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असम के अनोखे चावल को मिला GI टैग, खाने के लिए पकाने की जरूरत नहीं

यह चावल की कोई नई प्रजाति नहीं है, बल्कि चावल की इस किस्म का इतिहास 17वीं सदी से जुड़ा है। बताया जाता है कि मुगल सेना से लड़ने वाले अहोम सैनिक युद्ध के दौरान इस चावल को ही राशन के तौर पर इस्तेमाल करते थे।

असम के चावल की खास किस्म को मिला जीआई टैग। (Photo Courtesy: Lotus Progressive Centre)

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य असम में चावल की एक ऐसी अनोखी किस्म पायी जाती है, जिसे खाने के लिए पकाने की भी जरुरत नहीं है। अब असम के चावल की इस खास किस्म को जीआई (जियॉग्राफिकल इंडिकेशंस) टैग मिल गया है। चावल की इस खास किस्म को ‘बोका चाउल’ या ‘असमिया मुलायम चावल’ कहा जाता है, जिसका बॉटेनिकल नाम ‘ओरीजा सातिवा’ है। अब जीआई टैग मिलने के बाद चावल की इस किस्म पर असम राज्य का कानूनी अधिकार हो गया है। बोका चाउल या ओरीजा सातिवा की खेती असम के नलबारी, बारपेटा, गोलपाड़ा, बक्सा, कामरुप, धुबरी, कोकराझर और दररंग जिलों में की जाती है। उपज के समय की बात करें तो यह सर्दियों का चावल है, जिसे जून के तीसरे या चौथे हफ्ते में बोया जाता है।

बता दें कि यह चावल की कोई नई प्रजाति नहीं है, बल्कि चावल की इस किस्म का इतिहास 17वीं सदी से जुड़ा है। बताया जाता है कि मुगल सेना से लड़ने वाले अहोम सैनिक युद्ध के दौरान इस चावल को ही राशन के तौर पर इस्तेमाल करते थे। इस चावल को पकाने के लिए ईंधन की जरुरत नहीं होती है। दरअसल इस चावल को सामान्य तापमान पर पानी में भिगो देने से ही यह खाने के लिए तैयार हो जाता है। असम में इस चावल को दही, गुड़, दूध, चीनी आदि के साथ खाते हैं। असम के पारंपरिक पकवानों में भी इस चावल का खूब इस्तेमाल किया जाता है।

क्या है जीआई टैगः GI टैग या जियॉग्राफिकल इंडिकेशंस टैग, भारत के किसी क्षेत्र में पाए जाने वाली विशिष्ट वस्तु को कानूनी अधिकार देना है। भारतीय संसद ने साल 1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत जियॉग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स लागू किया था। बनारसी साड़ी, मैसूर सिल्क, कोल्हापुरी चप्पल, दार्जिलिंग की चाय और हाल ही में मध्य प्रदेश का कड़कनाथ मुर्गा को जीआई टैग दिया जा चुका है। जीआई टैग की मदद से किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में पायी जाने वाली वस्तुओं को दूसरे स्थानों पर गैर-कानूनी रुप से इस्तेमाल किए जाने को रोका जाता है।

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