतरना शुरू किया। एक दशक के प्रयास बाद अरुणाचल प्रदेश में छोटे-छोटे पंद्रह बांध बनाए गए, जिससे न केवल बिजली का उत्पादन हो, बल्कि पहाड़ी रास्तों का भी निर्माण किया जा सके। यहां पर नदियों के बहाव और उनके उद्गम की चर्चा जरूरी है।

तकरीबन पचपन नदियां तिब्बत के मुहाने से निकलती हैं और एशिया के विभिन्न देशों की जरूरतों को पूरा करती हैं। इनमें ब्रह्मपुत्र और मेकांग नदियों की चर्चा अहम है। मेकांग पूर्वी एशिया के देशों की ओर जाती है और ब्रह्मपुत्र भारत के पूर्वी राज्यों में उतरती है। करीब दो हजार आठ सौ अस्सी किलोमीटर की लंबी यात्रा में ब्रह्मपुत्र एक हजार छह सौ पच्चीस किलोमीटर की दूरी तिब्बत में जिसे यारलुंग तान्सगपो के नाम से जाना जाता है, तय करती है और नौ सौ अठारह किलोमीटर भारत में तय करती है जहां इसे हम ब्रह्मपुत्र नदी के रूप में जानते हैं और फिर तीन सौ सैंतीस किलोमीटर की दूरी बांग्लादेश में की जाती है, जहां उसे मेघना के नाम से जाना जाता है।
अगर इतिहास पलट कर देखें तो 1949 में जब साम्यवादी चीन की स्थापना हुई थी, उस समय चीन में कुल बांधों की संख्या महज बाईस थी और 2019 तक चीन में पचास हजार से ज्यादा बांध बन चुके थे, यानी हर दिन एक नया बांध बन कर तैयार हो जाता है। पिछले चार दशकों में नई आर्थिक व्यवस्था के तहत कई बड़े बांध बनाए गए।

चीन के सरकारी आकड़ों के अनुसार पांच से छह करोड़ लोगों का विस्थापन भी किया गया। चीन ने आखिरकार यह स्थिति क्यों और कैसे पैदा की, यह समझना दुनिया, विशेषकर भारत के लिए बहुत अहम है। चीन अंतरराष्ट्रीय नदी पंचाट की बात नहीं मानता। नदियों को लेकर चीन की किसी भी देश के साथ कोई सफल संधि नहीं हो पाई है और इसका फायदा वह उठाता रहा है। तिब्बत की बर्फीली पहाड़ियों से जो नदियां निकलती हैं, वे दक्षिण पूर्व एशिया के देशों, भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान और मध्य एशिया से गुजरती हैं। अमूमन पैंतीस से चालीस फीसद लोगों को स्वच्छ पानी तिब्बत के ग्लेशियर से प्राप्त होता है। पर अब चीन ने विकास के नाम पर नदियों के बहाव को मोड़ना शुरू कर दिया और बड़े-बड़े उद्योग खड़े कर दिए गए और परमाणु कचराघर भी इन नदियों के किनारे बना डाले।
तिब्बत को हड़पने के बाद से चीन नदियों के उद्गम स्थल का मालिक बन गया।

उसके बाद नदियां नेपाल से होते हुए भारत में प्रवेश करती हैं। इस तरह नदियों के मामले में भारत चीन की मेहरबानी पर जिंदा है। भारत ने चीन के साथ 2002 में एक समझौता किया था, जिसके तहत ब्रह्मपुत्र के बहाव पर 15 मई से लेकर 15 अक्तूबर तक निरंतर आकड़ों का आदान-प्रदान करते रहने की बात थी। लेकिन चीन ने इस संधि का भी पालन नहीं किया।

अगर ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव और जल स्तर का बारीकी से अध्ययन करें तो पता चलता है कि चीन द्वारा बनाए गए बांधों की वजह से ब्रह्मपुत्र का केवल पैंतीस प्रतिशत पानी ही भारत में प्रवेश करता है, बाकी पानी तो ब्रह्पुत्र की सहयोगी नदियां का है जिनका उद्गम भारत में मिलता, जैसे- ब्रह्मपुत्र जब अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है तो उसकी महत्त्वपूर्ण नदियां लोहित, दिबांग और दिहांग उसके साथ जुड़ जाती है। भारत को इस बात का संशय है कि जिस तरीके से चीन बांधों के जरिए ब्रह्मपुत्र की धार को बाधित कर रहा है, उससे भारत के तीन राज्यों में दिक्कतें आ रही है।

चीन अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा मानता है। दलाई लामा से लेकर तवांग तक को चीन टेड़ी नजरों से देखता है, क्योंकि चीन के विकास की धारा तिब्बत के ग्लेशियर से निकलती है। माओत्से तुंग ने कहा था कि तिब्बत चीन के लिए न केवल दंत शृंखला, बल्कि तिजोरी भी है। एक ब्रिटिश भू-वैज्ञानिक ने माना था कि जो देश तिब्बत की पहाड़ियों पर कब्जा कर लेगा, वही एशिया पर राज करेगा और जिसके हाथों में एशिया की कमान होगी, वह दुनिया का बादशाह होगा। अब बात बादशाहत की है।

चीन एशिया में शक्तियों को बांटने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। भारत के पास भी कोई विकल्प नहीं है। चीन के उद्योग आज भी कोयले पर आश्रित हैं। चीन कोयले का सबसे बड़ा उत्पादक देश होने के बावजूद सबसे बड़ा आयातक देश है। तेल और गैस का भी सबसे बड़ा आयातक है। हरित ऊर्जा में चीन ढाई सौ गीगा वाट ऊर्जा पानी से तैयार कर लेता है। इसलिए नदियों पर चीन की चुप्पी पहले की तरह बनी रहेगी।

भारत को चीन के साथ एक निर्णायक स्थिति में पहुंचना होगा। चीन युद्ध का माहौल बना रहा है। कारण कई हैं, लेकिन सबसे अहम तिजोरी नदियों को लेकर है, जिसे भारतीय विदेश नीति में तवज्जो नहीं दी गई। पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के साथ तो नदियों को लेकर भारत संधि करता रहा, लेकिन चीन भारत के लिए म्यांमा, नेपाल और भूटान में नदियों के बहाव को रोकता रहा। सबसे अहम मसला तिब्बत की नीति को लेकर है। क्या भारत चीन से यह कह सकता है कि तिब्बत चीन का अभिन्न अंग नहीं है? देखना यह है कि नदियों को लेकर जो सीमा विवाद दोनों देशो के बीच शुरू हुआ है, वह बातचीत से खत्म होगा या युद्ध के हालात बनेंगे।

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